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लोकसभा चुनाव: जब एक वोट की चोट ने नेताओं के आंसू निकाल दिए

Fri, 08 Mar 2019 12:31 AM IST
Trainee Trainee चुनाव डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
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Atal Bihari Vajpayee
'मतदान' मतदाता का अधिकार भी है और फर्ज भी। मतदान की प्रक्रिया के दौरान केवल एक मत पूरे सियासी खेल को पलट सकता है। लोकतंत्र में प्रत्येक वोट को समान अधिकार दिया गया है। जहां एक वोट देश को नई दिशा दे सकता है, वहीं एक ही वोट देश को पतन की ओर ले जाने की भी ताकत रखता है।

हमारे देश में 'एक वोट' का पुराना और दिलचस्प इतिहास रहा है। कई बार 'एक वोट' ने किसी को कुर्सी पर बैठा दिया तो कई बार कितनों को इसी 'एक वोट' ने हार का स्वाद भी चखाया है।

आईए जानते हैं देश में 'एक वोट' ने कब-कब बाजी पलटी है। किसे जिताया और किसे मुंह की खानी पड़ी है।

1999 

देश में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार से पहले किसी सरकार ने सिर्फ एक वोट से अविश्वास प्रस्ताव नहीं खोया था। 17 अप्रैल, 1999 को पहली बार कुछ ऐसा हुआ जब देश ने एक वोट की ताकत को पहचाना।
सत्तारूढ़ वाजपेयी सरकार पर विपक्ष द्वारा अविश्वास प्रस्ताव लाया गया। बीएसपी के सांसदों ने पहले तो सरकार को वोट देने का वादा किया था, लेकिन बाद में वे मुकर गए। बीएसपी के एक वोट की कमी वाजपेयी पर इतनी भारी पड़ी कि उनसे प्रधानमंत्री की कुर्सी छीन गई।
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आर ध्रुवनारायण - ए आर कृष्णमूर्ती

2004 कर्नाटक 

कर्नाटक एक वोट की ताकत का गवाह बनने वाला देश का पहला राज्य है। 2004 में हुए विधानसभा चुनावों में पहली बार ऐसा हुआ जब कोई उम्मीदवार मात्र एक वोट से जीत गया हो। चुनाव में केरल के पूर्व राज्यपाल स्व. बी रचैया के पुत्र ए आर कृष्णमूर्ती संथेमराहल्ली, विधानसभा क्षेत्र से लड़ रहे थे। वे अपने प्रतिद्वंदी आर ध्रुवनारायण से केवल एक वोट से पीछे रह गए थे। कृष्णमूर्ती को 40751 वोट मिले थे, जबकी ध्रुवनारायण ने 40752 वोट पर जीत सुनिश्चित किया था। 
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सीपी जोशी।

2008 राजस्थान

साल 2008 में 'एक वोट' ने एक बार फिर अपनी शक्ती दिखाई। इस बार चुनाव राजस्थान में हो रहे थे जब तत्कालीन कांग्रेस प्रमुख सीपी जोशी मुख्यमंत्री पद के दावेदार थे। जोशी एक वोट की चोट खाने वाले देश के तीसरे व्यक्ति थे। जोशी चुनाव में मुख्यमंत्री पद के दुसरे उम्मीदवार कल्याण सिंह चौहान के खिलाफ खड़े थे, जिसमें उन्हें 62,215 वोट मिले जबकी चौहान को केवल एक वोट ज्यादा (62,216) वोटों पर जीत मिली। 
 
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अतुल शाह

2017 मुंबई

एक वोट से बाजी पलटने का सबसे ताजा मामला 2017 में हुए मुंबई की बृहन्मुंबई महानगरपालिका के चुनावों का है। बीएमसी चुनावों में वॉर्ड संख्या 220 में एक वोट ने विचित्र खेल दिखाया। 

चुनाव में यह सीट पहले शिवसेना के सुरेंद्र बागलकर ने हासिल किया, लेकिन जब भाजपा के उम्मीदवार अतुल शाह ने दोबारा मतगणना की मांग की, तो यह पाया गया कि दोनों उम्मीदवारों को बराबर (9,946) वोट मिले थे। हालांकि शाह ने लॉटरी के आधार पर सीट जीत ली, लेकिन ऐसी परिस्थिती में किसी एक व्यक्ति  का किसी भी पक्ष में किया गया मतदान पूरे परिणाम को बदल सकता था।
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