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क्या इस बार अमेठी में होगा उलटफेर, 2014 के आंकड़ों ने राहुल को डराया?

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अमेठी की जंग - फोटो : Amar Ujala
लोकसभा चुनाव 2019 के संग्राम में उत्तर प्रदेश के अमेठी सीट के मुकाबले पर इस बार सभी की नजरें हैं। सबको इंतजार है कि दो दिग्गजों की जंग में बाजी किसके हाथ लगेगी। क्या इस बार कोई उलटफेर होगा? कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी तीसरी बार फिर मैदान में हैं। उनके मुकाबले भाजपा ने दोबारा केंद्रीय मंत्री स्मृति ईरानी को मैदान में उतारा है। दोनों पार्टियों की तरफ से प्रचार चरम पर है, लेकिन भाजपा और स्मृति आक्रामक अंदाज में प्रचार करते दिख रहे हैं। आइए जानने की कोशिश करते हैं कि यहां किस तरह का मुकाबला है और कौन किस पर भारी पड़ सकता है।
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अमेठी में राहुल गांधी-स्मृति ईरानी की जंग - फोटो : Amar Ujala
सबसे पहले समझने की कोशिश करते हैं कि 1999 से 2014 के बीच यहां किस कदर कांग्रेस की हवा बह रही थी। इस दौरान कांग्रेस का वोट प्रतिशत कितना रहा था। 1999 में यहां से सोनिया गांधी ने चुनाव लड़ा। उनकी जीत का मार्जिन 48 फीसदी रहा। 2004 में राहुल गांधी लड़े और बड़ी जीत हासिल की। जीत का मार्जिन रहा 49.33 फीसदी। 2009 में राहुल फिर यहां से खड़े हुए और 57.24 फीसदी के मार्जिन से जीत हासिल की। यानी जीत का मार्जिन जबरदस्त रहा। लेकिन 2014 में ये अंतर महज 12 फीसदी रह गया। 

अमेठी में जीत का अंतर 

1999 में 48%
2004 में 49.33%
2009 में 57.24%
2014 में 12% 

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स्मृति ईरानी-राहुल गांधी - फोटो : Amar Ujala
2014 चुनाव में यहां उलटफेर होते होते बचा। मोदी लहर के बीच भाजपा उम्मीदवार स्मृति ईरानी ने राहुल गांधी को कड़ी टक्कर दी। राहुल जीत तो गए लेकिन उनकी जीत का मार्जिन रहा महज 12.33 फीसदी। इस चुनाव में आम आदमी पार्टी की ओर से कुमार विश्वास भी चुनाव मैदान में थे, लेकिन असर नहीं छोड़ पाए। इसके बाद से भाजपा को यहां जीत की संभावना दिखने लगी और स्मृति ईरानी ने चुनाव तैयारियां शुरू कर दी। 
 

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Political status of Amethi - फोटो : ANI
अमेठी सीट 1967 से ही कांग्रेस का गढ़ रही है। हालांकि, दो बार उसे हार का भी सामना करना पड़ा है। एक 1977 में और दूसरी बार 1998 में। 1980 में संजय गांधी ने यहां से जीत हासिल की थी। हालांकि बाद में उनके परिवार की राहें जुदा हो गईं। यहां गांधी परिवार के प्रति वफादार रहे मतदाता अब भी कांग्रेस को ही वोट देने की बात कहते हैं। यहां हुए काम गिनाते हैं। वहीं, कई लोग भाजपा के उठाए सवालों को भी सुन रहे हैं। अमेठी में कितना काम हुआ है, हाई प्रोफाइल लोकसभा सीट होने के बावजूद उस तरह का विकास क्यों नहीं हुआ जैसा होना चाहिए था? ऐसे सवाल उठते रहे हैं, लेकिन आखिर में गांधी परिवार के प्रति वफादारी चुनाव नतीजों में झलकती है।
 
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राहुल गांधी - फोटो : twitter
गौरीगंज में जहां कांग्रेस का दफ्तर है वहां जगह जगह दीवारों पर लिखे नारे बताते हैं कि कांग्रेस के लिए अमेठी की क्या अहमियत है। लेकिन इस बार हालात कुछ अलग हैं। प्रचार युद्ध में भाजपा पूरी ताकत से उतर पड़ी है। स्मृति लगातार यहां जमी हुई हैं और मतदाताओं से उनका संपर्क अभियान जोरों से चल रहा है। हालांकि, राहुल गांधी देशभर में रैलियां कर रहे हैं इसलिए यहां ज्यादा नहीं दिख रहे हैं। कांग्रेस को भरोसा है कि न्याय योजना के दम पर वह अमेठी की जंग आसानी से जीत जाएगी। हालांकि ये कैसे लागू होगा इस पर सवाल भी उठ रहे हैं। 
 
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स्मृति ईरानी - फोटो : अमर उजाला
राहुल के वायनाड से चुनाव लड़ने को भी भाजपा और स्मृति ने यहां मुद्दा बनाया है। भाजपा का कहना है कि राहुल हार के डर से केरल जाकर चुनाव लड़ रहे हैं। समर्थक हों, सियासी दुश्मन हों या फिर विशेषज्ञ, हर किसी के मन में सवाल है कि राहुल ने वायनाड जैसी सुरक्षित सीट क्यों चुनी? क्या उन्हें अमेठी से जीतने का पूरा यकीन नहीं है? 2014 में स्मृति ईरानी ने यहां राहुल को जबरदस्त टक्कर दी और जीत का मार्जिन महज 12.33 फीसदी कर दिया था जो 2009 में 50 फीसदी था। एक तरह से इसने कांग्रेस और राहुल दोनों के लिए खतरे की घंटी बजा दी। भाजपा पूछ रही कि अगर राहुल को हार का डर नहीं था तो वह वायनाड क्यों पहुंचे। और अगर दूसरी सीट ही चुननी थी तो गुजरात जैसे भाजपा के गढ़ में चुनौती देने क्यों नहीं पहुंचे।

 
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स्मृति ईरानी - फोटो : amar ujala
भाजपा ने अमेठी से एक बार फिर स्मृति ईरानी को मैदान में उतारकर कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ाई हैं। वह लंबे समय से यहां सक्रिय हैं। भाजपा नेताओं का कहना है कि इस हाई प्रोफाइल सीट पर ऐसे ही किसी दमदार उम्मीदवार की जरूरत थी जो अपने मौजूदा सांसद के कारण उपेक्षित रही है। स्मृति लगातार मतदाताओं से कह रही हैं कि इस क्षेत्र की राहुल गांधी ने उपेक्षा की है। वह जोर-शोर से प्रचार में जुटी हैं। गांव-गांव घूमकर लोगों से वोट मांग रही हैं और कह रही हैं कि अमेठी में पिछले 15 सालों में कुछ नहीं हुआ है। यहां के सांसद लापता हैं। स्मृति किस कदर यहां सक्रिय हैं इसकी बानगी हाल ही में दिखी जब यहां एक गांव के खेत में आग लग गई और वह तुरंत हरकत में आ गईं। वह आग बुझाने के लिए हैंडपंप से पानी भरती दिखीं, खेतों में गई और पीड़ितों को दिलासा देने लगीं। इन तस्वीरों और वीडियो को हर किसी ने देखा।  

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कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ गांधीनगर में प्रियंका गांधी वाड्रा - फोटो : PTI
2014 में भाजपा के हाथों करारी मात झेलने के बाद कांग्रेस लगातार हार पर हार झेलती रही। 2014 चुनाव में यूपी में कांग्रेस का बुरा हाल हुआ था। कांग्रेस सिर्फ अमेठी और रायबरेली सीट ही जीत पाने में कामयाब हुई थी। विधानसभा चुनाव में भी बदतर प्रदर्शन का सिलसिला जारी रहा। जिन 114 सीटों पर वह लड़ी, महज सात सीटें ही जीत सकी थी। 2019 चुनाव में भी बहुत कुछ बदला नहीं है। मुख्य मुकाबला भाजपा और सपा-बसपा गठबंधन के बीच है। कांग्रेस महज कुछ ही सीटों पर अपनी साख बचाने के लिए लड़ रही है।  
 

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रायबरेली में कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी वाड्रा। - फोटो : amar ujala
2019 चुनाव में प्रियंका गांधी वाड्रा की भी अग्निपरीक्षा है। चुनाव से ऐन पहले राहुल गांधी ने प्रियंका के राजनीति में उतरने के कयासों को हमेशा के लिए खत्म कर दिया। राहुल ने उन्हें कांग्रेस महासचिव नियुक्त किया और पूर्वी उत्तर प्रदेश की कमान दी। प्रियंका ने राजनीति में प्रवेश के साथ ही अपने भाषणों-दौरों से सबका ध्यान खींचा। किसी को उनके बोलने का अंदाज इंदिरा गांधी जैसा लगा तो किसी को उनकी सादगी पसंद आई। प्रियंका इन दिनों अमेठी-रायबरेली में जमकर प्रचार कर रही हैं। नतीजे और जीत का मार्जिन तय करेंगे कि उनका जादू कितना चल पाया है।
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Rahul gandhi, Priyanka gandhi - फोटो : Twitter Congress @INCIndia
राजनीतिक विश्लेषकों, आलोचकों और समर्थकों का मानना है कि अगर राहुल दोनों जगहों से चुनाव जीत जाते हैं तो वायनाड को बरकरार रख अमेठी से प्रियंका को चुनाव लड़वाएंगे। प्रियंका को कांग्रेस ने वाराणसी से चुनाव लड़वाने की तैयारी कर ली थी, लेकिन जमीनी हालात ने राहुल को ऐसा करने से रोक दिया। अब देखना है कि 23 मई के बाद किस तरह के नतीजे आते हैं और ऊंट किस करवट बैठता है।  
 
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