दरअसल होली खुलकर और खिलकर कहने की परंपरा है। यही वजह है कि जोगीरे की तान में आपको सामाजिक विडम्बनाओं और विद्रूपताओं का तंज़ दिखता है। होली की मस्ती के साथ वह आसपास के समाज पर चोट करता हुआ नजर आता है। आचार्य रामपलट दास जनकवि हैं। उनके लिखे जोगीरे हम आपको होली के मौके पर पेश कर रहे हैं। जोगीरे होते क्या हैं इसके बारे में आचार्य रामपलट कहते हैं कि कोई ऑथेंटिक जानकारी तो नहीं है पर शायद इसकी उत्पत्ति जोगियों की हठ-साधना, वैराग्य और उलटबाँसियों का मज़ाक उड़ाने के लिए हुई हो।