आंध्र प्रदेश के तेलंगाना क्षेत्र में आज बोनालु त्योहार बड़ी धूमधाम से मनाया जा रहा है। यह त्यौहार विनाश की देवी महाकाली को समर्पित है। तस्वीरों में देखें तेलगांना के इस रंगारंग त्यौहार की झलकियां-
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बोनालू उत्सव को माता का धन्यवाद का त्यौहार माना जाता है। यह माना जाता है कि माँ काली साल भर इस स्थान और इसकी संतान की रक्षा करती है जिसके लिए यह संतान अषाढ़ मास में धन्यवाद स्वरूप धूमधाम से पूजा करती है।
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दो दिन के बोनालू उत्सव में सोमवार को जुलूस निकलता हैं। जुलूस में झूला होता हैं जिसे सेवक उठा कर चलते हैं ।
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दिन भर जुलूस की तैयारी की जाती हैं। माता का ऊंचा झूला तैयार किया जाता हैं। वैसे कारीगर दो सप्ताह पहले से ही झूला तैयार करने में जुट जाते हैं। रंग-बिरंगे कागजों से बेत का झूला तैयार किया जाता हैं ।
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इस जुलूस का अर्थ हैं माता को उनके ससुराल खुशी-खुशी विदा करना। माता को विदा करने जुलूस के साथ माता को भाई 'पोतराजू' जाता है। मोहल्ले के किसी बलिष्ठ व्यक्ति को पोतराजू बनाया जाता हैं।
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बोनालु शब्द की उत्पत्ति भोजनालू से हुई। घर-घर से महिलाएँ माता काली के लिए अपने घर से भोजन बना कर ले जाती है और माता को चढाती है।
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महाकाली माता की पूजा के लिए महिलाएं इस दिन अपनी सब से भारी सिल्क की साड़ी पहन कर बोनम को[भोजन से भरा मटका] सिर पर लिए निकलती है। इस प्रकार जब सजधज कर महिलाएँ एक साथ निकलती है तो वह जलूस का आकार ले लेता है।
बोनाम को सिर पर रखे महिलाएं बाजे-गाजे के साथ निकलती है। इस बाजे की धुन पर उनके पैर भी थिरकने लगते हैं और कुछ महिलाएँ नाचने भी लगती हैं। वे इतनी दक्ष होती हैं कि इस नृत्य पर भी उनके सिर से मटका नहीं सरकता है।