1947 में बंटवारे के वक्त जब सरहद के दोनों ओर का पंजाब हिंसा की आग में जल रहा था और कत्ल-ए-आम का मंजर था, तो उस दौरान एक इलाका ऐसा था जो हिंसा के साए से दूर था। इस जगह का नाम था मलेरकोटला जो आज भारतीय पंजाब का एकमात्र मुस्लिम बहुल कस्बा है।
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पंजाब के गुरुद्वारों, मंदिरों के बीच में यहाँ की जामा मस्जिद और शीश महल की अपनी अहमियत है। 50 साल के मास्टर खलील मलेरकोटला में ही रहते हैं। वो एक किस्सा सुनाते हैं जो हर पीढ़ी आने वाली पीढ़ी को सुनाती आई है।
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नवाब ने दिया था सिखों का साथ
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मास्टर खलील बताते हैं, "मलेरकोटला के नवाब थे शेर मोहम्मद खान। उस दौरान मुगल बादशाहों और सिख गुरुओं के मानने वालों के बीच जबर्दस्त संघर्ष चल रहा था।" मुगलों ने उस समय गुरु गोबिंद सिंह के साहिबजादों को दीवार में जिंदा चुनवाने का आदेश दिया था
जिन्हें सरहिंद में 1705 में पकड़ा गया था। लेकिन मलेरकोटला के नवाब ने इसे गैर-इस्लामिक बताकर इसका विरोध किया था। तब से ही सिखों और यहाँ के मुसलमानों के बीच अनोखा रिश्ता रहा है।"
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आजादी के बाद दंगों के दौरान बहुत से लोगों को उस समय मलेरकोटला के नवाब इफ्तिखार अली खान ने शरण दी थी। लुधियाना से कोई 43 किलोमीटर दूर बसे मलेरकोटला में कभी मुगलकाल में नवाबों की मनसबदारी थी।
लेकिन आजादी के बाद तरक्की और विकास की रेस में मलेरकोटला काफी पिछड़ गया है। अगर मौजूदा दौर की बात करें तो गीतकार इरशाद कामिल, अदाकार सईद जाफरी यहीं के बाशिंदे रहे हैं।
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सईद जाफरी, बॉबी जिंदल का भी गाँव
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अमरीका के बॉबी जिंदल का परिवार भी मलेरकोटला से कोई आठ किलोमीटर दूर एक गाँव का ही है। बॉबी जिंदल आखिरी बार तब यहाँ आए थे जब वो करीब नौ साल के थे। 2011 की जनगणना के मुताबिक मलेरकोटला की 135424 की आबादी में से 68।50 फीसदी लोग मुसलमान हैं, 20।71 फीसदी हिंदू और 9।50 फीसदी लोग सिख हैं।
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मास्टर खलील मलेरकोटला को भाईचारे का गुलदस्ता कहते हैं। पूरे पंजाब की तरह यहाँ भी चुनाव में मुकाबला त्रिकोणीय है- अकाली दल के उम्मीदवार हैं मोहम्मद उवैस। कांग्रेस ने अपनी पूर्व विधायक रजिया सुल्ताना को उतारा है तो आम आदमी पार्टी ने टीवी एक्टर अरशद डाली को।
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मलेरकोटला में भाई-बहन लड़ रहे हैं चुनाव में
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अरशद और रजिया सगे भाई-बहन भी हैं। लेकिन राजनीति की बिसात पर जब आप चाल चलते हैं तो अपने-बेगानों का फर्क धूमिल होता जाता है। रजिया सुल्ताना बीबीसी से बातचीत में कहती हैं कि अगर वो जीतीं तो मलेरकोटला को जिला बनाएँगी-पंजाब का पहला मुस्लिम बहुल जिला और मेडिकल कॉलेज लेकर आएँगी।
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वो पहले भी विधायक रह चुकी हैं। जबकि भाई अरशद डाली बिना नाम लिए कहते हैं, "पता नहीं लोग किस मुँह से वोट लेने आते हैं। सोचिए यहाँ एक अदद और अच्छा लड़कियाँ का भी कॉलेज भी नहीं है।
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अल्पसंख्यकों के लिए कोई नीति नहीं है। अब तक लोगों के पास कोई विकल्प नहीं था। लेकिन अब आम आदमी पार्टी है।" पिछले साल पंजाब में कुरान की बेअदबी का मामला हुआ था तब यहाँ के हालात थोड़े असहज हो गए थे
जिसमें अकाली दल की विधायक फरजाना आलम के घर पर आगजनी तक हुई थी। तब इसमें आप के नेता नरेश यादव का नाम एफआईआर में दर्ज किया गया था। लेकिन आमतौर पर यहाँ साम्प्रदायिक सौहार्द बरकरार रहा है।
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मलेरकोटला के बारे में इतिहासकार राजीव लोचन बताते हैं, "किस्सा मशहूर है कि बयाजिर खान नाम के शख्स ने औरंगजेब की तब जान बचाई थी जब शेर ने उन पर हमला कर दिया था। औरंगजेब ने बयाजिर खान को इलाके की मनसबदारी दे दी थी।
मलेरकोटला के नवाब बयाजिर खान के ही वशंज थे।" हर साल यहाँ हजरत शेख सदर-उ-द्दीन के नाम पर मेला लगता है जिनका जिक्र 15वीं सदी में आता है। उस समय मलेरकोटला एक जागीर के तौर पर मौजूद था।
मलेरकोटला दो इलाकों को मिलाकर बना है-मलेर और कोटला। सरकारी वेबसाइट पर दर्ज रिकॉर्ड में की बात करें तो मलहेर इलाके (अब मलेर) की नींव सदर-उ-द्दीन ने 1466 में रखी थी जो अफगान मूल के थे और यहाँ आकर बस गए थे। बहलोल लोधी दिल्ली जाते समय सदर-उ-द्दीन के पास आकर रुके थे और बाद में अपनी बेटी की शादी उनसे कर दी और साथ में 68 गांव भी दिए।
यही इलाका मलेर कहलाया। बहलोल लोधी ने ही लोधी वंश की नींव रखी थी। उन्हें लोग बाबा हैदर शेख भी कहते हैं और यहाँ हर मजहब के लोग इबादत के लिए आते हैं।
इसी तहजीब को मलेरकोटला के लोग यहाँ की सबसी बड़े उपलब्धि मानते हैं।