थिरकने को मजबूर करते गानों और कड़क डॉयलाग में हरियाणवी बोली के शब्दों ने अपनी हिंदी पर अलग रंग चढ़ा दिया है। आलम यह है कि हिंदी सिनेमा में जब तक हरियाणवी बोली के शब्दों का तड़का न लगे तब तक नए दर्शकों को मजा नहीं आता। बॉलीवुड में धूम मचा हरियाणवी बोली के शब्द हिंदी में रच बस गए हैं, हिंदी को और समृद्ध कर रहे हैं।
रोचक तो यह है कि रोहतक, झज्जर, सोनीपत, जींद, हिसार से जो हरियाणवी शब्द बोलचाल की भाषा से दूर होते चले जा रहे थे, वही बॉलीवुड और म्यूजिक इंडस्ट्री में छा गए हैं। धाकड़, चौधर और छोरियां तो हिंदी के मूल शब्दों की तरह इस्तेमाल होने लगे हैं। जानकार इसका श्रेय बॉलीवुड फिल्म दबंग की सफलता को देते हैं, लेकिन स्टेज पर हरियाणवी बोली से हिंदी प्रशंसक जुटाने का बहुत बड़ा काम सपना चौधरी ने भी किया है।
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अमर उजाला कार्यालय पहुंचे अभिनेता यशपाल शर्मा।
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
फिल्में और सीरियल हो रहे हिट
चरित्र अभिनेता यशपाल शर्मा ने ‘दादा लख्मीचंद’ पर फिल्म बनाकर बॉलीवुड में हरियाणवी हिंदी के लिए नए रास्ते खोले। नतीजा है कि एक चर्चित ऐप पर अंजवी हुड्डा की वेब सीरीज ‘ओपरी हवा’ काफी लोकप्रिय हो रही है। जतिन शर्मा की फिल्म मोमाकू भी इस कड़ी में खड़ी है।
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अंजवी हुड्डा
- फोटो : अमर उजाला
हिंदी में हरियाणवी शब्द आम हो रहे
हरियाणवी फिल्मों, सीरियल और मंचों की चर्चित अभिनेत्री अंजवी हुड्डा कहती हैं कि बॉलीवुड में हिंदी तो सब बोलते हैं। लेकिन, मुंबई में हमसे मिलते ही बड़े नाम वाले निर्देशक भी कह उठते हैं, ‘हरियाणे सै है के।’ वह बताती हैं कि हिंदी फिल्मों में जय बजरंगबली भी हरियाणवी अंदाज में बोला जाता है। हिंदी में हरियाणवी के तड़के ने फिल्मों में मनोरंजन बढ़ाया है और हरियाणवी कलाकारों के लिए अवसर भी। अंजवी कहती हैं कि स्थानीय बोलियों से हिंदी समृद्ध हो रही है, जिसका स्वागत होना चाहिए।
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जयदीप अहलावत
- फोटो : social media
हरियाणवी बोली के कठिन शब्द हिंदी ने आत्मसात किए
ओछा, बंटा, काली, मांचुंगी, बटुआ जैसे शब्द तेज रफ्तार गानों में खूब प्रयोग हो रहे हैं। हरियाणवी बोली में इसके गूढ़ मायने हैं, लेकिन गुनगुनाने वाले तो इन्हें में प्रचिलित शब्द की तरह ही देखने लगे हैं।
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सतीश कौशिक
- फोटो : सोशल मीडिया
बॉलीवुड में हरियाणवी बोली को दिलाई प्रतिष्ठा
हरियाणवी बोली को बॉलीवुड में प्रतिष्ठा दिलाने में मशहूर निर्माता-निर्देशक स्वर्गीय सतीश कौशिक का खास योगदान है। उन्होंने हरियाणवी बोली में ‘म्हारी छोरियां छोरों से कम हैं के’ फिल्म बनाकर बॉलीवुड को उन शब्दों से परिचित करा दिया जो बाद की हिंदी फिल्मों में खूब इस्तेमाल हुए। काली, माचूंगी जैसे शब्दों के इस्तेमाल से गाने हिट हो रहे हैं और हिंदी समृद्ध हो रही है।