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तस्वीरें: पर्यटन का नया ठिकाना है अपना गोरखपुर, जानिए कहां घुमाने लेकर जा सकते हैं अपने अतिथि को

Sat, 26 Sep 2020 08:59 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर।
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गोरखपुर में पर्यटन स्थलों की तस्वीरें। - फोटो : अमर उजाला।
विश्व पर्यटन दिवस (27 सितंबर) से पहले हम आपको उत्तर प्रदेश के गोरखपुर शहर के उन स्थानों की याद दिला रहे हैं, जहां आप कोरोना महामारी से पहले अक्सर आया करते थे। खास तौर से जब आपके मेहमान आते थे तो उनको वहां घुमाने जरूर ले जाते थे। उस समय आप फक्र से कहते थे कि कौन कहता है कि गोरखपुर में घूमने की जगहें नहीं है। कोरोना संकट के बीच आप घर में हैं। न आप कहीं जा पा रहे हैं और न ही आपके अतिथि आ पा रहे हैं। ऐसे में अमर उजाला आपको मानस पर्यटन करा रहा है। देखिए उन जगहों को जहां, कोरोना से पहले आप मौका मिलते ही पहुंच जाते थे। कोरोना से पहले आप जिन जगहों पर घूम कर आए थे, उनकी स्मृतियां भी साझा करेंगे। विश्व पर्यटन दिवस पर अमर उजाला का अभिनव आयोजन कुछ अनूठा, कुछ मनोरंजक और कोरोना काल में कुछ जीतने का मौका दे रहा है। तो फिर शुरू हो जाइए...
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ये हैं प्रमुख धार्मिक, ऐतिहासिक, पौराणिक व प्राकृतिक स्थल। - फोटो : अमर उजाला।
26 सितंबर की दोपहर 2 बजे तक भेजें इंट्री, पुरस्कार पाएं
हमें बताएं, अगर आपका कोई अतिथि गोरखपुर आए तो पर्यटन के लिहाज से आप उसे कहां और क्यों ले जाना पसंद करेंगे ? संक्षेप में रोचक ढंग से लिखें। अपनी संक्षिप्त जानकारी (नाम, पता, फोन नंबर) के साथ लिखकर 26 सितंबर को दोपहर 2 बजे तक मोबाइल नंबर 7617566160 व 9451457633 पर व्हाट्सएप कर दें। यदि आप कोरोना से पहले किसी बाहरी टूरिस्ट प्लेस पर गए हैं तो उसकी ग्रुप फोटो रोचक स्मृतियों के साथ भी भेज सकते हैं। सर्वश्रेष्ठ 10 इंट्री को 27 सितंबर (पर्यटन दिवस) को प्रकाशित किया जाएगा। उन्हें आकर्षक उपहार से पुरस्कृत भी किया जाएगा।
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गोरखनाथ मंदिर। - फोटो : अमर उजाला।
गोरखनाथ मंदिर
धार्मिक और आध्यात्मिक दृष्टिकोण से गोरखनाथ मंदिर पर्यटन का प्रमुख केंद्र है। यूपी, बिहार, उत्तराखंड सहित कई राज्यों के लोग गोरखनाथ मंदिर आते हैं। नेपाल में भी गुरु गोरखनाथ पूजे जाते हैं। नेपाल के राजा की खिचड़ी अब भी चढ़ती है। मकर संक्रांति पर पांच-छह लाख श्रद्धालु पूजा-पाठ करते हैं। मान्यता है कि ज्वालादेवी के स्थान से परिभ्रमण करते हुए  'गुरु गोरखनाथ' ने आकर भगवती राप्ती के तटवर्ती क्षेत्र में तपस्या की थी और उसी स्थान पर अपनी दिव्य समाधि लगाई थी। वहीं गोरखनाथ मंदिर बना है। इसकी भव्यता दूर से दिखती है। भीम सरोवर के साथ लाइट एंड साउंड शो आकर्षण का प्रमुख केंद्र है।

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रामगढ़ताल। - फोटो : अमर उजाला।
रामगढ़ताल
शहर के दक्षिण-पूर्वी छोर पर 1700 एकड़ क्षेत्र में फैला रामगढ़ताल प्रकृति की अनुपम भेंट है। ईसा पूर्व छठी शताब्दी में गोरखपुर का नाम रामग्राम था। यहां कोलीय गणराज्य स्थापित था। उन दिनों राप्ती नदी आज के रामगढ़ताल से ही होकर गुजरती थी। बाद में राप्ती नदी की दिशा बदली तो उसके अवशेष से रामगढ़ताल अस्तित्व में आ गया। रामगढ़ ताल पूर्वांचल का मरीन ड्राइव बन चुका है। इसकी छटा देखने के लिए दूर-दूराज से पर्यटक आते हैं। लाइट एंड साउंड शो के साथ शाम ढलते ही ताल का नजारा अद्भुत होता है। नौकायन व वाटर स्पोर्ट्स ने इसकी खूबसूरती में चार चांद लगा दिया है।
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यहां संजोयी गई है ऐतिहासिक विरासत। - फोटो : अमर उजाला
गोरखपुर पुरातात्विक संग्रहालय (म्यूजियम)
1957 में स्थापित, यह पुरातात्विक संग्रहालय इतिहास, संस्कृति, परंपराओं के महत्वों को चित्रित करता है। यह सबसे प्रसिद्ध स्थानीय संग्रहालय है। इसकी देखरेख गोरखपुर विश्वविद्यालय का भारतीय इतिहास विभाग, पुरातत्व और संस्कृति करता है। विश्वविद्यालय परिसर में स्थापित संग्रहालय में तमाम कलाकृतियों संरक्षित हैं। प्राचीन सिक्के, मूर्तियां, पेंटिंग, पत्थर के उपकरण,  पुराने आभूषण और डाक टिकट भी रखे गए हैं। ऐतिहासिक विरासत को संजोने वाला संग्रहालय पर्यटन के प्रमुख स्थलों में शुमार है। 
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गोरखपुर की पहचान गीता प्रेस। - फोटो : गीता प्रेस
गीता प्रेस
हिंदू धार्मिक ग्रंथों और पुस्तकों को प्रकाशित करने का दुनिया का प्रमुख केंद्र है गीता प्रेस। 1923 में जया दयाल गोयंदका और घनश्याम दास जालान ने गीता प्रेस की नींव रखी थी। पवित्र गीता और इसकी व्याख्याओं, पवित्र महाकाव्य रामायण, महाभारत, पुराण, उपनिषद, विभिन्न संतों और गुरुओं की रचनाओं को प्रकाशित किया। इन सभी का क्षेत्रीय भाषाओं में अनुवाद किया गया है। कल्याण व कल्पतरू जैसी मासिक पत्रिकाएं भी प्रकाशित की जा रही हैं। पर्यटक हिंदू धर्म की सभी धार्मिक पुस्तकें, ग्रंथ आदि देख सकते हैं और खरीद भी सकते हैं।
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रेलवे संग्रहालय। - फोटो : अमर उजाला।
रेलवे संग्रहालय
रेलवे संग्रहालय और साथ में मनोरंजन पार्क गोरखपुर के पर्यटन स्थलों में से एक है। वर्ष 2007 में जनता के लिए खोले गए इस संग्रहालय का सबसे विशेष आकर्षण लॉर्ड लॉरेंस के भाप का रेल इंजन है। यह 1874 में लंदन में बनाया गया था और एक जहाज द्वारा भारत में लाया गया था। यहां एक फोटो गैलरी, वर्दी, पुरानी घड़ियों का अच्छा संग्रह है। और भी रेल इंजन हैं, जिनका ऐतिहासिक महत्व है। बच्चों के मनोरंजन के लिए खिलौना ट्रेन भी है। पूरे संग्रहालय का भ्रमण करने में करीब 2 घंटे लग जाते हैं।

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कुसम्ही वन। - फोटो : अमर उजाला।
कुसम्ही वन
कुसम्ही घना जंगल है। यह गोरखपुर रेलवे स्टेशन से नौ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। घने जंगल के बीच प्रसिद्ध बुढ़िया माई मंदिर है। इस मंदिर की ख्याति दूर दराज तक है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ भी अक्सर मंदिर में पूजा-पाठ करने जाते हैं। प्राकृतिक, धार्मिक लिहाज से महत्वपूर्ण स्थल पर बड़ी संख्या में पर्यटक पहुंचते हैं। जंगल के भीतर ही आकर्षण विनोद वन पार्क और एक छोटा चिड़ियाघर भी है। वन विभाग पर्यटक सुविधाओं की देखभाल करता है।

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विंध्यवासिनी पार्क। - फोटो : अमर उजाला।
विंध्यवासिनी पार्क (व्ही पार्क)
विंध्यवासिनी पार्क को विश्व मानक के हिसाब से बनाया गया है। असाधारण वास्तुकला, लेआउट और अच्छी तरह से विचार निष्पादन प्रतिष्ठित बिंदु हैं। विंध्यवासिनी पार्क, गोरखपुर के लोगों और पर्यटकों की पसंदीदा जगहों में शुमार है। बड़ी संख्या में शहरवासी मॉर्निंग व इवनिंग वॉक करने जाते हैं। दिलचस्प विषयों, शानदार डिजाइन, रंगीन परिदृश्य, मनोरंजक पात्रों और परिवेश संगीत का यहां बेहतरीन संगम है। बच्चों और परिवार के साथ यादगार समय गुजारने का सबसे अच्छा स्थान पार्क है।

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चौरीचौरा स्मारक व तरकुलहा देवी मंदिर - फोटो : अमर उजाला।
चौरीचौरा स्मारक व तरकुलहा देवी मंदिर
आजादी की लड़ाई का प्रमुख चौरीचौरा स्मारक भी बनाया जा रहा है। इसके 100 वर्ष पूरे होने वाले हैं। सरकार अलग-अलग तरह के आयोजन करना चाहती है। चौरीचौरा से कुछ पहले तरकुलहा मंदिर है। पहले वहां जंगल हुआ करता था, जहां डुमरी रियासत के बाबू बंधू सिंह रहा करते थे। नदी के तट पर तरकुल (ताड़) के पेड़ के नीचे पींडियां स्थापित कर वह देवी की उपासना किया करते थे। तरकुलहा देवी बाबू बंधू सिंह कि इष्ट देवी हैं। बंधू सिंह गुरिल्ला लड़ाई में माहिर थे, इसलिए जब भी कोई अंग्रेज उस जंगल से गुजरता, बंधू सिंह उसको मार कर उसका सर काटकर देवी मां के चरणों में समर्पित कर देते थे। अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार कर लिया और 12 अगस्त 1857 को गोरखपुर में अली नगर चौराहा पर सार्वजनिक रूप से फांसी पर लटका दिया था। यह देश का इकलौता मंदिर है जहां प्रसाद के रूप में मटन दिया जाता हैं। बकरे की बलि दी जाती है, फिर मिट्टी के बरतनों में मीट पकाकर प्रसाद के रूप में बांटा जाता है।

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विष्णु मंदिर। - फोटो : अमर उजाला।
विष्णु मंदिर
भगवान विष्णु की चतुर्भुज प्रतिमा आकर्षण का केंद्र है। कोई सामान्य प्रतिमा नहीं है। काले पत्थर से बनी यह प्रतिमा 12वीं सदी के पाल काल की है। इस प्रतिमा को अंग्रेज उठाकर लंदन ले गए थे। रॉयल म्यूजियम में प्रतिमा रखवाई गई थी। तब मझौली राज स्टेट की महारानी श्याम कुमारी (कुंवरि) ने यह प्रतिमा वहां से जीतकर ले आईं और अपने पति स्व. राजा कौशल किशोर प्रसाद मल्ल की याद में असुरन पर  मंदिर का निर्माण कराया और भगवान विष्णु कीं प्रतिमा स्थापित कराई।विष्णु मंदिर में बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। 
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राजकीय बौद्ध संग्रहालय। - फोटो : अमर उजाला।
राजकीय बौद्ध संग्रहालय
रामगढ़ ताल क्षेत्र में स्थित  राजकीय बौद्ध संग्रहालय पर्यटकों के लिए खास आकर्षण का केंद्र है। इस संग्रहालय की स्थापना वर्ष 1987 में विविध तत्वों के संरक्षण के लिए की गई थी। संग्रहालय इस दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है क्योंकि इसमें पाषाण काल से लेकर मध्य काल तक की पुरातात्विक वस्तुएं हैं। इनमें पत्थर की वस्तुओं, कांस्य की मूर्तियां, धातु की वस्तुएं, टेराकोटा, मिट्टी के बर्तन, पांडुलिपियां, हाथी दांत, लघु चित्र, पंचमार्क सिक्के, धन्यवाद और कई अन्य चीजें प्रदर्शित हैं।
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