फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

पहाड़ों से डोली में चढ़कर यहां आई थीं टिकुलहियां माई, रास्ते की कहानी जानकर हो जाएंगे हैरान

Sat, 30 May 2020 07:49 AM IST
vivek shukla संजय कुमार पांडेय, महराजगंज।
विज्ञापन
1 of 5
MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
निचलौल नगर से सटे उत्तर ग्राम टिकुलहियां में प्रसिद्ध देवी माता टिकुलहियां का मंदिर लोगों की अटूट आस्था का केंद्र है। वर्षों से पूजित माता के दरबार में दूर दूर से लोग मत्था टेक मन्नतें मांगने आते हैं। मां भक्तों की मुरादें पूरी करती हैं।
विज्ञापन

2 of 5
MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
निचलौल के तत्कालीन जमींदार महेश्वरी दत्त पांडेय ने दशको पूर्व देवी का आह्वान कर नेपाल के पहाड़ियों से माता को पिंडी स्वरूप में यहां लाकर स्थापित किया था। तब से शक्ति स्वरूपा मां दुर्गा ग्राम टिकुलियां में 'टिकुलियां माई' के नाम से पूजी जा रही हैं।
विज्ञापन

3 of 5
MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
जनश्रुतियों के अनुसार जमींदार की इच्छा, देवी के अंश पिंड को पूजन अर्चन के लिए नेपाल के पहाड़ों से अपने घर ले जाने की थी। जमींदार परिवार के वंशज ओम प्रकाश पांडेय कहते हैं कि पिंड रूप में माता को एक विशेष डोली में लाया जा रहा था। नेपाल के पहाड़ियों से चलने के क्रम में एक गांव का सीवान पार करने पर एक बकरे की बलि दी जानी थी। लेकिन निचलौल नगर सटे ग्राम टिकुलहियां आने पर बलि के बकरे खत्म हो गए। बकरे के इंतजाम में काफी समय लग गया।

4 of 5
MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
इधर ज्यादा समय तक माता की डोली उठाए लोग थक चुके थे, जिसके चलते कहारों ने डोली नीचे रख दी। बकरा लाकर बलि देने के बाद माता की डोली को उठाने का काफी प्रयास किया गया लेकिन डोली नहीं उठ पाई। ऐसे में जमींदार ने माता की पिंडी को समीप के एक वृक्ष के नीचे स्थापित कर दिया। वे जीवन भर माता की पूजा अर्चना टिकुलियां आकर करते रहे। जमींदार परिवार के लोग आज भी टिकुलियां माता की पूजा अर्चना करते हैं।

मंदिर के मुख्य सेवादार अजय कुमार जायसवाल ने बताया कि मंदिर में नवदेवी के मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा एवं मंदिर के जीर्णोधार के उपलक्ष्य में हर साल चैत्र नवरात्र के अवसर पर तीन दिवसीय टिकुलहियां मंदिर महोत्सव का आयोजन होता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
MaharajGanj news - फोटो : अमर उजाला।
पुराना तलवार आज भी सुरक्षित
बलि देने में प्रयुक्त पुराना तलवार व डोली का खंभा आज भी जमींदार परिवार के घर सुरक्षित है। आज भी यहां बलि की प्रथा है। नवरात्रों में नवमी के दिन मनौती मानने वाले इस स्थान पर बकरे की बलि देते हैं।

जंगल से निकलकर एक शेर आता था
टिकुलहियां गांव के बुजुर्ग बताते हैं कि पहले इस स्थान पर पूरब के जंगल से निकलकर एक शेर आता था। शेर के आने व गर्जना सुनने की गवाही कई बुजुर्गों ने पहले दिया है। आगे चलकर इस स्थान पर तत्कालीन पुजारी रामसुभग व विजय केडिया आदि ने मिलकर एक छोटा सा मंदिर बनवाया था। प्राचीन मंदिर के स्थान पर ही अब मंदिर कमेटी ने एक भव्य विशाल मंदिर का निर्माण कराया है।
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें