आप कभी समय निकालकर गोरखपुर स्थित गोरखनाथ मंदिर का भृमण करें। आपको वहां की दीवारों पर जगह-जगह कुछ लाइनें लिखी हुई मिलेंगी। ये लाइनें गोरख वाणी की हैं। ये लाइनें नाथपंथ को मानने वाले योगियों के लिए गुरुमंत्र हैं। उनके जीवन के आचार-व्यवहार एवं संस्कार हैं। इन्हीं लाइनों में से एक है- "हिंदू ध्यावे देहुरा, मुसलमान मसीत, जोगी ध्यावे परम पद, जहां देहुरा न मसीत"।
इसका अर्थ है योगी मंदिर-मस्जिद का ध्यान नहीं करता। वह परमपद का ध्यान करता है। यह परमपद क्या है, कहां है? यह परमपद तुम्हारे भीतर है। इन लाइनों को नाथपंथ का मुख्यालय माना जाने वाला गोरक्षपीठ हर रूप में चरितार्थ करता है। रोजमर्रा के जीवन में ये आम है। विजयादशमी और मकरसंक्रांति के दिन से मंदिर परिसर में लगने वाले खिचड़ी मेले में तो इस परंपरा का जीवंत स्वरूप देखने को मिलता है। बतौर मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का बार- बार सार्वजनिक रूप से यह कहना कि तुष्टीकरण किसी का नहीं, सम्मान सबको, के पीछे भी यही भाव है। कुछ उदाहरणों से इसको और बेहतर तरीके से समझा जा सकता है।