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पल-पल मौत से लड़कर तरक्की की राह बना रहीं स्निग्धा, लाइलाज बीमारी भी नहीं तोड़ सकी इनका हौसला

Sun, 24 Jan 2021 05:30 PM IST
vivek shukla अमर उजाला नेटवर्क, गोरखपुर।
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लाइलाज बीमारी पर स्निग्धा का हौसला भारी। - फोटो : अमर उजाला।
उत्तर प्रदेश के गोरखपुर जिले की बेटी स्निग्धा को लाइलाज बीमारी है, लेकिन उनके सपने बड़े हैं। जिंदगी और मौत में आंखमिचौली खेलते हुए उन्होंने नेट पास कर लिया है। उनका सपना प्रोफेसर बनने का है। बचपन से ही अपने हौसलों की वजह से वह जीवन की राह आसान कर रही हैं।
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ढाई महीने की उम्र से ही मेजर थैलेसीमिया से ग्रसित हैं स्निग्धा - फोटो : Facebook @Snigdha Chatterjeê
शहर के जेल बाईपास रोड की रहने वाली स्निग्धा न केवल बेटियों, बल्कि बड़ों के लिए भी मिसाल हैं। ढाई महीने की उम्र से ही वह मेजर थैलेसीमिया से ग्रसित हैं। इस बीमारी में हर पल जान का खतरा बना रहता है।
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नेट में सफल होकर अब जेआरएफ की तैयारी में जुटी हैं स्निग्धा। - फोटो : Facebook @Snigdha Chatterjeê
लाइलाज और जानलेवा बीमारी भी स्निग्धा के सपनों को ग्रसित नहीं कर सकी। अच्छे नंबरों से बेसिक और स्नातक की पढ़ाई पूरी करने के बाद स्निग्धा ने नेट भी पास कर लिया है। अब वे जेआरएफ (जूनियर रिसर्च फैलोशिप) की तैयारी में जुटी हैं।

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स्निग्धा को हर 15 दिन पर होती है दो यूनिट ब्लड की जरूरत। - फोटो : अमर उजाला।
15 दिनों में दो यूनिट ब्लड की जरूरत
एलआईसी में अभिकर्ता सनत चटर्जी की पुत्री स्निग्धा को हर 15 दिनों में दो यूनिट ब्लड की जरूरत होती है। ब्लड ट्रांसफ्यूजन के लिए महीने में दो बार उन्हें लखनऊ जाना पड़ता है। इसमें दो दिन की भी देरी हो जाए तो सांस लेने में दिक्कत होने लगती है। बावजूद इसके स्निग्धा न कभी डरीं और न उनका हौसला डगमगाया। उनका सपना प्रोफेसर बनने का है।
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प्रोफेसर बनना चाहती हैं स्निग्धा। - फोटो : Facebook @Snigdha Chatterjeê
सनत चटर्जी बताते हैं कि उनकी बेटी जब ढाई महीने की हुई, तब जांच के दौरान पता चला कि वह मेजर थैलेसीमिया से ग्रसित है। महीने में दो से तीन बार ब्लड का ट्रांसफ्यूजन कराना ही पड़ेगा। साल में करीब 25 बार ट्रांसफ्यूजन से बेटी के हाथों की नसें सूखने लगीं। दर्द भी बहुत होता था, लेकिन स्निग्धा ने हार नहीं मानी। वह रोज स्कूल जाती थीं और पूरा समय पढ़ाई पर देती थीं।
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