फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

कोरोना को मात देने में जुटे हैं धरती के 'भगवान', इनकी भूमिका जानकर आप भी करेंगे सलाम

Sun, 12 Apr 2020 10:53 AM IST
vivek shukla अमर उजाला ब्यूरो, गोरखपुर
विज्ञापन
1 of 5
gorakhpur news - फोटो : अमर उजाला
कोरोना वायरस महामारी के संकट से निपटने में स्वास्थ्य महकमे की सबसे बड़ी भूमिका है। सीमित संसाधनों के दम पर कोरोना से जंग लड़ने की प्रबल इच्छा शक्ति मेडिकल कोरोना वारियर्स को दिनों-दिन और मजबूत कर रही है। कोरोना वार्ड से लेकर उसके इंतजाम, होम क्वारंटीन से लेकर आइसोलेशन वार्ड की व्यवस्था सब इन्हीं के कंधों पर है।

सुबह से लेकर देर रात तक हर फोन पर मरीजों को सलाह देना, इसके बाद प्रशासनिक अधिकारियों के साथ बैठक कर रणनीति तैयार करने की भी जिम्मेदारी बखूबी निभा रहे हैं। इनका रुटीन ऐसा हो गया है कि परिवार को चंद घंटे नहीं दे पा रहे हैं। इसकी वजह से परिवार के लोग भी चिंतित हैं। मगर, फिलहाल इनका बस एक ही उद्देश्य है किसी भी तरह से कोरोना को परास्त करना।
विज्ञापन

2 of 5
सीएमओ डॉ श्रीकांत तिवारी। - फोटो : अमर उजाला
एक फोन आया और चल दिए ड्यूटी के लिए
सीएमओ डॉ श्रीकांत तिवारी का जिले की 126 से अधिक टीमों की जिम्मेदारी के बाद रोज आलाधिकारियों के साथ कोरोना को मात देने के लिए रणनीति बनाना ड्यूटी का अहम हिस्सा बन गया है। शुक्रवार की सुबह 11 बजे कार्यालय में मातहतों के साथ मीटिंग में व्यस्त थे।

कुछ फाइलें निपटा ही रहे थे कि अचानक एक आलाधिकारी का फोन आता है और सीएमओ सब छोड़कर कर निकल पड़ते हैं कोरोना मरीजों के लिए बने अस्पताल और वहां की सुविधाओं का हाल जानने। रोज की तरह क्वारंटीन में पांच हजार से अधिक लोगों की मॉनिटरिंग की जिम्मेदारी उनका हिस्सा बन गया है।

इसके बाद भी उत्साह से लबरेज रहते हैं। चरगांवा में कोरोना संक्रमित मरीजों के लिए बने अस्पताल का निरीक्षण कर उसकी हर व्यवस्था की मॉनिटरिंग देर शाम तक करते हैं। देर रात जैसे ही आरएमआरसी से रिपोर्ट आती है, तो उसकी जानकारी आलाधिकरियों के साथ शासन को भी देते हैं। 
विज्ञापन

3 of 5
डॉ एके सिंह, एअसाईसी, जिला अस्पताल। - फोटो : अमर उजाला
सोशल डिस्टेंसिंग पर ज्यादा है जोर
330 बेड के जिला अस्पताल की जिम्मेदारी एसआईसी डॉ एके सिंह के कंधों पर है। अस्पताल में बने कोरोना वार्ड की मॉनिटरिंग करने के साथ सुबह सात से लेकर रात 10 बजे अस्पताल को समय देना आदतों में शुमार है। शुक्रवार को वह अपने दफ्तर में बैठे थे। 10 बजे कुछ कर्मी उनके दफ्तर में आए और अस्पताल के इंतजामों पर चर्चा की।

इसके बाद वह उठकर जिला अस्पताल में बनी ओपीडी में इंतजाम देखने पहुंच जाते है। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन हो रहा है कि नहीं, इसका अनुपालन उनके लिए सबसे महत्वपूर्ण है। फ्लू के मरीजों की ओपीडी भीड़ में न चले, इसके लिए उसे दूसरे वार्ड में शिफ्ट कराने में अहम भूमिका इन्होंने ही निभाई।

अस्पताल के कर्मियों को जब सैनिटाइजर और मास्क की जरूरत पड़ी तो अपने कर्मियों के सहयोग से अस्पताल में मास्क और सैनिटाइजर बनवा डाले, इसके बाद से दोनों की कमी दूर हो गई। दे रात 12 बजे तक फोन पर उपलब्ध रहकर डॉक्टर, कर्मियों और मरीजों की समस्या सुनते हैं।

4 of 5
प्राचार्य बीआरडी मेडिकल कॉलेज के डॉ गणेश कुमार। - फोटो : अमर उजाला
मरीजों की सुविधाओं का ख्याल रखना पहली प्राथमिकता
बीआरडी मेडिकल कॉलेज में लॉकडाउन के बाद भी मरीजों की भीड़ है। जिले में सबसे बड़ा आइसोलेशन वार्ड भी यहीं बनाया गया है। इसकी जिम्मेदारी बीआरडी मेडिकल कॉलेज के प्राचार्य डॉ गणेश कुमार को सौंपी गई है। सुबह नौ बजे के करीब वह डॉक्टरों और कर्मियों के साथ बैठक कर रहे थे।

बैठक खत्म होने के बाद वह सुरक्षा के साथ आइसोलेशन वार्ड में पहुंचे और मरीजों की स्थिति के बारे में जाना। उन्हें बताया गया कि चार मरीज भर्ती है। इस पर उन्होंने हिदायत दी कि सांस फूलने वाले सभी मरीजों का सैंपल लेकर जांच के लिए आरएमआरसी भेजा जाए। इस बीच जैसे ही जानकारी मिलती है कि कमिश्नर और डीएम निरीक्षण के लिए आने वाले हैं, तत्काल बाहर आकर दोनों अधिकारियों को मेडिकल कॉलेज का निरीक्षण कराते हैं।

इसके बाद देर रात तक डॉक्टरों और पैरामेडिकल स्टाफ के साथ बैठक कर मरीजों को मिलने वाली सुविधाओं पर चर्चा करते हैं। कहते हैं कि मरीजों की सेवा में कोई चूक न होने पाए, यही  कोशिश रहती है। कॉलेज की पूरी टीम कोरोना से लड़ने में अहम भूमिका निभा रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन

5 of 5
जिला नोडल अधिकारी डॉ आईबी विश्वकर्मा। - फोटो : अमर उजाला
फोन से घबराते नहीं, एक फोन पर चले जाते मरीजों को देखने
दिल्ली और लखनऊ जाने वाले गोरखपुर के सभी फोन कोरोना के नोडल अफसर बनाए गए डॉ आईबी विश्वकर्मा के पास ट्रांसफर होते है। रोज सभी फोन अटैंड कर मरीजों की बात सुनना और उन्हें सलाह देना उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया है। सुबह 10 बजे के करीब उनके पास एक फोन जैसे ही कटता है, दूसरा आ जाता है।

तरह-तरह के सवाल उनसे फोन पर किए जाते है। लेकिन बेहद सरल ओर सहज तरीके से उन बातों का जवाब देते है। 10.15 बजे के आस-पास एक आलाधिकारी का फोन आता है और उधर से सवाल रहता है कि क्या टीबी अस्पताल में भर्ती मरीज की रिपोर्ट आ गई है।

वह बताते हैं कि अब तक रिपोर्ट नहीं आई है। इसके बाद वह उठकर प्राइवेट संस्थान के कर्मियों और सरकारी स्वास्थ्य कर्मियों को कोरोना की ट्रेनिंग देने चले जाते हैं। उनकी बस एक ही अपील की है कि लोग लॉकडाउन का पालन करें। इसी से जंग जीती जा सकती है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें