imambara gorakhpur
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आसिफुद्दौला ने भेजा था ताजिया
रोशन अली शाह की इच्छा के मुताबिक, नवाब ने छह एकड़ के इस भू-भाग पर इमाम हुसैन की याद में मरकजी इमामबाड़े की तामीर शुरू कराई। 12 साल तक तामीरी काम चलता रहा, जो 1796 में पूरा हुआ। इमामबाड़े की तामीर करने के बाद अवध के नवाब आसिफुद्दौला ने सोने से बना ताजिया को यहां भेजा था। नवाब की बेगम ने भी चांदी का ताजिया इसी वजन या इससे कम कुछ कम वजन का भेजा। इमामबाड़े की दरों दीवार व सोने-चांदी की ताजिया में मुगलिया वास्तुकला रची बसी नजर आती है, जो ऐतिहासिकता का अनुभव कराती है।