गोरखपुर के पीपीगंज इलाके में 26 सितंबर को घर से 500 मीटर दूर मिले कलावती के शव के मामले का पुलिस ने खुलास कर दिया है। पौत्री ने गड़ासे से गला काटकर दादी की हत्या की थी। मां ने शव ठिकाने लगाने में मदद की थी। पुलिस ने दोनों को गिरफ्तार कर लिया है। पौत्री ने पूछताछ में कई चौंकाने वाले खुलासे किए हैं।
गोरखपुर की पुलिस ने पीपीगंज इलाके के भुईधरपुर गांव में कलावती हत्याकांड का पर्दाफाश कर दिया है। पुलिस के मुताबिक, हत्या के बाद पौत्री खुशी ने फर्श पर फैले खून को पोंछा लगाकर साफ कर दिया। इसके बाद दरी में शव को लपेट छप्पर में एक किनारे रख दिया। हत्या में इस्तेमाल गड़ासे को गोबर की ढेर में छिपा दिया ताकि कोई शक न करे। इस बीच बैंक से घर पहुंची मां उतरा जब खुशी को खोजते हुए छप्पर में पहुंची तो बेटी के कपड़े और शरीर पर खून के दाग देख दंग रह गई।
बेटी की आपबीती सुनने पर उसने शव को ठिकाने लगाने में मदद की। इसके बाद से किसी भी हाल में मुंह न खोलने की हिदायत दी। ये बातें खुशी ने पूछताछ के दौरान पुलिस से कहीं। पुलिस के मुताबिक, हत्या के बाद मां-बेटी ने शव को सड़क किनारे फेंक दिया। पुलिस को भ्रमित करने के लिए कलावती के शव के पास एक झोले में हंसिया रख दिया गया ताकि ऐसा लगे कि किसी ने खेत से लौटते समय हमला किया हो।
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दादी की हत्या( फाइल फोटो) की आरोपी बहु और पोती
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इस चाल से उन्होंने पुलिस को गुमराह करने की कोशिश की लेकिन जांच में जब फॉरेंसिक टीम ने भूसे के कमरे से खून के निशान पाए तो शक गहराने लगा। इसके बाद पुलिस ने मां-बेटी से अलग-अलग पूछताछ की तो खुशी टूट गई और वारदात की बात कबूल की। पुलिस ने खुशी की निशानदेही पर गोबर के ढेर से गड़ासा भी बरामद कर लिया।
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घटना का खुलासा करते हुए
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पुलिस को बेटी खुशी पर पहले से ही था शक
एपी नार्थ ने बताया कि जांच के दौरान जब भी पुलिस पूछताछ के लिए कलावती के घर जाती तो खुशी अपनी मां उतरा के पास ही बैठी रहती और सवालों से बचने की कोशिश करती। उसकी हरकतों से पुलिस को धीरे-धीरे उस पर शक होने लगा। इससे पहले पुलिस ने शव पर लिपटी हुई दरी के बारे में उतरा से पूछताछ की तो उसने खुद की दरी होने से साफ इन्कार कर दिया था। जब पुलिस ने उतरा के पति परदेशी यादव से पूछताछ कर फोटो दिखाया तो उसने दरी खुद खरीदकर घर लाने की बात कही।
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गिरफ्तार दोनों हत्यारोपी मां और बेटी
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
इस पर पुलिस को उतरा पर भी शक हो गया था। इधर खोजी कुत्ते के बार-बार नल के पास आने से भी पुलिस का शक गहराने लगा। पुलिस ने जब कड़ियां जोड़नी शुरू कीं तो वारदात का पर्दाफाश हो गया। पुलिस ने 300 से अधिक सीसीटीवी खंगाले लेकिन कहीं भी कलावती आते-जाते नहीं दिखी थीं।
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घटनास्थल पर शव मिलने पर जांच करती पुलिस
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
15 साल से खुशी के दिल में भरा था आक्रोश
खुशी ने पूछताछ में बताया कि जब से उसने होश संभाला, उसे दादी का कभी प्यार नहीं मिला। वह अक्सर बात-बात पर ताने मारतीं थीं। यहां तक की पढ़ाई छुड़ा कर नौकरानी जैसा बर्ताव करने लगी थीं। वह मुझे देखना भी पसंद नहीं करती थीं। यहां तक की उनके तानों से खाना पीना भी हराम हो गया था। उसने कई बार कलावती को मारना चाहा, लेकिन हिम्मत नहीं जुटा पाई थी। वारदात के दिन दोपहर में जब वह अपने छप्पर में सो रही थीं तो वहां पास में मौजूद गड़ासे से उनकी गर्दन पर एक के बाद चार वार कर सिर को धड़ से अलग कर दिया।
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खुलासा करने से पहले मौके पर पुलिस की टीम
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
गांव में मातम, हत्याकांड की चर्चा
गांव के लोगों का कहना है कि कलावती बेहद सरल और मिलनसार महिला थीं। उन्होंने कभी किसी से दुश्मनी नहीं रखी। महिलाएं और बुजुर्ग कलावती के घर पहुंचकर परदेशी यादव को ढांढस बंधा रहे थे। ग्रामीणों का कहना था कि खुशी जब तीन साल की थी तो परदेशी, उतरा को शादी करके यहां लाया था। ये बात सही है कि कलावती खुशी को परदेशी की बेटी नहीं मानती थी। वहीं परदेशी से हुए दो बेटों को वह अधिक दुलार करती थीं।
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हत्यारोपी
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
पत्नी व बेटी की करतूत सामने आने पर फूट-फूट कर रोया परदेशी
जब मां कलावती की हत्या में बेटी खुशी और उसकी पत्नी उतरा का नाम सामने आया तो परदेशी फूट-फूटकर रोने लगा। उसने रोते हुए कहा कि जिस बेटी को प्यार दिया, वही मां की दुश्मन निकली और पत्नी ने भी उसका साथ दिया। यह देखकर मौजूद ग्रामीणों की आंखें भी नम हो गईं।
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कलावती हत्याकांड
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
ऐसी घटनाएं दिखाती हैं समाज की विकृति
पारिवारिक सदस्यों द्वारा की जा हत्या जैसी घटनाएं अपनों केवल एक आपराधिक घटना नहीं बल्कि सामाजिक संरचना के विघटन का द्योतक हैं। प्रेम, सह अस्तित्व और नैतिक मूल्यों पर आधारित रही पारंपरिक भारतीय परिवार व्यवस्था अब आधुनिकता, उपभोक्तावाद और व्यक्तिवाद के दबाव में टूटने लगी है। आर्थिक असमानता, संपत्ति विवाद और बढ़ती आत्मकेंद्रित प्रवृत्तियां रिश्तों में तनाव पैदा कर रही हैं। दूसरी तरफ सामाजिक नियंत्रण के साधन जैसे समुदाय, नातेदारी एवं नैतिक अनुशासन अब प्रभावहीन हो गए हैं। संकटग्रस्त हो चुके पारिवारिक संबंधों की आत्मीयता और नैतिक बुनियाद को बचाने के गंभीर प्रयास करने होंगे।- डॉ. मनीष कुमार पांडेय, समाजशास्त्री, डीडीयू
मृतक महिला की फाइल फोटो( फाइल फोटो) और मौके पर जांच कर पुलिस
- फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी
ऐसे मामलों में वर्षों से जमा पारिवारिक तनाव, अस्वीकार भाव और भावनात्मक उपेक्षा गहरी मानसिक पीड़ा का रूप ले लेती है। बचपन में लगातार ताने, भेदभाव या अपमान का सामना करने वाले बच्चे अक्सर भीतर ही भीतर आक्रोश पाल लेते हैं। ''खुशी'' जैसे मामलों में भावनात्मक दमन की भूमिका प्रमुख होती है। लंबे समय तक दबे गुस्से और असुरक्षा की भावना ने उसके भीतर अपराध को एक समाधान के रूप में प्रस्तुत किया। यह मानसिक असंतुलन का संकेत है लेकिन इसे केवल क्रोध में की गई हत्या नहीं कहा जा सकता। परिवारों में संवाद की कमी, असमान व्यवहार व मानसिक स्वास्थ्य के प्रति लापरवाही ऐसे हादसों की जड़ में होती है।- डॉ. आकृति पांडेय, मनोवैज्ञानिक