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धरती से 80 किलोमीटर ऊपर जल जाते हैं उल्का पिंड
सोलर सिस्टम के निर्माण के दौरान जो छोटे खगोलीय पिंड बड़े ग्रह बनने से बच गए थे, ये सभी ग्रह और धरती की तरह की सूर्य की परिक्रमा करते हैं। उन्हें विज्ञान की भाषा में उल्का पिंड या टूटता हुआ तारा कहा जाता है। ये लोहा, सिलिका, निक्किल, सिलिकेट से बने होते हैं। वायुमंडल के प्रवेश के बाद ये धरती से 80 किलोमीटर की दूरी पर धर्षण की वजह सेे जलने लगते हैं।