जितेंद्र कुमार
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मुंबई में हर साल गांवों, कस्बों और शहरों से लाखों युवा आते हैं हीरो बनने, उनको ये समझना कितना जरूरी है कि एक्टिंग पहले दिन से पैसे नहीं देती?
ये बात सच है कि एक्टिंग से पैसा कमाना यहां आसान नहीं है। इसलिए यहां बसने का फैसला करने से पहले 2012 में मैं तीन महीने के लिए यहां हालात का जायजा लेने आया था। मुझे तब समझ में आ गया था कि यहां पहचान बनाने में वक्त लगेगा। अच्छा ये हुआ कि उसी समय यूट्यूब प्रचलन में आ गया। हम लोग वहीं अपना टैलेंट दिखाने लगे और फिर ये भी हुआ कि तमाम सारे निर्माता हमारे साथ आ गए और कहने लगे कि हमें भी ऐसा ही कुछ डिजिटल पर बनाना है। आया तो मैं फिल्मों में एक्टिंग करने ही था लेकिन होते होते आठ साल लग गए। आठ साल बाद मेरी पहली फिल्म गॉन केश सिनेमाघरों में रिलीज हुई। उसके बाद मेरी दूसरी फिल्म आई शुभ मंगल ज्यादा सावधान और अब ये फिल्म चमन बहार।
नीरज पांडे से लेकर अरशद वारसी, लारा दत्ता, सुष्मिता सेन सब डिजिटल पर इस साल आए। अभिषेक बच्चन और अक्षय कुमार भी कतार में हैं। इन सबके बीच पंचायत जैसी सीरीज हिट होने का अर्थ क्या है?
किरदारों और कलाकारों की अलग अलग दुनिया है। मेरी दुनिया अलग कहानियों की है। मैं अभी किरदारों पर ध्यान ही नहीं दे रहा। मेरा मकसद एक अलग सी कहानी कहना है जिसमें लोगों को ऐसा न लगे कि ये तो पहले भी देखा है या कि उसमें उनको बोरियत महसूस हो। फिलहाल मैं अच्छी और अलग तरह की कहानियों पर ध्यान केंद्रित कर रहा हूं। छोटे शहरों की कहानियां। जैसे कि मेरी अगली फिल्म है चमन बहार। एक पान वाले की लव स्टोरी।
Father's Day: सोनम कपूर से लेकर ट्विंकल खन्ना तक, बॉलीवुड सितारों ने दी फादर्स डे की शुभकामनाएं