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ब्रा पर बरपा हंगामा, इस मॉडल ने डाली ब्रा लेस फोटो

Sat, 03 Sep 2016 04:18 PM IST
अमित कर्ण, अमर उजाला
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आइटम नंबर, बिकनी और अंतरंग सीन के बाद हिंदी फिल्मों को सेंसर बोर्ड ने एक बार फिर अपने निशाने पर लिया है। कल उसने बार-बार देखो में उस सीन पर कट लगाने का ऐलान किया, जिसमें कट्रीना ब्रा पहने नजर आ रही हैं। तर्क यह दिया गया कि वैसे ड्रेस में महिलाओं को देख दर्शक बहक सकते हैं। खासकर टीवी के दर्शक। ऐसे में निर्माता या तो ए सर्टिफिकेट लें या फिर सैटेलाइट चैनल के लिए उन्हें वह सीन हटाना होगा। बोर्ड प्रमुख पहलाज निहलानी के इस तर्क को फिल्म जगत की अभिनेत्रियों ने हास्यास्पद करार दिया है। 
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बिग-बॉस की एक्स कंटेस्टेंट प्रिया मलिक ने अपने इंस्टाग्राम अकाउंट पर एक फोटो पोस्ट कर सेंसर बोर्ड का विरोध किया है। इस तस्वीर में उन्होंने अपनी ब्रा को पीछे टांगा हुआ है। साथ ही लिखा है कि सेंसर बोर्ड का ब्रा के चलते सीन को काटना हास्यापद है। जानिए इस बारें मे बॉलीवुड एक्ट्रेसेस की राय...
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सिर्फ ब्रा-बिकनी से नहीं बिकती फिल्में ः जैकलीन फर्नांडिस

अगर आप सम्रुद तट पर शूटिंग कर रहे हैं तो आपको सेक्सी दिखना पड़ेगा। हालांकि फिल्म की विशिष्टता सिर्फ बिकनी नहीं होती। मुझे याद है जब लोग 'दोस्ताना' में प्रियंका चोपड़ा के बिकनी पहनने को एक बड़ा मुद्दा बना रहे थे लेकिन हम जानते हैं कि उस फिल्म में इसके अलावा और भी बहुत कुछ था। फिल्मों को लोगों ने सौफ्ट टारगेट बना लिया है। नैतिक मूल्यों को ढोने की जिम्मेदारी उसके कंधों पर ही लाद दी गई है।

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हम अब सोच के स्तर पर हो चुके हैं तंग ः- लीजा हेडेन

लीजा हेडेन कहती हैं, नग्नता बतौर शर्म हमारे कल्चर के लिए नया कौंसेप्ट है। 18 वीं और 19 वीं सदी में केरल में महिलाओं को उनके स्तनों को ढंक कर रखने की मनाही थी। वह असभ्य होने का प्रतीक माना जाता था। खासकर कोचीन और मालाबार इलाकों की औरतों में। बहरहाल इस में हम न जाएं। मेरा बस यही कहना है कि हमारी सोच ड्रेसिंग तक ही क्यों अटकी हुई है? क्यों इसे भी आज हौव्वा बनाकर पेश किया जाता है। लोग फिल्मों से वाकई इतना प्रभावित होते हैं तो वे उससे अच्छी चीजें क्यों नहीं सीखते?
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गांव, गली व कूचों में क्यों होते हैं रेप ः- मिष्टी चक्रवर्ती

अगर ड्रेसिंग के चलते ही लड़कियों का रेप होता है तो गांव व गली-मोहल्ले में रहने वाली लड़कियों के रेप ही नहीं होते। लिहाजा यह तर्क तो कहीं नहीं टिकता कि छोटे ड्रेस में होने की वजह से लड़कियों का बलात्कार होता है। दरअसल आज भी मर्द जात यह नहीं सीख सका है कि वह औरतों के संग कैसे पेश आए। बात-व्यवहार में सहज भाव कैसे रखा जाए। यह जब तक नहीं होगा, तब तक लड़कियों पर ऐसी ही पाबंदियां लगती रहेंगी। सेंसर बोर्ड भी उसी रूढिवादी सोच को दर्शा रहा है। 
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सर्टिफिकेट की है मारामारी ः- स्वरा भास्कर

इस मामले में अलग राजनीति हो रही है। वह यह निर्माता बगैर कट्स के सैटेलाइट राइट के लिए भी यूए सर्टिफिकेट चाह रहे हैं। वह सेंसर बोर्ड नहीं देना चाहता। इसलिए कि टीवी के दर्शक वर्ग के संस्कार खराब हो जाएंगे। उसका ऐसा सोचना बचकाना लगता है। हम इंटरनेट क्रांति के दौर में हैं, जहां कंप्यूटर के कीबोर्ड पर एक क्लिक की दूरी पर हर उम्र वर्ग को सब कुछ हासिल है। सेंसर बोर्ड ठीक उस तरह काम कर रहा है, जैसे रेप विक्टिम के ही चरित्र पर सवाल उठा दिया जाता है। जरूर लड़की ने ही छोटे कपड़े पहने होंगे? यह कह दिया जाता है। दरअसल सेंसर बोर्ड के एक खास प्रमुख मौजूदा सरकार की सोच जाहिर कर रहे हैं। तभी कभी आइटम नंबर तो कभी सिगरेट न दिखाने की अपील की जाती रही है। हम अपने लोगों की इंटेलिजेंस पर सवाल खड़े कर रहे हैं। पहनना तो छोड़िए जनाब, जब सिस्टम हमारे खान-पान की आदतों तक को अपने हाथों में लेना चाहता है तो और क्या कहा जाए?
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