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Geetanjali Mishra: सबसे पहले मैं महादेव को राखी बांधती हूं, जीवन में मां से बड़ा रक्षक दूसरा कोई नहीं

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गीतांजलि मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
धारावाहिक ‘क्राइम पेट्रोल’ की अनगिनत कड़ियों में अलग अलग किरदारों में दिखती रहीं अभिनेत्री गीतांजलि मिश्रा इन दिनों धारावाहिक ‘हप्पू की उलटन पलटन’ में राजेश का किरदार निभा रही हैं। हास्य में उनका ये पहला प्रयोग है और वह मानती हैं कि दर्शकों को रुलाना आसान है, लेकिन हंसाना एक गंभीर विषय है। गीतांजलि मिश्रा से ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल की एक खास मुलाकात।
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गीतांजलि मिश्रा, हप्पू की उलटन पलटन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
धारावाहिक हप्पू की उलटन पलटन के महिला किरदारों के नाम मर्दाना होने की कोई खास वजह?
जैसा कि आप जानते ही हैं ये एक हास्य धारावाहिक है। मेरे किरदार का नाम राजेश है। उसकी मम्मी का नाम अवधेश है। बहन का नाम विमलेश है। आपने सही कहा कि ये सबके सब नाम मर्दाना है और वह इसलिए कि ये सारी की सारी दबंग दुल्हनिया हैं। धारावाहिक की कहानी और पृष्ठभूमि ही ऐसी है कि आपको इनके किरदार अपनी तरफ खींच ही लेते हैं।

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गीतांजलि मिश्रा, हप्पू की उलटन पलटन - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कहते हैं कि लोगों को रुलाना बहुत आसान है लेकिन हंसाना मुश्किल..
रोने का तो क्या है कि बहुत मार्मिक दृश्य हो तो खुद ब खुद आंसू आ जाते हैं। और नहीं आते हैं तो हमारे ‘दो बूंद जिंदगी की’ (ग्लिसरीन) हमारे काम आती ही रहती हैं। हम कहते भी हैं मेकअप दादा से कि अरे भाई टीआरपी दे दो। लेकिन, मुझे ऐसा लगता है कि हंसाना जो है वो ज्यादा गंभीर विषय है। आप किसी लाइन में पंच मार रहे हैं ऐसा लगना नहीं चाहिए कि ऐसा किया जा रहा है। इसे स्वाभाविक रखना ही असल चुनौती है।

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गीतांजलि मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपकी पारिवारिक पृष्ठभूमि वाराणसी की है और उत्तर प्रदेश में तंज कसना रोजमर्रा की जिंदगी में शामिल है, इससे भी मदद मिलती है आपको हास्य अभिनय में?
बिल्कुल सही बात कही आपने। हमारे यहां की तो बातचीत में ही व्यंग्य बाण छुपे होते हैं। मां, बेटी को व्यंग्य कस देगी। सास, बहू को ताना मार देगी। हमारे धारावाहिक में भी हमारी जो सास है कटोरी देवी, वह भी बात बात में ऐसा करती दिखती ही हैं। लेकिन ये जो पारिवारिक नोकझोंक है, यही एक खूबसूरत रिश्ते की अच्छी पहल होती है।
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गीतांजलि मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अब तो खैर एकल परिवार का समय है, नहीं तो पहले देवरानी-जेठानी या फिर देवर-भाभी के रिश्ते होते ही शायद इसीलिए थे कि घर में माहौल हल्का फुलका रहे
वाराणसी एयरपोर्ट से 60 किमी दूर स्थित सुरियावां से मेरा नाता है। हमारे परदादा नौ भाई और एक बहन थे। 160 लोगों का परिवार यूं लगता था कि जैसे कोई छोटा मोटा कस्बा ही हो अपने आप में। कभी शादी ब्याह मे जाते हैं तो लगता है कि बरात लाने की तो जरूरत ही नहीं है इतने तो हम सभी खुद हैं। ये संयुक्त परिवार की बातें हमें संवाद अदायगी में, ताने मारने में या फिर मुहावरों को असरदार तरीके से बोलने में बहुत मदद करती हैं।
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गीतांजलि मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, हिंदी सिनेमा में महिला हास्य कलाकारों की विलुप्त होती परंपरा के बारे में क्या कहेंगी?
दुर्भाग्य है हिंदी सिनेमा का कि न तो ऐसे किरदार लिखे जाते है और न ही किसी अभिनेता या अभिनेत्री की छवि अब ऐसी है जिसे हम कह सकें कि ये हास्य कलाकार हैं और वाकई में उम्दा काम करते हैं जिन्हें फॉलो किया जा सकता है। इस समय जो कलाकार हैं वह खुद ही सब कुछ कर लेना चाहते हैं और उनसे ऐस कराया भी जा रहा है।
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गीतांजलि मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हास्य रस के विभावों में भी हिंदी सिनेमा में हम दो प्रकार के भाव देखते हैं एक तो जो परिस्थिति जन्य है जैसे ऋषिकेश मुखर्जी का सिनेमा या फिर डेविड धवन जैसा सिनेमा जिसमें आलंबन और उद्दीपन जैसे विभाव प्रभावी हो जाते हैं..
मुझे लगता है हास्य का असली रस है वही है जो जीवन के भावों मे है। अगर हम पुरानी फिल्मों को देखेंगे तो हास्य रस जिस तरह प्रस्तुत किया जाता था वह ज्यादा प्रभावित करता है। अभी थोड़ा छिछोरापन दिखता है। अभी जैसे मेरे घर में सब साथ रहते हैं तो लगता है कि थोड़ा ज्यादा हो गया है चैनल चेंज कर लो। बिलो द बेल्ट कॉमेडी होती है। जिस तरह से महिला किरदारों के प्रति कोई तयशुदा एक प्रतिबिंब बनाकर उनको निशाना बनाया जाता है तो वह थोड़ा अटपटा लगता है।

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गीतांजलि मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपके पिता कन्हैया लाल मिश्र का जब देहांत हुआ तब आप तीन साल की थीं और फिर आपकी मां शांति देवी ने ही आप दोनों बहनों को पाल पोसकर बड़ा किया। मां की इस शख्सियत का आप पर कितना असर रहा है?
मैं आज जो भी हूं जहां भी हूं, सिर्फ और सिर्फ अपनी मां की वजह से हूं। मैं एक ऐसे परिवार से हूं जहां फिल्म या फिल्मी बात का कोई जिक्र भी नहीं होता। आज भी जब हम घर जाते हैं तो पुराने रीति रिवाज का पालन करते हैं। बड़े पापा घर में होते हैं तो मम्मी कहती हैं, जेठ की परछाई नहीं पड़नी चाहिए। ऐसे परिवार से होने के बावजूद माताजी ने निर्णय लिया कि वह अपनी बेटियों को लेकर मुंबई में ही रहेंगी और अपने बच्चों की परवरिश अपने हिसाब से करेंगी।
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गीतांजलि मिश्रा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रक्षाबंधन का त्यौहार नजदीक है, यहां मुंबई में किसी को भाई बनाया आपने?
जो प्रथा चली आ रही है हमारे यहां, ऐतिहासिक रूप से तो वही है कि भाई को राखी बांधी जाए। लेकिन, रक्षा बंधन के दिन सबसे पहले मैं महादेव को राखी बांधती हूं। वही हमारे रक्षक हैं। मेरे आराध्य हैं। पूजा करती हूं उनकी तो सबसे पहली राखी उन्ही को बांधती हूं। फिर गणेश जी को बांधती हूं। और, फिर चाचा के लड़के को। वैसे मेरा मानना है कि राखी जो है वह रक्षा का बंधन है और किसी बच्चे की रक्षा सबसे पहले उसकी मां करती है। मुझे लगता है कि उससे बेहतर रक्षक हमारे जीवन में दूसरा कोई नहीं है। 
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