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Sooraj Barjatya: मैंने प्यार किया नहीं चलती तो राजश्री की आखिरी फिल्म होती, रीडर्स डाइजेस्ट से मिला क्लाइमेक्स

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सूरज बड़जात्या - फोटो : अमर उजाला
हाल ही में घोषित राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कारों में फिल्म ‘ऊंचाई’ के लिए सर्वश्रेष्ठ निर्देशक का पुरस्कार सूरज बड़जात्या को मिला है। स्क्रीन राइटर्स एसोसिएशन के कार्यक्रम ‘वार्तालाप’ में इस बार सूरज की बारी रही और इस दौरान उन्होंने अपनी फिल्मों की मेकिंग के दिलचस्प किस्से सुनाए। उन्हीं की जुबानी पढ़िए ये किस्सा उनकी पहली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ की मेकिंग का...
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मैंने प्यार किया - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
‘मैंने प्यार किया’ हमारी आखिरी फिल्म होती
राजश्री की कई फिल्में चली नहीं थीं उन दिनों, तो ये था कि ‘मैंने प्यार किया’ बनेगी और अगर नहीं चलेगी तो ये आखिरी फिल्म होगी हमारी। पिताजी (राजकुमार बड़जात्या) ने कहा कि पहली पिक्चर है ये तुम्हारी तो ‘बी सेफ’। आप यकीन नहीं करेंगे कि उन्होंने मुझे लिखकर दिया एक टेम्पलेट कि ‘मुगले आजम’ बनाना है। एक अकबर होगा। एक सलीम होगा। एक अनारकली बाहर से आएगी। मोहब्बत होगी और फिर सलीम जाएगा। मैंने कहा ये तो बन चुका है। मैं क्या बनाऊं? उन्होंने कहा कि यही बनेगा लेकिन तुम अपने हिसाब से बनाओ। लेखक के बारे में पूछा तो निर्देश मिला कि तुम लिखो। मैंने कहा, मैंने कभी ऐसे नहीं लिखा। उन्होंने सीधे कहा, मुझे ऐसे वाला चाहिए ही नहीं।
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सूरज बड़जात्या व जमा हबीब - फोटो : अमर उजाला, मुंबई

मैं लिखता गया, फिल्म बनती गई

‘मैंने प्यार किया’ (1989) का हीरो 21 साल का है। मैं तब 21 का होने वाला था। पिताजी ने कहा कि जो जिंदगी तुमने जी है, वो लिखो। मुझे कुछ समझ नहीं आ रहा था। मैंने पहला सीन वह लिखा जहां सुमन को प्रेम के घर से निकाला जाता है और उसके पिता आ जाते हैं। ये कुछ ऐसा था कि अकबर अपने महल से अनारकली को निकल जाने को कह रहे हैं और उनके पिता आ जाएं। सुमन के पिता तब कहते हैं, आपका घर अगर फाइव स्टार होटल है तो मैं इसमें रहने की कीमत चुकाऊंगा। मुझे फिल्म लेखन का विज्ञान भी नहीं पता था कि फर्स्ट एक्ट क्या होता है, सेकंड एक्ट क्या होता है, थर्ड एक्ट क्या होता है। मैं लिखता और मेरे पिताजी अलग करते जाते कि ये थर्ड एक्ट में जाएगा, ये फर्स्ट एक्ट में जाएगा, ये सेकंड में..वगैरह वगैरह।

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सलमान खान और सूरज बड़जात्या - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कैसा होगा हीरो?
मेरे पिताजी ने मुझसे जब सवाल किया कि मेरी फिल्म को हीरो कैसा होगा तो मैंने साफ कहा कि वह लव एट फर्स्ट साइट वाला तो होगा नहीं क्योंकि ऐसा होता नहीं है। तो सवाल कि फिर वह अनारकली से मिलेगा कैसे? मैंने कहा कि वह तीर-वीर तो मारेगा नहीं, हां कॉलेज में लड़का, लड़की साथ में रहते हैं तो लोग क्या क्या अफवाहें करते हैं। ब्लैकबोर्ड पर लिख देते हैं कि इनको प्यार है, वगैरह वगैरह। पिताजी ने कहा कि हां, तुम ये लाओ। मैंने पूछा भी कि अब लड़का और लड़की दोस्त भी होते हैं, आपको चलेगा? जवाब मिला कि वही चाहिए जो आपका चल रहा है। उनके शब्द थे, मुझे सिर्फ चाहिए प्यार की ऊंचाइयां और रिश्तों की गहराइयां। पटकथा तैयार हो गई तो संवाद की बारी आई। मुझे तब हिंदी ठीक से बोलनी नहीं आती थी तो मैंने जो अंग्रेजी में लिखा था, सीधा उसे हिंदी में अनुवाद कर दिया, ए बॉय एंड ए गर्ल कैन नेवर बी फ्रेंड्स, उसका पूरा का पूरा ट्रांसलेशन लिख दिया, एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं हो सकते।
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रीमा लागू और सलमान खान - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई

मां जैसी प्रेम की मां, गर्लफ्रेंड जैसी सुमन

पिताजी ने मुझे सिर्फ इतना कहा कि मुझे मौलिकता चाहिए। मुझे तुम्हारी जो उपज है, जो जिंदगी तुमने जी है। जैसी मां को देखा है, मुझे वो चाहिए। फिल्म में प्रेम की मां बनी रीमा लागू जी में मेरी मां की छवि है। सुमन में उस लड़की की छवि है जिसे मैं बहुत पसंद करता था। उस एहसास के लम्हे हैं। मैंने अपनी बहन, चाचा, मामी में जो जो देखा, वही सब मैं लिखता गया। पिताजी बस पूछते कि इन दिनों क्या चलता है? वह बोलते गए, मैं लिखता गया। वही सलमान करते गए। हमें पता ही नहीं चला और फिल्म बन गई। लेकिन, अब मैं पीछे मुड़कर देखता हूं तो मुझे असल की ताकत और जिंदगी के अहसासों की ताकत का अंदाजा होता है।

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सूरज बडजात्या को मोमेंटो देते हुए जमा हबीब - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लोगों ने डराया भी लेकिन...
प्रेम कहानियां सब एक जैसी होती हैं। लेकिन, जो आपने जीया है, उसे कोई दूसरा नहीं बना सकता। एक बात मैं साझा करता हूं कि ओलिवर स्टोन एक फिल्म बना रहे थे, ‘प्लाटून’। नए निर्देशक, नया सेटअप। तभी शायद डिज्नी ने वियतनाम युद्ध पर एक फिल्म घोषित कर दी। सबने कहा कि आपको तो फिल्म बंद करनी पड़ेगी। ओलिवर ने पूछा कि वह फिल्म कौन निर्देशित कर रहा है। लोगों ने नाम बताया। ओलिवर बोले, नथिंग टू वरी। मैंने वियतनाम युद्ध लड़ा है। वह तो वियतनाम के किसी शहर तक नहीं गया। तो सिनेमा वही जो हम जीते हैं। मैं सब लेखकों से कहता हूं कि आपने जो जीया है, उस पर एक फिल्म जरूर लिखकर रखिए। बाकी काम आप करते रहिए। जब इस स्क्रिप्ट का नंबर आएगा बनने का, तो जमाना देखेगा।
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सूरज बड़जात्या व सुधेंदु रॉय - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
रचनात्मक लेखन में पढ़ाई बेहद अहम
फिल्म जगत में आने वाले हर निर्देशक और लेखक से मैं बार बार कहता हूं कि पढ़िए जरूर। अखबार पढ़िए। न हो सके तो कुछ भी पढ़िए। और, वह इसलिए कि इसी ने मेरी पहली फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ को एक मजबूत क्लाइमेक्स दिया। यहां मैं कला निर्देशक से फिल्म निर्देशक बने सुधेंदु (रॉय) दा के प्रति आभार जताना चाहूंगा कि वह रीडर्स डाइजेस्ट की एक कहानी पर फिल्म बनाने का विचार लेकर पिताजी के पास आए थे, जिसका नाम था ‘सॉयल्ड नोट्स’। एक लड़का अपनी प्रेमिका के पिता का दिल जीतने के लिए मेहनत से कमाकर रुपये लाता है और वे भीग जाते हैं। मेरी फिल्म बन रही थी तो पिताजी महबूब स्टूडियो गए सुधेंदु दा से मिलने कि मुझे वह कहानी चाहिए। उन्होंने छूटते ही कहा, तुम्हारे बेटे की पिक्चर है, ले जाओ। तुम क्लाइमेक्स बनाओ।
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अपने पिता राजकुमार बड़जात्या के साथ सूरज बड़जात्या - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अभिभावकों की बात सुनना बेहद जरूरी
मेरे पिताजी ने सिनेमा बहुत पढ़ा था। उन्होंने मुझे भी कहा कि मैंने खूब पढ़ा है, तुम्हें पढ़ने की नहीं, गढ़ने की जरूरत है। पढ़ाई का मैं बताऊंगा। बस तुम लिखते जाओ। लिखते जाओ, लिखते जाओ, लिखते जाओ। मैं लिखता गया। वह सार, सार इकट्ठा करते रहे। थोथा, थोथा फेंकते गए। छांटते वह गए, नाम मेरा हुआ। किसी शख्स को मौलिक लिखने की छूट मिलना बहुत बड़ी ताकत है। ये बहुत कम लोगों को मिलती है। फिल्म ‘मैंने प्यार किया’ इतनी बड़ी हिट हुई कि उसके बाद मुझे अगली फिल्म लिखने में ढाई साल लग गए और इस दौरान दो बार मेरा ईसीजी भी हो गया।

यह पूरा वार्तालाप आप यहां देख सकते हैं..

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