'कौन बनेगा करोड़पति' के बाद सिद्धार्थ बसु डिजिटल प्लेटफार्म पर लोगों को करोड़पति बनने का मौका देने जा रहे हैं। सिद्धार्थ बसु ने सोनी लिव पर "क्विजर ऑफ द ईयर" नामक डिजिटल शो की शुरुआत की है, जिससे जुड़कर कोई भी इस गेम को खेल सकता है। इस शो को लेकर सिद्धार्थ बसु ने अमर उजाला से खास बातचीत की।
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सिद्धार्थ बसु
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
'क्विजर ऑफ द ईयर' किस तरह का शो है और यह केबीसी से कितना अलग है?
इस शो का फॉर्मेट केबीसी से बिल्कुल ही अलग है। इस शो से कोई भी जुड़ सकता है, लेकिन यह शो छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है। ज्ञान कहीं से भी मिले हर जगह से ज्ञान को आत्मसात करना चाहिए। छात्र सोनी लिव ऐप पर एक साधारण पंजीकरण के साथ आसानी से इसमें भाग ले सकते हैं और इसके बाद हर दिन सात सवालों के जवाब दे सकते हैं। इसमें दैनिक, साप्ताहिक और मासिक पुरस्कार जीतने का अवसर होगा। अंतिम विजेता को एक करोड़ की शैक्षिक छात्रवृत्ति मिलेगी।
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सिद्धार्थ बसु
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इस शो का ख्याल कैसे आया?
जब 2017 में केबीसी में पहली बार प्ले अलॉन्ग शुरू किया तो उससे केबीसी की पहुंच बहुत ज्यादा लोगों तक पहुंची। अगर केबीसी के प्ले अलॉन्ग में 20 लाख लोग खेलते हैं, जो 45 या फिर 60 दिन चलता है। बाकी साल उनको क्या करना है? फिर हमने सोचा कि एक ऐसा कार्यक्रम बनाए जिससे लोग सही ज्ञान सीखे, क्योंकि बहुत सारी गलत जानकारियां इंटरनेट पर मौजूद हैं। ऐसा सिर्फ हमारे देश में नहीं बल्कि सारी दुनिया में है। हमारा एक प्रयास है कि लोगों का सामान्य ज्ञान बढ़ाया जाए। डिजिटल का फायदा यह है कि कोई भी यूजर अपने टाइम के हिसाब से खेल सकता है। अभी भी सबसे ज्यादा लोग रात के 12 बजे के बाद ही खेलते हैं।
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सिद्धार्थ बसु
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, केबीसी के साथ आपका अब क्या रिश्ता है?
कौन बनेगा करोड़पति मेरा लाइफ टाइम अचीवमेंट है। केबीसी से मेरा रिश्ता साल 2000 से 2021 तक रहा। अब हमारा केबीसी के साथ संपर्क नहीं रहा। इसको हमने देश की नौ भाषाओं में प्रोड्यूस किया है जिसमें तमिल, मलयालम, कन्नड़, भोजपुरी, बांग्ला, कश्मीरी आदि भाषाएं शामिल हैं।
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दस का दम
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपने 'दस का दम' भी शुरू किया था, यह शो आगे फिर नियमित रूप से नहीं चल पाया, इसकी क्या वजह मानते हैं?
'दस का दम' के दो सीजन हमने किए थे और आखिरी सीजन किसी और ने किया था। यह चैनल और व्यूवर पर निर्भर करता है कि उसको आगे जारी रखना है या नहीं। 'दस का दम' में सलमान खान को पहली बार ऐसे रंग में पेश किया गया था जिसमें उनको लोग नहीं पहचानते थे। हमें बहुत अच्छा लगा कि लोगों ने सलमान खान का अलग चेहरा देखा। लोगों को बहुत मजा आया। 'झलक दिखला जा', 'इंडिया गॉट टैलेंट' के भी पहले दो सीजन हमने किए थे, अभी इस शो को कोई और प्रोड्यूस कर रहा है।
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सिद्धार्थ बसु
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सलमान खान को पहली बार छोटे पर्दे पर लाने के लिए किस तरह से आपने किस तरह राजी किया होगा?
सलमान खान को 'दस का दम' के गेम का फॉर्मेट बहुत पसंद आया। इस शो का सेट हमने महबूब स्टूडियो में ही लगाया था। वहां सलमान खान के दोस्त मिलने आते थे, उनको मजा आने लगा। इस गेम के माध्यम से उनका आम जनता से संपर्क हुआ, यह बात उनको बहुत अच्छी लगी। बच्चन साहब को भी यही बात बहुत अच्छी लगती थी। अभी भी बच्चन साहब शो में बहुत रुचि लेते हैं, उनको सबसे अच्छी बात यह लगती है जब उनका अलग -अलग लोगों से संपर्क होता है। उनके साथ सुख दुख बांटना उनको अच्छा लगता है।
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सिद्धार्थ बसु
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जब आप बच्चन साहब से केबीसी के लिए पहली बार मिले होंगे,तब इस शो को लेकर उनकी क्या सोच थी?
पहले चैनल वालों ने उनसे बात की थी। उनसे पहली बार मैं लंदन में मिला। हम लोग 'हू वांट्स टू बी मिलेनियर' के सेट पर शूटिंग देखने गए थे। बच्चन साहब ने खुद ही कहा था कि मैं देखना चाहता हूं कि शो कैसे बनाते है और मैं समझना चाहता हूं। जब उन्होंने देखा तो उन्हें बहुत अच्छा लगा और उन्होंने एक शर्त रखी कि अगर बिल्कुल इसी तरह से प्रोड्यूस कर सकते हो तो ही मैं करूंगा। सबने मेरी तरफ मुड़कर देखा, मैने कहा मुझे साधन दो, मैं करके दिखाऊंगा। और, हमने वही किया।
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सिद्धार्थ बसु
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अगर आपके करियर की शुरुआत की बात करें तो आप का झुकाव थियेटर की तरफ रहा है। तो, कहीं न कहीं उस समय आप का इरादा एक्टर बनने का रहा होगा?
दिल्ली में कॉलेज के दौरान थिएटर में एक्टिंग और डायरेक्शन करता था। इसकी शुरुआत मैने बहुत ही कम उम्र में ही कर दी थी। उसके बाद 17 -18 साल की उम्र में मैंने बैरी जॉन के साथ मिलकर अपना थियेटर ग्रुप 'थियेटर एक्शन ग्रुप' बनाया। हमने कई प्रयोगात्मक नाटक किए। हॉल खचाखच भरे रहते थे। हालांकि हम अंग्रेजी में नाटक करते थे तो बहुत इज्जत मिलती थी। इंदिरा गांधी भी हमारा नाटक देखने आती थी। लेकिन नाटक को अपनी जीविका का साधन नहीं बना सकते थे। मनोज बाजपेयी, शाहरुख खान जैसे बहुत सारे उसी समय के हैं। बाद में मैं डाक्यूमेंट्री फिल्में बनाने लगा। फिल्म एक्टिंग में मुझे उतनी खास रुचि नहीं है।
मैंने जो फिल्में की हैं, सब दोस्ती की वजह से कीं। शूजीत सरकार मेरे असिस्टेंट डायरेक्टर थे। जब वह मद्रास कैफे बना रहे थे तो उन्होंने कहा कि फिल्म में एक रोल है जिसे आप भी कर सकते हैं। अनुराग कश्यप की 'बॉम्बे वेलवेट' भी मैंने दोस्ती की वजह से की थी। बहुत बड़ा प्रोडक्शन हाउस था, उस पर उनका कितना कंट्रोल था या नहीं था यह अलग बात है। अली अब्बास जफर की फिल्म 'सुल्तान' में मेरा बेटा असिस्टेंट डायरेक्टर था। अली अब्बास जफर की फिल्म 'टाइगर जिंदा है' में मैंने बेटे की वजह से काम किया।