फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

टॉयलेट एक प्रेम कथा रिव्यू: शौचालय के बिना तकलीफ भरी हो सकती है जिंदगी

Fri, 11 Aug 2017 04:27 PM IST
रवि बुले
विज्ञापन
1 of 9
निर्माताः प्लान सी स्टूडियोज/वायकॉम 18

निर्देशकः श्रीनारायण सिंह

सितारेः अक्षय कुमार, भूमि पेडनेकर

रेटिंग ** 

शौचालय जरूरत है। इसके बिना जीवन तकलीफदेह हो सकता है। निर्देशक श्रीनारायण सिंह की फिल्म देखते हुए इस बात का गहरा एहसास होता है।
विज्ञापन

2 of 9
यह मनोरंजन, सामाजिक संदेश और सरकारी प्रयासों की मिलीजुली कहानी है, जिसमें सरकारी प्रोपगंडे का बिगुल लगातार बजता रहता है, लेकिन सिरे से कोई ठोस बात नहीं उभरती। फिल्म कई मौकों पर मनोरंजन की आड़ में सामाजिक विषयों के पाठ पढ़ाती नजर आती है। यह अखरता है। 
विज्ञापन

3 of 9
लेखक-निर्देशक ने टॉयलेट की समस्या को स्वच्छता के सिरे से उतना नहीं उभारा जितना महिलाओं की प्रतिष्ठा और सम्मान से जोड़ा। असल में इस समस्या के प्रति देश-समाज का ध्यान सबसे पहले तब गया था जब मध्यप्रदेश के बैतूल से एक महिला द्वारा विवाह के दो-तीन दिनों में ही पति का घर छोड़ने की खबर आई थी क्योंकि ससुराल में शौचालय नहीं था।

4 of 9
फिल्म मथुरा के नजदीक एक गांव का जीवन दिखाती हुई केशव (अक्षय कुमार) और जया (भूमि पेडनेकर) के परस्पर आकर्षण, प्रेम और विवाह तक पहुंचती है। परंतु उतार-चढ़ाव तब शुरू होते हैं जब जया को पता चलता है कि केशव के घर में टॉयलेट नहीं है। 
विज्ञापन

5 of 9
महिलाएं सूरज निकलने से खेतों में पहले जाती हैं। शुरुआत में केशव जया को ‘लोटा पार्टी’ का सदस्य बनने के लिए समझाता है और फिर खुद खेतों तथा गांव से गुजरने वाली ट्रेन में शौच के लिए ले जाता है। परंतु यह जुगाड़ समस्या का हल तो नहीं! अंततः जया उसे छोड़ कर चली जाती है और तभी लौटने की कसम खाती है जब घर में टॉयलेट बनवा लेगा। मगर क्या यह इतना आसान है? निर्देशक ने कहानी में ससुर को ‘असुर’ बनाया है।
विज्ञापन

6 of 9
श्रीनारायण ने घर में टॉयलेट बनवाने के विचार को धर्म, अंधविश्वास और पुरातन पंथी सोच से जोड़ा है। जहां कहा जाता है कि घर के अंदर भगवान हैं, रसोई है और आंगन में तुलसी है। इस दायरे में कैसे शौच हो सकता है। 
 
विज्ञापन

7 of 9
कई बार लेखक-निर्देशक अपने प्रहार में अतिवादी नजर आने लगते हैं। पाठ पढ़ाती फिल्म से मनोरंजन अचानक खत्म हो जाता है। निर्देशक ने शौचालय/स्वच्छता के लिए बनी सरकारी योजनाओं के सामाजिक दुरुपयोग तथा अधिकारियों के घोटाले रेखांकित किए हैं। परंतु फोकस नहीं किया।

8 of 9
फिल्म संदेश देती है कि प्रेमिका/पत्नी के लिए घर में शौचालय बनवाना ही ताजमहल बनाने के बराबर है। अक्षय और भूमि अपनी भूमिकाओं में फिट हैं। दोनों ने अच्छा अभिनय किया है। उन्हें अन्य कलाकारों का भी अच्छा सहयोग मिला है।
विज्ञापन

9 of 9
फिल्म की भाषा और संवाद पर ठीक ढंग से काम नहीं हुआ। कई जगह वे खटकते हैं। फिल्म में हंस मत पगली और जुगाड़ गीत रोचक हैं। श्रीनारायण सिंह की कहानी पर पहले हिस्से में पकड़ अच्छी है लेकिन दूसरा हिस्सा सरकारी प्रचार की भेंट चढ़ गया है। यहीं फिल्म कमजोर पड़ गई है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें