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The White Tiger Review: दुनिया को भारतीय नौकरों का काइयांपन दिखाती विदेशी फिल्म, आदर्श की बड़ी छलांग

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द व्हाइट टाइगर रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
Movie Review: द व्हाइट टाइगर
कलाकार: आदर्श गौरव, राजकुमार राव, प्रियंका चोपड़ा, महेश मांजरेकर आदि।
पटकथा, निर्देशन: रमीन बहरानी
लेखक: अरविंद अडिगा (उपन्यास ‘द व्हाइट टाइगर’ पर आधारित)
रेटिंग: ***


यह संयोग ही हो सकता है कि एक ही दिन रिलीज हुई दो फिल्मों में से एक खालिस हिंदुस्तानी निर्देशक ने बनाई और दूसरी ईरानी अमेरिकी निर्देशक ने और दोनों की आत्मा एक। दोनों सामाजिक क्रांति की बातें करती फिल्म हैं, लेकिन दोनों शीर्ष पर पहुंचने का कोई सही तार्किक रास्ता दर्शकों को सुझा नहीं पातीं। दोनों अपराध बोध से ग्रसित मानसिकता वाला सिनेमा है। और, दोनों का निष्कर्ष एक है कि गरीबी इस देश में किसी ठाकुर की खींची लक्ष्मण रेखा है जिसे पार करने का रास्ता अपराध की गली से ही होकर जाता है। सिनेमा बदल रहा है। वह सच कह रहा है। सपने सच होते दिखाने वाला सिनेमा हाशिये पर पहुंच रहा है। यही पाताललोक से धरती पर आया नया तांडव है।
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द व्हाइट टाइगर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
अरविंद अडिगा का उपन्यास ‘द व्हाइट टाइगर’ भारतीय सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक संक्रमण काल की कहानी कहकर बुकर प्राइज जीत चुका है। नई सदी की शुरूआत की कहानी कहते इस उपन्यास पर रमीन रहमानी ने तमाम देसी विदेशी सिनेमा देखकर एक पटकथा रची है। रमीन का भारत को देखने का एक तयशुदा फॉर्मूला है। प्रियंका चोपड़ा उनके लिए ‘देसी’ हैं। गांव के प्राइमरी स्कूल में टकाटक अंग्रेजी पढ़ने वाला बच्चा बलराम ‘व्हाइट टाइगर’ कहलाता है और गरीबों का खून चूसने वाले जमींदार के घर में पैदा होकर भी आईटी को अपना करियर बनाने वाला अशोक अमीरी और गरीबी के बीच के पुल से ज्यादा कुछ नहीं। कहने को कह सकते हैं कि ये भारत और इंडिया को दो अलग अलग खांचों में बांटने की कहानी है लेकिन, नहीं। ये नए भारत की कहानी है जिसने खुद इंडिया जैसा बनने की ठान ली है। रास्ता कैसा भी क्यों न हो।
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द व्हाइट टाइगर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘द व्हाइट टाइगर’ का कोई हीरो नहीं है। हीरो जैसा दिखने वाला पूरी कहानी में कोई इंसान दिखता भी नहीं है। यह नए नायक गढ़ती एक फिल्म है जिसका मूल बिहार के उस गांव में है, जहां अब भी जमींदार खुद पजेरो गाड़ी लेकर वसूली करने आता है। जहां अच्छा होना भी एक भ्रम है। जैसा कि बलराम को शहर का ड्राइवर समझाता है, ‘वह अमीर है।’ इस भारत में मुसलमान को नाम और पहचान छुपाकर ही नौकरी मिलती है। और, नेताओं की गालियों से ही रईसों का खोखलापन दरकता है। ये तब और बिखरता है जब इनके ड्रॉइंगरूम में वही नेता पान थूक देता है। फिल्म देखते समय वितृष्णा और घिन जैसे भाव बार बार आते हैं। एकबारगी तो ये भी लगने लगता है कि कहीं रमीन बहरानी जानबूझकर तो नहीं ‘स्लमडॉग मिलिनेयर’ का रिवर्स वर्जन बनाने निकल पड़े हैं।

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द व्हाइट टाइगर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
रमीन बहरानी ने भारतीय पृष्ठभूमि के एक ऐसे उपन्यास पर फिल्म बनाने की ठानी जिसकी अंतर्धारा शायद ही वह महसूस कर सके हों। ठीक वैसे ही जैसा प्रियंका चोपड़ा का किरदार है। बिहार के किसी कोल माफिया के घर की बहू अपने जेठ से ऐसे जुबान लड़ाने की सोच भी पाती होगी भला? लेकिन, सनद यहां यह रहे कि ये फिल्म मूल रूप से अंग्रेजी में बनी है। वैश्विक दर्शकों के आगे एक भारतीय नौकर का काइयांपन बेचने निकली फिल्म। इस कहानी का नौकर अमिताभ बच्चन वाला ‘नमक हलाल’ नहीं है। ये दूसरों के दुख में मजा लेकर सुख पाने वाला नौकर है। मालिक उसको अपना जमूरा बनाकर रखता है। मालकिन के बर्थडे में वह जोकर बनकर पहुंचता है और फिर जब जेल जाने की बारी आती है तो...! लेकिन, यहीं से फिल्म और बलराम दोनों की आत्मा बदलती है।
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द व्हाइट टाइगर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘द व्हाइट टाइगर’ में राजकुमार राव और प्रियंका चोपड़ा सहायक कलाकारों की भूमिका में हैं। महेश मांजरेकर की तरह। असल कहानी आदर्श गौरव की परिक्रमा करते हुए आगे बढ़ती है। अगर आपको अमोल पालेकर की ‘गोलमाल’ याद हो तो शुरू में आदर्श गौरव का काइयांपन कुछ कुछ वैसी ही झलक दिखाता है। अभिनय के सारे रसों से आदर्श ने इस किरदार को पाग दिया है। बस समस्या यहां यही है कि हिंदी सिनेमा में आयुष्मान खुराना  पहले से राजकुमार राव वाली जगह कब्जाने में लगे हैं, दूसरे किसी की गुंजाइश वहां बनने में अभी देर है। आदर्श की कलाकारी पहले भी लोगों ने देखी है और वेब सीरीज से वेब फिल्म तक आने में उन्हें समय भी ठीक ठाक लगा। अब बड़े परदे पर इस ‘व्हाइट टाइगर’ की छलांग का इंतजार रहेगा।
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द व्हाइट टाइगर - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘द व्हाइट टाइगर’ में रमीन के निर्देशन और आदर्श गौरव के अभिनय के बाद जो तीसरी चीज सबसे ज्यादा प्रभावित करती है, वह है इसकी सिनेमैटोग्राफी और इसकी एडीटिंग। इतालवी कैमरामैन पाओलो कारनेरा का कैमरा भारत और इंडिया का फर्क मिटा देता है। दिल्ली की पहली झलक भी उनके कैमरे से बिहार के किसी गांव जैसी ही दिखती है। यही इस फिल्म की आत्मा है। टिम स्ट्रीटो ने फिल्म को चुस्त दुरुस्त रखा है। डैनी बेंसी और सॉन्डर जुर्रियांस का संगीत औसत से भी कमतर है और शायद फिल्म के कथानक को ठीक से भांप नहीं पाता। फिल्म चूंकि मूलत: अंग्रेजी में शूट की गई है लिहाजा इसके हिंदी संस्करण की डबिंग कई जगहों पर अखरती है। दोनों के संवाद वैसे ही दो अलग अलग खाचों में बंटे दिखते हैं जैसे बलराम और उसका वेतन लेने आया उसका भाई, हवेली के गेट पर। एक अंदर। एक बाहर।

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