फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

संडे बाइस्कोप: अन्ना की एंट्री, उर्मिला का रंगीला अंदाज, साइलेंस का कमाल और किस्सा पुनर्जन्म का!

विज्ञापन
1 of 7
बाइस्कोप - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
‘बाइस्कोप’ सीरीज को आप सभी पाठकों का भरपूर प्यार और दुलार मिल रहा है, इसके लिए हम आपके बहुत आभारी हैं। मुझे हर दिन फेसबुक, मेल और मैसेंजर पर अलग अलग फिल्मों के बाइस्कोप लिखने की फरमाइशें मिलती रहती हैं। बाइस्कोप दरअसल मैं बीते बरसों उसी तारीख को रिलीज हुई फिल्मों के बारे में लिखता हूं। कई बार फिल्में एक से बढ़कर एक होती हैं तो सिनेमा के शौकीनों की इस बारे में रायशुमारी भी करता हूं। बाइस्कोप सीरीज 1960 से लेकर साल 2000 तक के कालखंड के बेहतरीन सिनेमा का दस्तावेज है। नई सदी की भी कुछ फिल्में इसमें दर्शकों के फरमाइश पर शामिल होती रही हैं। इतवार को बीते हफ्ते की तारीखों को अतीत में रिलीज हो चुकी फिल्मों का गुलदस्ता आपकी खिदमत में पेश रहता है। तो चलिए देखते हैं आज के इस गुलदस्ते की कलियां खिलकर कौन सा गुलाब बनने वाली हैं?
विज्ञापन

2 of 7
आज की आवाज - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
राजेश खन्ना का रोल मिला राज बब्बर को
देश में किसी भी शादी समारोह में आप चले जाएं आपको बारात निकलते समय ‘आज मेरे यार की शादी है’ और दुल्हन के विदा होते समय ‘बाबुल की दुआएं लेती जा जा तुझको सुखी संसार मिले’, ये दो गाने जरूर बजते सुनाई देंगे। गाने शादी के कुछ और भी बहुत सुपरहिट रहे हैं जैसे, ‘डोली चढ़ के दुल्हन ससुराल चली’ या फिर ‘मेरा यार बना है दूल्हा’। आज के बाइस्कोप में इन गानों का जिक्र इसलिए क्योंकि आज की फिल्म मे जिन संगीतकार ने संगीत दिया है, उन्होंने फिल्मफेयर पुरस्कार तो सन 1962 और 1966 में ही जीत लिए थे लेकिन संगीत का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार पाने के लिए उन्हें इसके बाद कोई तीस साल तक इंतजार करना पड़ा। और, ये मिला भी तो किसी हिंदी फिल्म के लिए नहीं बल्कि एक मलयालम फिल्म के लिए। जी हां, हिंदी सिनेमा के इस मशहूर संगीतकार का जब बंबई में दिल टूटा तो वह जाकर मलयालम सिनेमा में संगीत बनाने लगे और वह भी नाम बदलकर। इस संगीतकार का नाम है रवि और मलायलम सिनेमा में इनका नाम लोगों ने रखा, बॉम्बे रवि। रवि के संगीत निर्देशन से सजी निर्माता बी आर चोपड़ा और निर्देशक रवि चोपड़ा की फिल्म ‘आज की आवाज’ हमारे 7 सितंबर 2020 के बाइस्कोप की फिल्म रही।

Aaj Ki Awaz का बाइस्कोप: यहां देखिए राज बब्बर और स्मिता पाटिल की असली प्रेम कहानी, कैमरे की जुबानी
विज्ञापन

3 of 7
रंगीला - फोटो : अमर उजाला
रामगोपाल वर्मा को अव्वल नंबर दिलाने वाली फिल्म
बीते हफ्ते उस फिल्म का नंबर भी आया जिसमें दिखे बाइस्कोप पर मैंने इस कॉलम का नाम रखा, ‘बाइस्कोप’। फिल्म का नाम- रंगीला। निर्देशक- राम गोपाल वर्मा। और, फिल्म के रंगीला राजा रहे आमिर खान। आमिर खान ने भले फिल्म में वाकई रंगीला दिखने के लिए अपने बनाए खास कपड़े पहने हों, कुछ दिन जाकर चॉल और झोपड़पट्टी में बिताए हों, और वहां की टपोरी भाषा सीखने के लिए बड़ी मेहनत की हो, लेकिन फिल्म ‘रंगीला’ का असल फायदा अगर किसी को हुआ तो वह रहीं राम गोपाल वर्मा की उस वक्त की बेहद करीबी दोस्त उर्मिला मातोंडकर। उर्मिला का नंबर इस रोल के लिए श्रीदेवी, मनीषा कोइराला और रवीना टंडन का नाम चर्चा में आने के बाद ही लगा। हालांकि, राम गोपाल वर्मा कहते हैं कि फिल्म ‘द्रोही’ में बिना किसी कोरियोग्राफर के उर्मिला ने जो कमाल का डांस अपने आप किया, उससे प्रभावित होकर उन्होंने उर्मिला को ‘रंगीला’ के लिए कास्ट किया था। फिल्म ‘रंगीला’ ऐसी फिल्म भी है, जिसकी कास्टिंग में अगर राम गोपाल वर्मा की चलती तो इसमें जोड़ी जैकी श्रॉफ और आमिर खान की नहीं बल्कि सलमान खान और शाहरुख खान की बनती। जी हां, शाहरुख खान को इस फिल्म में आमिर खान वाला और सलमान खान को जैकी श्रॉफ वाला रोल ऑफर हुआ था।

बाइस्कोप: उर्मिला से पहले इन हीरोइनों को ऑफर हुई ‘रंगीला’, आमिर ने इस बार किया शाहरुख का ठुकराया रोल

4 of 7
गहराई - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘भूत’ से पहले का भूत
तो चलिए ये बाइस्कोप एक सवाल से शुरू करते हैं। कोरोना संक्रमण काल के दौरान 23 अप्रैल 2020 से शुरू हुए बाइस्कोप के इस पहले सीजन को सवा सौ से ज्यादा दिन हो चुके हैं। और, सवाल आज का ये है कि पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट से एडिटिंग का गोल्ड मेडल लेकर निकलने वाली हिंदी फिल्म इंडस्ट्री की पहली प्रशिक्षित महिला तकनीशियन कौन हैं? नहीं याद आया, चलिए एक हिंट देते हैं। इस महिला ने आगे चलकर चार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीते और अब भी 74 साल की उम्र में सिनेमा के अलावा दूसरा कुछ सोचती नहीं है। पिछले साल उन्होंने प्रियंका चोपड़ा के प्रोडक्शन हाउस परपल पेबल पिक्चर्स के लिए सुलगती हुई फिल्म ‘फायरब्रांड’ बनाई जिसमें एक और नेशनल अवार्ड कलाकार लीड रोल में थीं, उषा जाधव। अब तो आप पहचान ही गए। जी हां, मैं अरुणा राजे की बात कर रहा हूं। बुधवार की शाम इवनिंग वॉक पर उन्हें फोन किया तो वैसी ही खनकती आवाज। वैसा ही आवाज में अब भी बच्चों सा कौतूहल। और, वैसी ही ऊर्जा। बोलीं, ‘सिनेमा और जीवन के बीच बनने वाले सेतु पर कुछ काम कर रही हूं। कोरोना खत्म होने दो, जल्दी बुलाती हूं सब कुछ बताने दिखाने को।’ इन्हीं अरुणा राजे की फिल्म ‘गहराई’ हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है। फिल्म की रिलीज को बुधवार को 40 साल पूरे हो गए।

बाइस्कोप: इस फिल्म की फोटो ने दिलाई अमरीश पुरी को स्पीलबर्ग की फिल्म, आवाज से घबरा गए थे गांव के लोग
विज्ञापन

5 of 7
पुष्पक - फोटो : अमर उजाला
फिल्म में संवाद नहीं पर भाषा की चिप्पियां ढेर
सिनेमा की शुरूआत की बातें अक्सर अब भी होती ही रहती हैं। मूक फिल्मों की बात होती है जो पता चलता है कि कैसे थिएटर में पर्दे के आगे बनी कुएं जैसी जगह में साजिंदे बैठकर सीन के हिसाब से बाजा बजाया करते और गायक भी वहीं अगल बगल खड़े होकर गाने गा दिया करते। फिर तस्वीरें बोलने लगीं और एक बार जो इन तस्वीरों ने बोलना शुरू किया तो इनके कलाकारों की अदाकारी को तो मानो पंख ही लग गए। कलाकारों के संवाद उसके बाद उनका अंदाज बनने लगे। अब तो ये अंदाज बनाने के लिए भी संवाद बोले जाने लगे हैं लेकिन हैरानी हुई थी उस वक्त के दर्शकों को जब भरे पूरे सिनेमा के दौर में साल 1987 में निर्देशक संगीतम श्रीनिवास राव को एक ऐसी फिल्म बनाने की सूझी जिसमें संवाद ही न हों। और, ये विचार उनके मन में कौंधा उस फिल्म की शूटिंग के दौरान, जिसमें वह सहायक निर्देशक थे। फिल्म में एक कलाकार को भयभीत होने के भाव अपने चेहरे पर दिखाने थे और उसे संवाद कोई नहीं दिया गया था। कलाकार ने ऐसा करके दिखा भी दिया तो राव इससे बहुत प्रभावित हुए। वह रात दिन बस यही सोचने लगे कि क्या सिर्फ चेहरे के भावों पर भरोसा करके नए जमाने में ऐसी फिल्म बन सकती है, जिसमें संवाद ही न हों? संगीतम श्रीनिवास राव को अपने इस सवाल का जवाब एक दिन नहाते हुए अपने बाथरूम में मिला और सिर्फ दो हफ्ते में उन्होंने उस फिल्म ‘पुष्पक विमान’ की स्क्रिप्ट लिख डाली, हिंदी पट्टी में ये फिल्म ‘पुष्पक’ के नाम से रिलीज हुई और यही फिल्म 10 सितंबर 2020 के बाइस्कोप की फिल्म रही।

बाइस्कोप: 33 साल बाद भी कायम फिल्म ‘पुष्पक’ में दिखा बेरोजगारों का ये दर्द, बिना संवाद की सीधी चोट
विज्ञापन

6 of 7
बलवान - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
सुनील शेट्टी का कमाल का एक्शन डेब्यू
हिंदी सिनेमा के लिए साल 1992 कमाल का रहा। अनिल कपूर की फिल्म ‘बेटा’ उस साल की सबसे बड़ी हिट फिल्म रही। शाहरुख खान ने भी उस साल ‘दीवाना’ से जानदार एंट्री बड़े परदे पर मारी। अमिताभ बच्चन की ‘खुदा गवाह’ का परचम अलग लहरा था। धर्मेंद्र ‘तहलका’ में तो सनी देओल ‘विश्वात्मा’ में छाए हुए थे। अजय देवगन की फिल्म ‘जिगर’ में भी लोगों को जान नजर आई। ऋषि कपूर भी स्वेटर बदल बदल कर और ’दीवाना’ बनकर ‘बोल राधा बोल’ गाने में लगे हुए थे। अक्षय कुमार की फिल्म ‘खिलाड़ी’ इस साल की स्लीपर हिट रही और इस साल की सरप्राइजिंग हिट फिल्म रही सुनील शेट्टी की डेब्यू फिल्म ‘बलवान’। लेकिन, इन सबके अलावा साल 1992 में याद रहता है मासूम सी मुस्कान लिए मोहक दिव्या भारती के लिए। दिव्या भारती ने भी हिंदी सिनेमा में इसी साल डेब्यू किया। तेलुगू और तमिल फिल्मों में दो साल काम करने के बाद इसी साल दिव्या भारती ने हिंदी सिनेमा में कदम रखा और पहले ही साल 10 हिंदी फिल्मों ने रिलीज होने का रिकॉर्ड बना डाला। शाहरुख खान और सुनील शेट्टी दोनों की डेब्यू फिल्मों की हीरोइन इस साल दिव्या भारती ही रहीं। 11 सितंबर 2020 को सुनील शेट्टी को बड़े परदे पर पेश हुए 28 साल हो गए और न सुनील शेट्टी ने किसी से कहा और न ही फिल्मों का शौक रखने वालों ने ही सोचा, लेकिन अन्ना के नाम से मशहूर सुनील शेट्टी की इस डेब्यू फिल्म के किस्से हमने आपको सुनाए 11 सितंबर 2020 के बाइस्कोप में।

बाइस्कोप: सुनील शेट्टी के बॉलीवुड में पूरे हुए 28 साल, यहां पढ़िए पहली फिल्म ‘बलवान’ के दिलचस्प किस्से
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
मिलाप - फोटो : अमर उजाला
हिंदी सिनेमा के कई ऐसे गाने हैं, जो जब भी बजते हैं एक सुरसुरी सी बदन में दौड़ जाती है। कभी इन गानों के बोल ऐसे होते हैं कि सुनने वाला चौकन्ना हो ही जाता है। तो, कभी इनका संगीत किन्हीं पुरानी यादों में लेकर चला जाता है। और, अधिकतर होता यही है कि ये आवाज किसी महिला की होती है। अंग्रेजी में इन्हें ‘हॉन्टिंग सॉन्ग’ कहते हैं यानी कि वे गाने जो बार बार याद आते हैं। श्रोताओं को भी और कहानी के किरदारों को भी। वैसे तो ऐसे गानों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन फौरी तौर पर याद करें तो भी फिल्म महल का गाना ‘आएगा आएगा आएगा आना वाला’, फिल्म ‘बीस साल बाद’ का गीत ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’, फिल्म ‘कोहरा’ का ‘झूम झूम ढलती रात’, फिल्म ‘गुमनाम’ का ‘गुमनाम है कोई’, फिल्म ‘राज’ का ‘अकेले हैं चले आओ’, फिल्म ‘वो कौन थी’ का गाना ‘लग जा गले के फिर ये हंसी रात हो न हो’ और फिल्म ‘मेरा साया’ का गाना ‘मेरा साया साथ होगा’, ये ऐसे गाने हैं जो बने तो सुनने वालो को सिहरा देने के लिए हैं, लेकिन इन्हें सुनने का मन भी बार बार करता ही है। हमारी 12 सितंबर 2020 के बाइस्कोप की फिल्म ‘मिलाप’ में भी ऐसा ही एक गाना है।

बाइस्कोप: ये है पहला ‘मिलाप’ शत्रुघ्न सिन्हा और रीना रॉय का और गाना बजा, ‘आजा के अधूरा है अपना मिलन’
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें