हिंदी सिनेमा के कई ऐसे गाने हैं, जो जब भी बजते हैं एक सुरसुरी सी बदन में दौड़ जाती है। कभी इन गानों के बोल ऐसे होते हैं कि सुनने वाला चौकन्ना हो ही जाता है। तो, कभी इनका संगीत किन्हीं पुरानी यादों में लेकर चला जाता है। और, अधिकतर होता यही है कि ये आवाज किसी महिला की होती है। अंग्रेजी में इन्हें ‘हॉन्टिंग सॉन्ग’ कहते हैं यानी कि वे गाने जो बार बार याद आते हैं। श्रोताओं को भी और कहानी के किरदारों को भी। वैसे तो ऐसे गानों की लंबी फेहरिस्त है लेकिन फौरी तौर पर याद करें तो भी फिल्म महल का गाना ‘आएगा आएगा आएगा आना वाला’, फिल्म ‘बीस साल बाद’ का गीत ‘कहीं दीप जले कहीं दिल’, फिल्म ‘कोहरा’ का ‘झूम झूम ढलती रात’, फिल्म ‘गुमनाम’ का ‘गुमनाम है कोई’, फिल्म ‘राज’ का ‘अकेले हैं चले आओ’, फिल्म ‘वो कौन थी’ का गाना ‘लग जा गले के फिर ये हंसी रात हो न हो’ और फिल्म ‘मेरा साया’ का गाना ‘मेरा साया साथ होगा’, ये ऐसे गाने हैं जो बने तो सुनने वालो को सिहरा देने के लिए हैं, लेकिन इन्हें सुनने का मन भी बार बार करता ही है। हमारी आज के बाइस्कोप की फिल्म ‘मिलाप’ में भी ऐसा ही एक गाना है।
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