Setters
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फिल्म में सहयोगी कलाकारों की लंबी चौड़ी फौज है जिसमें विजय राज के अलावा जमील खान और मनु ऋषि अपना असर छोड़ने में कामयाब रहते हैं। फिल्म की सबसे कमजोर कड़ी है कहानी के खलनायक बने पवन मल्होत्रा। उनका किरदार उठाने के लिए जबर्दस्ती के दिखने वाले दो तीन सीन फिल्म से हटा देने से फिल्म और चुस्त हो सकती है। पवन को अपने करियर का ये सबसे अहम रोल मिला लेकिन ओवरएक्टिंग ने उनको नुकसान पहुंचाया है। इसके अलावा अश्विनी ने जिन कलाकारों को भी फिल्म में दोस्ती के चलते काम दिया, वे भी कसौटी पर खरे नहीं उतरे। अतुल तिवारी जैसे लोग सीन खराब ही करते हैं। सिराज अहमद की लिखी फिल्म की पटकथा में भी कई जगह झोल हैं।
भैयाजी और अपूर्वा के बीच इम्तिहान का पेपर लीक कराने की चूहा बिल्ली वाली दौड़ में बिरयानी और मिठाई वाले कोडवर्ड आपस में बदल जाते हैं। बनारस की स्थानीय भाषा बोलते बोलते श्रेयस एक दो जगह मुंबइया टोन पकड़ लेते हैं। लेकिन, इन कमियों के बाद भी अगर आपको समझना है कि देश में कोचिंग कैसे एक भरा पूरा उद्योग बन चुका है, तो ये फिल्म जरूर देखनी चाहिए। अमर उजाला डॉट कॉम के वीकली फिल्म रिव्यू में फिल्म सेटर्स को मिलते हैं तीन स्टार।