शकुंतला देवी
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शकुंतला देवी में कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग एक नंबर है। इशिता मोइत्रा के संवाद हिंदी पट्टी के हिसाब से कहीं कहीं अटकते हैं, लेकिन फिल्म का किरदार दक्षिण भारतीय है और उसका विस्तार विदेश का है तो इसे नजरअंदाज किया जा सकता है। फिल्म का संगीत पक्ष कमजोर है। फिल्म के प्रचार में बजते गाने ठीक ठाक दिखते हैं, लेकिन फिल्म देखने के बाद कोई गाना या उसकी धुन गुनगुनाने भर को भी याद नहीं रह पाता।
फिल्म की सिनेमैटोग्राफर के तौर पर कीको नाकाहारा ने एक बार फिर चौंकाया है। इसी साल की फिल्म तानाजी की भी वह सिनेमैटोग्राफर रही हैं। भारी कैमरा खुद उठाकर सेट पर सितारों के पीछे चल पड़ने वाल कीको की क्रियात्मकता शकुंतला देवी में भी पढ़ी जा सकती है। हिंदी सिनेमा को कीको में एक बेहतरीन तकनीशियन मिला है। फिल्म की एडीटर अंतरा लाहिड़ी ने फिल्म की पटकथा के हिसाब से ही फिल्म की एडीटिंग की है। बरसों की कहानी को कुछ घंटों मे समेटना उनके लिए भी चुनौती रही होगी। बायोपिक आमतौर पर इसलिए बनती हैं कि उसका मुख्य किरदार दर्शकों को जीवन का कोई सकारात्मक संदेश दे जाता है, लेकिन यहां तो इसके मेकर्स ने पहले ही कह दिया कि ये बायोपिक नहीं है। फिल्म शकुंतला देवी को अमर उजाला मूवी रिव्यू में मिलते हैं तीन स्टार। ये खराब फिल्म नहीं है, लेकिन बेहतर फिल्म हो सकती थी।