Satya
- फोटो : Mumbai, Amar Ujala
सत्या रिलीज हुई तो उन दिनों अमर उजाला के ही एक सहयोगी अनिल सिंह जो बिहार से थे, मेरे पास आए बोले फिल्म में अपने यहां का एक लड़का है, मनोज बाजपेयी। रिव्यू लिखते समय थोड़ा ध्यान रखना उसका। मैंने उन्हें सिर्फ इतना कहा कि आप रविवार को रिव्यू पढ़ लेना आपको अच्छा लगेगा और जिस लड़के की बात आप कर रहे हैं, उसे अब किसी की सिफारिश की जरूरत रहेगी नहीं। सत्या को तमाम लोगों ने कालजयी फिल्म कहा। हिंदी सिनेमा की मस्ट वॉच फिल्म बताया। बीबीसी से लेकर तमाम दूसरे विदेशी चैनलों ने इसकी तारीफ के पुल बांधे और इसे हिंदी सिनेमा का एक टर्निंग प्वाइंट भी कहा। सत्या को मैं भी एक क्लासिक अपराध फिल्म मानता हूं लेकिन ये फिल्म ‘इस रात की सुबह नहीं’ के बाद की फिल्म है और हिंदी सिनेमा में मुंबई के गली कूंचों में सांस लेने वाले अंडरवर्ल्ड की सच्ची दिखने वाली असल कहानी की इस तथाकथित कैटेगरी की मां निर्देशक सुधीर मिश्रा की यही फिल्म है। राम गोपाल वर्मा से लेकर अनुराग कश्यप तक सबका सिनेमा इसी एक फिल्म से पानी पाता है।
राम गोपाल वर्मा सत्या से पहले भी अपनी फिल्मों शिवा, रंगीला और दौड़ से हिंदी सिनेमा के तब युवा हो रहे दर्शकों में अपनी अलग पहचान बना चुके थे। रंगीला खासतौर से लोगों को खूब पसंद आई और जैसा कि रामू खुद कहते हैं कि वह अपने भीतर के ही बदलावों का ही सबसे ज्यादा अध्ययन करते हैं, तो रंगीला के बाद सत्या का आना उनके प्रशंसकों के लिए किसी विक्षोम से कम नहीं था। इसके बीच आई फिल्म दौड़ फ्लॉप रही थी। रामू को उनके घर के लोग नकारा कहते थे। वह खुद बताते हैं, “ये काफी हद तक सही भी था। मेरे पास करने को कुछ था ही नहीं। मुझे बस लोगों में दिलचस्पी होती जो दबंग होते। स्कूल के बदमाश लड़के मुझे वैसे ही नजर आते जैसे लो एंगल कैमरे के सामने चलता हीरो। मुझे ऐसे ही लोग पसंद आते थे और धीरे धीरे मैं ऐसे लोगों का प्रशंसक बनता गया। मेरी फिल्में भी इसी का विस्तार बनती रहीं।”