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बाइस्कोप: ‘मदर इंडिया’ के बाद इस फिल्म में मिले राजेंद्र कुमार और सुनील दत्त, माधुरी ने निभाया वादा

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फूल - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
जीवन में मुसीबतें आएं तो बिना घबराए कैसे उनका सामना करना चाहिए, इसे समझाने के लिए अब भी कभी कभी मशहूर भरत नाट्यम नर्तकी सुधा चंद्रन का नाम लिया जाता है। सुधा चंद्रन ने अपना एक पैर त्रिची से चेन्नई जाते हुए रास्ते में हुई एक दुर्घटना में खो दिया था, लेकिन उन्होंने कृत्रिम पैर लगाकर फिर से नृत्य शुरू किया और पूरी दुनिया में अपने नृत्य की धाक जमा दी। भारतीय सिनेमा में बायोपिक बनाने का चलन वैसे तो फिल्म ‘डॉ. कोटनीस की अमर कहानी’ से माना जाता है लेकिन संगीतम श्रीनिवास राव की साल 1984 में रिलीज हुई तेलुगू फिल्म ‘मयूरी’ ने इसे फिर से चलन में ला दिया। ये फिल्म सुपरहिट हुई। संगीतम श्रीनिवास राव सिनेमा के पुराने दिग्गज रहे हैं लेकिन ‘मयूरी’ की चर्चा उत्तर भारत तक इतनी हुई कि रामोजी राव ने इसे हिंदी में बनाने का फैसला कर लिया। दो साल बाद फिल्म ‘नाचे मयूरी’ रिलीज हुई और सुपरहिट रही।
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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
‘नाचे मयूरी’ ने लोगों को इसकी ओरिजनल फिल्म ‘मयूरी’ देखने को भी उत्साहित किया। तब तक ये फिल्म तमिल और मलायलम में भी डब होकर रिलीज हो चुकी थी और हिंदी पट्टी तक भी संगीतम श्रीनिवास राव का लोग जानने लगे थे और इसी बीच साल 1988 में एक ऐसी फिल्म की चर्चा हुई जिसमें कोई संवाद ही नहीं था। फिल्म का नाम था ‘पुष्पक विमाना’। फिल्म में जब संवाद ही नहीं तो इसकी भाषा भला क्या? लेकिन हिंदी पट्टी के वितरकों ने इसे ‘पुष्पक’ नाम से रिलीज किया। कमल हासन और अमला के साथ टीनू आनंद के अभिनय ने इस फिल्म से संगीत श्रीविनास राव नाम के निर्देशक को घर घर चर्चित कर दिया और इनकी कमल हासन के साथ अगली फिल्म ‘अपूर्व सहोदारगल’ ने तो कमाल ही कर दिया। कमल हासन ने फिल्म एक पूरा और एक आधा रोल किया। आधा मतलब कुछ कुछ फिल्म ‘जीरो’ में शाहरुख खान के किरदार बउआ सिंह जैसा। हिंदी में ये फिल्म ‘अप्पू राजा’ के नाम से रिलीज हुई और सुपरहिट हुई। ये बात है साल 1990 की और तब तक हिंदी सिनेमा में अपनी पहली ही फिल्म ‘लव स्टोरी’ से सुपरस्टार बने कुमार गौरव के सारे विकल्प सिनेमा में बने रहने के आजमाए जा चुके थे।
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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कुमार गौरव के पिता राजेंद्र कुमार ने एक आखिरी दांव अपने बेटे कुमार गौरव पर लगाया और एलान किया एक फिल्म का जिसमें उस वक्त की नंबर वन हीरोइन माधुरी दीक्षित को लिया गया। निर्देशक लाए गए, संगीतम श्रीनिवास राव। राजेंद्र कुमार ये मानकर चले कि जो निर्देशक कमल हासन को तमिल सिनेमा से निकालकर पूरी दुनिया में सुपरस्टार बना सकता है, वह जरूर उनके बेटे का कुछ तो कल्याण करेगा। आमतौर पर हिंदी सिनेमा के सितारे दक्षिण भारत के फिल्मकारों से मुंहमांगी रकम पाते रहे हैं, ये शायद पहला मौका था जब किसी दक्षिण भारतीय फिल्ममेकर ने मुंबई के फिल्म निर्माता से मुंहमांगी रकम फिल्म निर्देशित करने के लिए वसूल की और ये फिल्म बनी भी तो सिर्फ राजेंद्र कुमार की साख के चलते। 

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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
राजेंद्र कुमार को जिन्होंने करीब से जाना है, वे मानते हैं कि हिंदी सिनेमा के चंद बेहद शरीफ लोगों में उनकी गिनती की जा सकती है। लोकप्रियता में वह जुबली कुमार कहलाए। वह इसलिए कि एक जमाना ऐसा भी था जब उनकी आधा आधा दर्जन फिल्में एक साथ तमाम शहरों के सिनेमाघरों में लगी होतीं और सब कम से कम 25 हफ्ते (सिल्वर जुबली) इन सिनेमाघरों मे चलती रहतीं। ‘धूल का फूल’ से शुरू हुआ सिल्वर जुबली फिल्मों का ये सिलसिला ‘दिल एक मंदिर’, ‘मेरे महबूब’, ‘संगम’, ‘आई मिलन की बेला’, ‘आरजू’, ‘सूरज’, ‘झुक गया आसमान’, ‘तलाश’ और ‘गंवार’ जैसी फिल्मों तक चलता रहा। फिल्म पुरस्कारों की बदकिस्मती देखिए कि वह अपनी किसी ट्रॉफी पर उनका नाम कभी नहीं लिखवा पाए।

जी हां, जो सितारा जनता के बीच जुबली कुमार के नाम से मशहूर हुआ वह कभी पुरस्कारों की सेटिंग में नहीं पड़ा और न ही उसने कभी किसी पुरस्कार देने वाली पत्रिका के संपादक की खुशामद ही इस काम के लिए की। राजेंद्र कुमार कहते थे, “अंग्रेजी बोलने वालों से मिली तारीफ से कुछ नहीं होता। तारीफ उससे मिलनी जरूरी है जो दिन में चंद रुपये कमाकर भी शाम को टिकट लेकर मेरी फिल्म देखता है।” राजेंद्र कुमार ने कभी अंग्रेजी फिल्म समीक्षकों की तारीफ को ही अपनी काबिलियत का पैमाना भी नहीं माना।
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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
राजेंद्र कुमार ने जब संगीतम श्रीनिवास राव के साथ अपने बेटे का करियर बचाने के लिए फिल्म ‘फूल’ बनाने का एलान किया तो लोगों को समझ नहीं आया कि ये प्रोजेक्ट बनेगा कैसे। लेकिन कम लोगों को ही ये पता था कि ये राजेंद्र कुमार ही थे जिन्होंने माधुरी की काबिलियत को ‘तेजाब’ की रिलीज से पहले ही पहचान लिया था और उनको अपनी एक फिल्म के लिए साइनिंग अमाउंट भी दे आए थे। राजेंद्र कुमार की इस दरियादिली ने अपना रंग दिखाया और उनके फोन करने पर माधुरी दीक्षित को साल 1987 की बात याद रही और उन्होंने उनकी फिल्म ‘फूल’ में बिना किसी हिचक के काम भी किया। माधुरी चाहतीं तो तब साइनिंग अमाउंट लौटाकर इस फिल्म के लिए मना भी कर सकती थीं, लेकिन माधुरी को हिंदी सिनेमा में दिल से मजबूत और जुबान से पक्की कलाकार माना जाता है। ये इस घटना ने एक बार फिर साबित भी किया। वैसे, माधुरी और कुमार गौरव को एक और फिल्म नाराज के लिए भी साइन किया गया था लेकिन वह फिल्म बनी नहीं।
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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
तो किसी तरह फिल्म शुरू हुई। प्रोड्यूसर तो खुद राजेंद्र कुमार थे ही। इसके बाद डायरेक्टर हो गया, हीरो हो गया, हीरोइन भी हो गई। अब जरूरत आन पड़ी कुछ ऐसे दमदार कलाकारों की जिनके नाम से ये फिल्म बेचने में आसानी हो। सबसे पहले तो राजेंद्र कुमार ने खुद तय किया कि वह इस फिल्म में काम करेंगे। बड़े पर्दे पर ये उनकी आखिरी झलक रही। और, उनके साथ फिल्म में दिखे सुनील दत्त। सुनील दत्त और राजेंद्र कुमार की दोस्ती फिल्म ‘मदर इंडिया’ के जमाने से रही है। फिल्म ‘फूल’ में दोनों ‘मदर इंडिया’ (1957) के बाद ही एक साथ नजर आए और तब तक दोनों समधी भी बन चुके थे। कुमार गौरव ने सुनील दत्त की बेटी नम्रता से शादी की है। इससे पहले कुमार गौरव का नाम उनकी पहली फिल्म ‘लव स्टोरी’ की हीरोइन विजेयता पंडित से भी जुड़ चुका था लेकिन राजेंद्र कुमार ने इस रिश्ते से साफ इनकार कर दिया। कुमार गौरव की मंगनी दरअसल शो मैन राज कपूर की बेटी रीमा से सबसे पहले हुई थी लेकिन कुमार गौरव ने बाद में ये शादी करने से इंकार कर दिया था। फिल्म ‘फूल’ की कहानी भी यही है जिसमें दो दोस्त अपनी संतानों की शादी करना चाहते हैं लेकिन बाद में एक दोस्त बड़ा बिजनेसमैन बन जाता है और शादी से इंकार कर देता है।
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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
माधुरी दीक्षित ने इस फिल्म में सिर्फ राजेंद्र कुमार का सम्मान रखने के लिए काम किया। कुमार गौरव कभी अगले सुपरस्टार माने गए थे और शाहरुख खान भी उनकी शक्ल सूरत देखकर शीशे में खुद को निहारते और खुद को कुमार गौरव जैसे लुक्स वाला यंगमैन मानते थे। लड़कियां तब कुमार गौरव में राजेश खन्ना का अक्स तलाशा करतीं थी लेकिन खराब फिल्मों के चयन और खराब एक्टिंग ने कुमार गौरव का करियर फिल्म ‘फूल’ तक आते आते चौपट कर दिया था। कुमार गौरव खुद ही उन दिनों कहते थे कि ‘फूल’ उनकी पसंद की फिल्म नहीं है और वह ये फिल्म सिर्फ अपने पिता का मन रखने के लिए कर रहे हैं। ‘फूल’ के बाद राजेंद्र कुमार ने किसी फिल्म में काम नहीं किया और न ही फिर कोई दूसरी फिल्म ही उन्होंने बनाई। कुमार गौरव के करियर पर भी इसी फिल्म ने फुल स्टॉप लगाया। बाद में वह पहले से बनती रहीं दो तीन फिल्मों में और बतौर हीरो दिखे लेकिन करियर के उत्तरार्ध में वह बस  ‘गैंग’ और ‘कांटे’ जैसी फिल्मों में शोपीस बनकर रह गए।
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फूल - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कुमार गौरव के मामा मशहूर फिल्ममेकर रमेश बहल ने भी कुमार गौरव को तमाम टिप्स देने की कोशिश की लेकिन कुमार गौरव जब हीरो बन सकते थे तब वह अपने दूसरे शौक पूरे करने में व्यस्त रहे और जब वह हीरो बनने लायक बचे नहीं तो फिर वह मालदीव के अपने टूरिज्म बिजनेस और मुंबई के रीयल एस्टेट बिजनेस में बिजी हो गए। फिल्म ‘फूल’ एक घिसी पिटी कहानी पर बनी ऐसी फिल्म रही जिसने संगीतम श्रीनिवास राव जैसे दिग्गज फिल्म निर्देशक का खाता भी हिंदी सिनेमा में हमेशा के लिए बंद कर दिया। बड़ी मुश्किल से संगीतम को 12 साल बाद साल कमल हासन की द्विभाषी फिल्म मुंबई एक्सप्रेस में हिंदी सिनेमा में अपना नाम करने का एक और मौका मिला, लेकिन वहां भी बात बनी नहीं।

सुनील दत्त और माधुरी दीक्षित के किसी फिल्म में काम करने का यह पहला और आखिरी मौका रहा, इससे पहले सुनील दत्त ने माधुरी को अपने होम प्रोडक्शन की फिल्म मसीहा के लिए साइन किया था, लेकिन वह फिल्म बीच में ही बंद हो गई। अपने उस्ताद सुनील दत्त के साथ काम करने का शक्ति कपूर का भी ये आखिरी मौका रहा। सुनील दत्त ने ही शक्ति कपूर को फिल्मों में मौका दिया था। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।


(बाइस्कोप अमर उजाला डिजिटल का दैनिक कॉलम है जिसमें हम उस दिन रिलीज हुई किसी पुरानी फिल्म के बारे में चर्चा करते हैं।)

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