फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Movie Review: निशाने पर नहीं लगी 'बाबूमोशाय' की गोली

Sun, 27 Aug 2017 08:43 AM IST
रवि बुले
विज्ञापन
1 of 7
'बाबूमोशाय बंदूकबाज' फिल्म रिव्यू
निर्माताः किरण श्रॉफ/अश्मित कुंदेर

निर्देशकः कुषाण नंदी

सितारेः नवाजुद्दीन सिद्दिकी, बिदिता बाग, जतिन गोस्वामी, भगवान तिवारी, दिव्या दत्ता, श्रद्धा दास,अनिल जॉर्ज

रेटिंग: **

'बाबूमोशाय बंदूकबाज' कोई जैंटलमैन नहीं है। नवाजुद्दीन सिद्दीकी के अलावा फिल्म में ऐसी बात नहीं कि आप उसके साथ चलने की सोचें। फिल्म के किरदार उत्तर प्रदेश के किसी जंगलराज वाले हिस्से में है क्योंकि बाबू बिहारी और उससे हत्याएं करने वाले बेधड़क खून-खराबा करते हैं।
विज्ञापन

2 of 7
'बाबूमोशाय बंदूकबाज' फिल्म रिव्यू
इस स्थानीय राजनीति में दो धड़े हैं, जीजी और दुबे (दिव्या दत्ता/अनिल जॉर्ज)। एक-दूसरे के लोगों को खत्म करना उनका लक्ष्य है। बाबू के लिए सब बराबर हैं। वह निःसंकोच हत्याएं करता है। उसका मानना है कि वह यमराज का एजेंट है। दस साल की उम्र में दो केलों के लिए उसने हत्या की थी और तब से लोगों को नीचे से ऊपर डिलिवर करना उसका पेशा है।

पढ़ें: नवाज का बेटा बना कृष्‍ण, खुद नहीं बन पाए थे राम-लीला का हिस्सा
विज्ञापन

3 of 7
'बाबूमोशाय बंदूकबाज' फिल्म रिव्यू
फिल्म बढ़ती है और थोड़े ही समय में उसे टक्कर देने के लिए एक और बंदूकबाज बांके बिहारी (जतिन गोस्वामी) आता है। वह बाबू को गुरु मानता है। जैसे एक म्यान में दो तलवारें नहीं रह सकतीं, वैसे एक इलाके में दो शूटर कैसे रह सकते हैं?

4 of 7
'बाबूमोशाय' बंदूकबाज फिल्म रिव्यू
हत्याओं से भरी फिल्म में यौन उत्तेजना का तड़का लगाने के लिए फुलवा (बेदिता बाग) है। गैंपरेप का शिकार फुलवा तब बाबू की हो जाती है जब वह बलात्कारियों को गोली मार देता है। लेकिन बांके की एंट्री फुलवा के दिल और कहानी में ट्विस्ट पैदा करती है।

पढ़ें: जब अचानक 'रेड लाइट एरिया' पहुंच गए नवाजुद्दीन सिद्दीकी
विज्ञापन

5 of 7
'बाबूमोशाय' बंदूकबाज फिल्म रिव्यू
फिल्म कोई ठोस बात नहीं करती। स्थानीय माफिया/हत्यारों की कहानियां पहले भी पर्दे पर आई हैं। 'गैंग्स ऑफ वासेपुर' की परंपरा को आगे बढ़ाते 'बाबूमोशाय बंदूकबाज' के निशाने में वह बात नहीं है। न ही खास नयापन। सारे किरदार नकारात्मक हैं।
विज्ञापन

6 of 7
'बाबूमोशाय' बंदूकबाज फिल्म रिव्यू
स्त्री पात्र सेक्स ऑब्जेक्ट हैं। पुरुष हत्यारी मानसिकता से ग्रस्त। पुलिस का एकमात्र दरोगा (भगवान तिवारी) आधा दर्जन बच्चे पैदा कर चुका है और कहानी में सात-आठ साल लंबी छलांग के बाद भी उसकी बीवी गर्भवती है। गालियां, अपशब्द, सेक्स की बातें और दृश्य कुछ लोगों को उत्तेजित कर सकते हैं परंतु फिल्म आगे बढ़ती हुई, धार और असर खो देती है। तर्क के लिए यहां कोई जगह नहीं और कहानी का दम बीच में फूल जाता है।

पढ़ें: इंटीमेट सीन में बोल्डनेस लाने के लिए एक्ट्रेस ने किया ये काम, सेंसर बोर्ड ने काट दिया था पूरा सीन
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
'बाबूमोशाय' बंदूकबाज फिल्म रिव्यू
फिल्म में नवाज छाए हैं। भले ही वह टॉल नहीं हैं परंतु डार्क-हैंडसम आत्मविश्वास के साथ भूमिका से न्याय करते हैं। समस्या तब आती है जब उनके सामने कमजोर एक्टर होते हैं। बांके की भूमिका में जतिन निराश करते हैं। बिदिता बेग जरूर नवाज के साथ जमती हैं और दोनों एक-दूसरे के साथ सहज हैं। स्थानीय नेताओं की भूमिका में दिव्या दत्ता और अनिल जॉर्ज का काम भी अच्छा है। अभिनेताओं के बढ़िया परफॉरमेंस के बावजूद फिल्म अपने कथानक और निर्देशन से दर्शकों को बांधने में नाकाम है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें