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JL50 Review: पंकज कपूर को मिस करने का समय खत्म हुआ, देखिए कमाल के कलाकार की शानदार अदाकारी, फिर से!

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जे एल 50 - फोटो : अमर उजाला

Series Review: जेएल 50 (JL 50)
कलाकार: अभय देओल, रितिका आनंद, पंकज कपूर, पीयूष मिश्रा, राजेश शर्मा आदि।
लेखक-निर्देशक: शैलेंद्र व्यास
ओटीटी: सोनी लिव
रेटिंग: ***1/2


एक अनाथ बच्चा जो बड़े होने पर अक्सर एक अनाथालय की बेंच पर आकर सिर्फ इसलिए बैठता है कि शायद उसे पता चल सके कि उसके घरवाले कौन हैं? फिर 35 साल बाद उसे मौका मिलता है इस सच को जानने का और वह भी ठीक उस लम्हे में जब उसे अनाथालय में छोड़ा जा रहा है। समझ नहीं आ रहा ना। थोड़ा फिर से समझाता हूं। जरा सोचिए कैसा होगा वह लम्हा जब बेटा 35 साल का हो और, उसे मौका मिले समय में पीछे जाकर उस मां से मिलने का जिसे वह खोजता फिर रहा हो। क्रिस्टोफर नोलन की ‘इंटरस्टेलर’ देखी है आपने? या फिर दिबाकर बनर्जी की ‘डिटेक्टिव ब्योमकेश बख्शी’? दोनों फिल्मों की रिलीज में छह महीने के करीब का फर्क है। अब सोचिए उन हवाई जहाजों के बारे में जिनके हवाई अड्डों से उड़ने के तो सबूत हैं पर कहीं उतरने की कोई जानकारी नहीं। या फिर, उस घटना के बारे में जिसमें एक जहाज अपनी उड़ान के 35 साल बाद मिला और जिसके सारे मुसाफिरों के शव जले हुए थे।

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जेएल 50 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मामला थोड़ा पेचीदा है। सिर हो सकता है आपका भारी होने लगा हो। लेकिन, क्रिस्टोफर नोलन ने जो बात छह साल पहले करोड़ों डॉलर खर्चने के बाद दुनिया के जेहन में कुलबुलाने के लिए छोड़ी। वही बाद अपने देसी निर्देशक शैलेंद्र व्यास इसका दशांश भी नहीं खर्च करने के बावजूद दर्शकों के दिमाग में छोड़ने में सफल रहे हैं। साइंस फिक्शन फिल्म सिर्फ मार्वेल के ‘एंवेजर्स’ नहीं हैं। वह सत्यजीत रे के फेलुदा का बाना ओढ़कर के भी आपके सामने आ सकते हैं। जैसाकि फिल्म ‘जेएल 50’ में सीबीआई अफसर शांतनु करता है। वह पूर्वोतर भारत में क्रैश हुए एक जहाज की छानबीन करने निकलता है और पता चलता है कि ये जहाज जो 35 साल पहले कलकत्ता से निकला था। इसी बीच एक और जहाज का भी अपहरण हो जाता है, जिसके अपहरणकर्ता अपने नेता की रिहाई की मांग कर रहे हैं।
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जेएल 50 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘जेएल 50’ के बारे में ज्यादा विस्तार से बात करने के लिए इसका मूल खोलना जरूरी है। फिल्म के कथा बिंदुओं, क्षेपक कथाओं और इसके उपसंहार में इसके बावजूद मैं नहीं जा रहा क्योंकि ऐसा करने से फिल्म देखने का आपका मजा किरकरा हो जाएगा। तो फिल्म का मूल ये है कि ये कालखंडों में बजाय घूमकर सीधे यात्रा करने की कहानी है। कैसे, ये आपको फिल्म में पंकज कपूर का किरदार समझाएगा। पंकज कपूर! एक बार फिर, अपने उसी अंदाज में हैं जिसने उनके दुनिया भर में करोड़ों चाहने वाले बनाए हैं। उनका अभिनय फिल्म ‘जेएल 50’ की जान है। एक निस्पृह, निरीह, एकाकी इंसान के भीतर क्या कुछ चलता रहता है, पंकज कपूर से बढ़िया दूसरा कौन दिखा या बता सकता है। नाट्यशास्त्र उन्होंने दिल्ली के एनसीडी में सीखा या फिर दिल्ली की कहीं टिमटिमाती तो कहीं जगमगाती रातों के बीच के सफर में, वही जानें। लेकिन, बरसों बाद पंकज कपूर को अपनी लय में आते देखना बहुत सुखदायी है। उनका अभिनय राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार का हकदार है यहां..! खासतौर से वह दृश्य देखने लायक है जब वह देश की मानसिकता को दुत्कारते हैं। और, उनकी टिप्पणी टीवी चैनलों पर सुशांत सिंह राजपूत मामले को लेकर दिन रात चलने वाली जूतमपैजार पर बिल्कुल सटीक बैठती है।

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जेएल - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
जिस किसी ने भी सोनी लिव चलाने वालों को एक बेहतरीन फिल्म को चार टुकड़ों में काटकर इसे वेब सीरीज बनाकर रिलीज करने का विचार दिया है, वह ओटीटी कारोबार में काम करने लायक नहीं है। फिल्म ‘जेएल 50’ मौजूदा दौर की फिल्म है। ये एक ऐसा पुल है जिससे सिनेमा को पसंद करने वाली दो पीढ़ियों को एक में बांधा जा सकता है। गनमास्टर जी 9 और एजेंट विनोद देखकर बड़े हुए आज के बड़ों और उनके क्रिस्टोफर नोलन के सिनेमा के दीवाने बच्चों को ये फिल्म एक सी पसंद आ सकती है। शैलेंद्र व्यास की यहां आलोचना इसलिए भी हो सकती है कि उन्होंने एक दुरुह विषय को कुछ ज्यादा ही आसानी से समझा दिया लेकिन यही उनकी जीत है। निर्देशक को दर्शक की भाषा समझ आना ही उसकी जीत है। ब्रैडले स्टकेल का कैमरा कमाल का घूमा है। वह दर्शक को कहानी का पात्र बनाने में जल्दी ही कामयाब भी हो जाता है। रक्षित मिस्त्री की साउंड डिजाइन भी काबिले तारीफ है और तन्मय चटर्जी का कला निर्देशन भी।
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जेएल 50 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म की कमजोर कड़ियां बस दो हैं, एक इसका संगीत और दूसरा पीयूष मिश्रा। फिल्म में अभय देओल ने अपनी तरह से अपना बेस्ट देने की कोशिश की है। साथ में असर छोड़ जाने लायक किरदार में दिखी हैं रितिका आनंद। उनकी कद काठी आम फिल्मी हीरोइनों से भिन्न है और शायद इसीलिए उन्होंने भी किरदार ही ऐसा चुना जिसमें वह ठीक लगें। अभिनय वह अच्छा करती हैं। पीयूष मिश्रा का अपना एक अलग फैनबैस रहा है। 'रिबेलियन' टाइप के युवाओं में अपनी तरह का क्रांति रस भरते रहे पीय़ूष यहां इस फिल्म में जब भी परदे पर आते हैं, खराब लगते हैं। उनकी ओवर एक्टिंग उनके टैलेंट पर भारी पड़ जाती है। फिल्म में राजेश शर्मा भी है, हालांकि उनके लिए किरदार थोड़ा बेहतर लिखा जा सकता था। फिल्म या कहें कि वेब सीरीज हिंदी सिनेमा के उस बदलते दौर की फिल्म है जहां दर्शकों के कान अच्छी कहानी का जिक्र सुनते ही खड़े हो जाते हैं। और, इस कसौटी पर खरी भी उतरती है। हां, फिल्म का उपसंहार थोड़ा बेहतर सोचा जा सकता था हालांकि अभी जो है वह भी आपकी 'सिक्स्थ सेंस' का रिवाइंड बटन तो दबा ही जाता है।

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