घुंघरू
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म में सुरेश ओबेरॉय, स्मिता पाटिल और शशि कपूर का प्रेम त्रिकोण है। वहीदा रहमान नमक हलाल में भी थी, यहां भी हैं। नमक हलाल में वह शशि कपूर की देखरेख करती हैं। यहां शशि कपूर उनके गोद लिए बेटे विक्रम बने हैं, जिन्हें एक तवायफ केसर से प्यार हो जाता है। रानी मां के खुद मां बनने क बाद विक्रम को रियासत की देखरेख की जिम्मेदार मिलती है। केसर और विक्रम का ब्याह नहीं हो पाता। केसर चली जाती है सूरज के साथ और वहां विक्रम की बेटी को जन्म देती है। रानी मां का असली बेटा कॉलेज में जिस खूबसूरत सी लड़की के प्यार में गिरफ्तार होता है, वह केसर और विक्रम की बेटी है। वफादार विक्रम तो रानी मां का कहना मान गया था लेकिन बेटा नहीं मानता। फिर साजिशें रची जाती हैं। फिर मोहब्बत का कत्ल करने का षडयंत्र बुना जाता है। लेकिन, इस बार सूरज सिर पर चढ़ आता है।
फिल्म घुंघरू का नमक हलाल और शराबी के बीच में रिलीज होना ही इस फिल्म की इकलौती कमजोर कड़ी रही। जैसे प्रकाश मेहरा के काबिल असिस्टेंट राकेश कुमार ने फिल्म खून पसीना में प्रकाश मेहरा का नाम रोशन किया था, वैसा कारनामा राम सेठी तो नहीं दिखा पाए लेकिन फिल्म उन्होंने भी ठीक ठाक सी और काफी मनोरंजक बनाई। फिल्म की जान हैं स्मिता पाटिल और फिल्म मुकद्दर का सिकंदर में रेखा वाला रूप दोहराकर स्मिता पाटिल ने केसर के रूप में अपनी खुशबू जमाने भर में महकाने में कामयाबी पाई। फिल्म की एक कमजोर कड़ी ये भी है कि इसकी पटकथा बिल्कुल जाने पहचाने ढर्रे पर चलती है और एक आम दर्शक भी बता सकता है कि आगे क्या होने वाला है। लेकिन, फिल्म को अब भी देखो तो ये बोर नहीं करती। इसकी स्पीड ऐसी है कि एक के बाद एक कुछ न कुछ होते रहता है और कहानी भागती रहती है।