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बाइस्कोप: इसलिए महात्मा गांधी के बेटे ने कुबूल कर लिया इस्लाम, ‘गांधी माई फादर’ के 10 दिलचस्प किस्से

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गांधी माई फादर - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला

कभी मुन्ना, कभी लखन तो कभी मिस्टर इंडिया बनकर पिछले 40 साल से देश दुनिया में बसे हिंदी सिनेमा के कद्रदानों का मनोरंजन करते आ रहे अभिनेता अनिल कपूर ने अपनी बिटिया सोनम को लेकर ‘फन्ने खां’, ‘वीरे दी वेडिंग’, ‘खूबसूरत’ और ‘आयशा’ नाम की चार फिल्में बनाई हैं, अब तक नौ फिल्मों के वह प्रोड्यूसर रहे। अनिल ने बतौर फिल्म निर्माता पहली फिल्म बनाई थी अपने पुराने दोस्त सतीश कौशिक के साथ मिलकर, ‘बधाई हो बधाई’। फिल्म कंपनी के नाम में दोनों दोस्तों का नाम था। लेकिन फिर अनिल कपूर ने सिर्फ अपने ही नाम से अनिल कपूर फिल्म कंपनी बनाई और राम गोपाल वर्मा के साथ मिलकर बनाई, ‘माई वाइफ्स मर्डर’।

अनिल कपूर इन दोनों फिल्मों में टिपिकल मसाला फिल्मों से कुछ हटकर करने की कोशिश में कभी खूब फूले तो कभी खूब पिचके, लेकिन उनके भीतर का असल फिल्म निर्माता जागा फिल्म, ‘गांधी, माई फादर’ में। ‘गांधी, माई फादर’ को रिलीज हुए 13 साल पूरे हो गए हैं और अगर आपने ये फिल्म अब तक नहीं देखी है तो कम से कम ये जानने के लिए जरूर देखिए कि जो इंसान एक पूरे देश का राष्ट्रपिता कहलाया, वह अपने सबसे बड़े बेटे की नजर में ही अच्छा पिता क्यों नहीं बन सका।

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गांधी माई फादर - फोटो : सोशल मीडिया
बीते हफ्ते ही ओटीटी पर रिलीज हुई फिल्म ‘शकुंतला देवी’ में सबने देखा कि कैसे किसी इंसान का सपना उसे हकीकत के रिश्तों से दूर कर देता है। ये वो इंसान है जो किसी बड़े काम का सपना देखते हैं और फिर उसी की धुन में दिन रात जुट जाते हैं। कसमें, वादे, प्यार और वफा सब उन्हें बातें लगती हैं, और बातों का क्या? शकुंतला देवी ने करोड़ो रुपये कमाए पर अपनी बेटी का सुख नहीं खरीद सकीं। मोहनदास करमचंद गांधी ने पूरा देश कमा लिया लेकिन अपने बेटे के दिल में अपने लिए प्यार नहीं कमा पाए, क्यों भला? और, यहां तक कि उसे मुसलमान बनने से भी नहीं रोक पाए। महात्मा गांधी का इस फिल्म में संवाद है, ‘जानते हो मेरी जिंदगी की सबसे बड़ी हार क्या है? दो ऐसे इंसान जिन्हें मैं जिंदगी भर अपनी बात नहीं समझा पाया। एक मेरा काठियावाड़ी दोस्त मोहम्मद अली जिन्ना और दूसरा मेरा अपना बेटा हरी लाल। हरी लाल गांधी।’

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गांधी माई फादर - फोटो : सोशल मीडिया

छोटे शहरों व गांवों के स्कूलों में 2 अक्टूबर के दिन आज भी बजने वाले गाने ‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल’ वाली फिल्म ‘जागृति’ साल 1954 में बनी, उसके बाद बरसों तक महात्मा गांधी के नाम पर हिंदी सिनेमा में कुछ बड़ा कम ही सुनने को मिला। फिर एक विदेशी फिल्मकार रिचर्ड एटनबरो ने हमें बताया कि सिनेमा में भी ‘गांधी’ का कोई सानी नहीं है। उन्होंने ये फिल्म बनाई और देश दुनिया में मशहूर हुए। फिल्म को ऑस्कर की 11 कैटेगरी में नॉमीनेशन मिला और इसने बेस्ट पिक्टर, बेस्ट डायरेक्टर और बेस्ट एक्टर समेत आठ अवॉर्ड जीते भी। एक अवॉर्ड इसमें कॉस्ट्यूम डिजाइनिंग का भारतीय वेशभूषा विशेषज्ञ भानु अथैया को भी मिला। भानु ने इस फिल्म में स्टार वॉर्स सीरीज के मशहूर कॉस्ट्यूम डिजाइन जॉन मोलो के साथ काम किया और पुरस्कार भी दोनों ने साथ ही जीता।

इस फिल्म के बाद श्याम बेनेगल की फिल्म ‘मेकिंग ऑफ महात्मा’ को छोड़ दें तो किसी दूसरी फिल्म में महात्मा गांधी को कथानक की मूल धारा के रूप में कम ही देखा सुना गया। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ में एक टपोरी का महात्मा गांधी से काल्पनिक संवाद लोगों को खूब पसंद आया और इसी के साथ महात्मा गांधी फिर से सिनेमा के फलक पर भी लौट आए। ‘मुन्नाभाई एमबीबीएस’ का महात्मा गांधी के जीवन से वैसे कोई लेना देना नहीं है लेकिन फिल्म में एक रूपक के तौर पर जिस तरह गांधी को दिखाया गया, वह हिंदी सिनेमा का एक नायाब प्रयोग माना जाता है।


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गांधी माई फादर - फोटो : सोशल मीडिया
भारतीय रंगमंच के लिए पिछली सदी का आखिरी दशक काफी प्रयोगधर्मी रहा। ये वो दशक है जब पृथ्वी थिएटर में ‘तुम्हारी अमृता’ और ‘सेल्समैन रामलाल’ जैसे नाटकों ने धूम मचा रखी थी। इन नाटकों के निर्देशक थे फिरोज अब्बास खान जो पिछले कुछ सालों से अपने संगीतमय नाटकों ‘मुगल ए आजम’ के अलावा ‘रौनक और जस्सी’ के जरिए खूब चर्चा में हैं। फिल्म ‘गांधी माई फादर’ फिरोज अब्बास खान ने ही निर्देशित की है। रंगमंच के एक काबिल निर्देशक और हिंदी सिनेमा के एक बड़े सितारे का ये एक ऐसा मेल रहा जिसने अनिल कपूर की इज्जत रातों रात हिंदी सिनेमा के सुधी दर्शकों के दिलों में बहुत ज्यादा बढ़ा दी। यूं लगा कि हिंदी सिनेमा को कोई ऐसा राह दिखाने वाला मिल गया है जिसके बनाए रास्ते पर हिंदी सिनेमा कुछ प्रयोगधर्मी सिनेमा बनते और देखेगा। लेकिन, अच्छी फिल्में न बनने की दिन रात चर्चा करने वाले वे तमाम दर्शक ही इस फिल्म ‘गांधी माई फादर’ के बॉक्स ऑफिस पर न चल पाने के जिम्मेदार रहे, जो ये फिल्म देखने सिनेमाघर ही नहीं गए।

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गांधी माई फादर - फोटो : सोशल मीडिया
फिल्म ‘गांधी माई फादर’ के समय कोई बड़ा शोर शराबा फिल्म का रिलीज से पहले हुआ नहीं था। हिंदी पट्टी के तो आधे दर्शकों को पता भी नहीं चला कि ये फिल्म कब आई और कब सिनेमाघरों से उतर भी गई। लेकिन, जिसने भी ये फिल्म देखी, उसने इसकी तारीफ की। फिल्म की रिलीज के वक्त एक बातचीत में तब अनिल कपूर ने कहा था, “मैंने इस फिल्म का निर्माता बनना सिर्फ इसलिए स्वीकार किया क्योंकि इसकी कहानी महात्मा गांधी को राष्ट्रपिता के रूप में नहीं दिखाती बल्कि ये कहानी उनको अपने बेटे हरीलाल के पिता के रूप में सामने लाती है। निर्माता के रूप में मेरा इरादा अपनी प्रोडक्शन कंपनी के लिए अंतर्राष्ट्रीय मानक तय करना है।”

लेकिन, करीब आठ करोड़ की लागत से बनकर सिनेमाघरों तक पहुंच फिल्म ‘गांधी माई फादर’ जब अपनी लागत भी बॉक्स ऑफिस पर नहीं कमा सकी तो अनिल कपूर ने विश्व सिनेमा को प्रभावित करने का अपना ये विचार फिलहाल के लिए मुल्तवी किया और फिर से लग गए दूसरों की फिल्मों में एक्टिंग करने। फिल्म का घाटा पूरा करने के लिए उन दिनों जो फिल्म सामने आईं सब कर लीं। और, बतौर प्रोड्यूसर भी जो अगली फिल्म बनाई उसमें हीरो लिया अरशद वारसी और अक्षय खन्ना को, नाम था, ‘शॉर्टकट - कॉन इज ऑन।’

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गांधी माई फादर - फोटो : सोशल मीडिया

‘गांधी माई फादर’ अनिल कपूर और फिरोज अब्बास खान ने बड़े दिल से बनाई थी। फिरोज इसके पहले एक नाटक भी किया करते थे, जिसका नाम था महात्मा वर्सेज गांधी। फिल्म की थीम भी बहुत कुछ इस नाटक जैसी ही है लेकिन कहा ये भी जाता है कि अनिल कपूर ने ये फिल्म चंदूलाल भागुभाई दलाला की लिखी हरी लाल की जीवनी पर बनाई। फिल्म की शूटिंग दक्षिण अफ्रीका के अलावा भारत में अहमदाबाद और मुंबई में हुई है।

फिरोज अब्बास खान से भी उन दिनों फिल्म की रिलीज के वक्त इस पर लंबी बात हुई। अपनी फिल्म के बारे में फिरोज ने तब लंबी चर्चा की थी। वह कहते हैं, “महात्मा गांधी को आप किसी कालखंड में नहीं बांध सकते। वह जितने सामयिक सत्तर अस्सी साल पहले थे, उतने ही सामयिक आज भी हैं। उनका किरदार बहुत असरकारी और विचित्र है। रिचर्ड अटनबरो ने अपनी फिल्म ‘गांधी’ के जरिए महात्मा के बारे में पश्चिमी देशों को फिर से बताया। मैंने तो गांधी को उतना ही जाना जितना लोगों ने मुझे बताया, लेकिन फिल्म से मुझे पता चला कि वह तो पूरा जीवन दिल पर एक बड़ा बोझ लेकर जीते रहे और ये बोझ था उनके बड़े बेटे। एक महान व्यक्ति की छाया में एक बेटा कैसे जीता रहा, यही मेरी फिल्म की कहानी है। वह भिखारियों की तरह यहां वहां घूमा। मुसलमान बनने के बाद उसने अपना नाम अब्दुल्ला गांधी रख लिया। फिर प्रायश्चित करने के लिए हिंदू बना और फिर शराब पी पीकर खुद को खत्म कर लिया। महात्मा गांधी ने पूरे एक देश की आत्मा बदल दी लेकिन अपने बेटे की आत्मा वह नहीं बचा सके।”

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गांधी माई फादर - फोटो : सोशल मीडिया

फिल्म ‘गांधी माई फादर’ में तीन किरदार ही सबसे मुख्य हैं। महात्मा गांधी का रोल किया दर्शन जरीवाला ने। कस्तूरबा बनीं शेफाली शाह। और फिल्म के टाइटल रोल में आए अक्षय खन्ना। अक्षय खन्ना बेहतरीन कलाकार हैं लेकिन वह किसी से काम मांगने नहीं जाते। और मांगने तो क्या, कई बार जब काम उनके पास चलकर आता भी है तो भी हाथ नहीं आते। फिल्म ‘गांधी माई फादर’ का किस्सा भी कुछ ऐसा ही है। अनिल कपूर का फोन ही वह नहीं उठाते थे। अनिल कपूर उन्हें फोन करते हरी लाल के रोल के लिए, अक्षय को लगता कि अनिल उनसे गांधी का रोल कराने वाले हैं। बड़ी मुश्किल से अनिल ने अक्षय को ये संदेश भिजवाया कि मामला वैसा नहीं है जैसा वह समझ रहे हैं। तब जाकर अक्षय खन्ना मीटिंग के लिए राजी हुए और बात आगे बढ़ी।
 

बात दरअसल बिगड़ी थी, अनिल कपूर और अनुपम खेर के बीच शुरू हुई गलतफहमी से। दोनों ने कभी इस फिल्म की कहानी पर लंबी चर्चा की थी और तय किया था कि फिल्म साथ बनाएंगे। अनिल का बड़ा मन था कि इस फिल्म में अनुपम खेर ही गांधी का किरदार निभाएं लेकिन अनिल को जब पता चला कि अनुपम खेर ने उन्हें बिना बताए गांधी पर ही निर्देशक जानु बरुआ के साथ एक नई फिल्म शुरू कर दी है तो अनिल कपूर को अच्छा नहीं लगा। ये फिल्म थी ‘मैंने गांधी को नहीं मारा’। अनिल को लगा कि अनुपम उनकी फिल्म की बजाय इस फिल्म में महात्मा गांधी का रोल करने जा रहे हैं। फिल्म के निर्माता भी अनुपम खेर थे।

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गांधी माई फादर - फोटो : सोशल मीडिया
बस, अनिल ने उसी मूड में अपनी फिल्म की कास्टिंग कर डाली। ये बात किसी तरह अक्षय खन्ना को पता चल गई थी और उनको लगता था कि अनुपम खेर के प्रोजेक्ट से निकल जाने के बाद अनिल कपूर अब उनके रिप्लेसमेंट के तौर पर उन्हें तलाश रहे हैं। उधर, अनुपम खेर ने अनिल कपूर को समझाने की कोशिश की, कि वह अपनी फिल्म में गांधी का रोल नहीं कर रहे हैं, लेकिन तब तक तीर कमान से निकल चुका था।

फिल्म ‘गांधी माई फादर’ में अक्षय खन्ना ने मानसिक रूप से विचलित और भावुकता की सारी हदें तोड़ चुके युवक हरी लाल का किरदार किया है। हरी लाल अपने पिता की तरह विदेश जाकर पढ़ लिखकर बड़ा वकील बनना चाहता है लेकिन मोहनदास गांधी को ये मंजूर नहीं है। हरी लाल का दिल टूटता है तो वह सब कुछ छोड़ अपनी पत्नी के पास चला आता है। सीनियर गांधी समझाते भी हैं कि ये वक्त देश सेवा का है लेकिन जूनियर गांधी नहीं मानता। बाप बेटे के बीच के भावनात्मक संघर्ष की ये कहानी दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक सफर करती है।

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गांधी माई फादर - फोटो : सोशल मीडिया
ये कहानी बहुत विचलित कर देने वाली कहानी है, खासतौर से उन दृश्यों में जहां बेसहारा और लाचार हरी लाल को कोई गांधी परिवार से देखने तक नहीं आता। महात्मा गांधी जैसी महान शख्सियत के जीवन में घटी एक ऐसी निजी त्रासदी है जिसके बारे में उन्होंने कम ही बात की। ये दुख उनके उतने होनहार न रहे बेटे के जीवन में भी उतने ही गहरे तक व्याप्त रहता है। बाप-बेटे की इस भावुक कहानी की पृष्ठभूमि है दक्षिण अफ्रीका का रंगभेदी और नस्लीय माहौल और यहां भारत में अंग्रेजी हुकूमत के हाथों जलील होती पूरी एक पीढ़ी। फिल्म में संघर्ष की एक और धारा बाप-बेटे के इस वैचारिक द्वंद्व के बीच चलती रहती है और ये संघर्ष कर रही हैं कस्तूरबा। कस्तूरबा को इस सारे माहौल के बीच अपने बेटों की हिफाजत भी करनी है और साथ ही इस बात का भी ध्यान रखना है कि उनका पति अब एक पिता की बजाय राष्ट्रपिता बनने की ओर अग्रसर हो चला है। दर्शन जरीवाला ने इस फिल्म में बेहतरीन अभिनय के बेस्ट सपोर्टिंग एक्टर का नेशनल फिल्म अवॉर्ड जीता था। फिल्म को 55वें नेशनल फिल्म अवार्ड्स में बेस्ट स्क्रीनप्ले अवार्ड से भी सम्मानित किया गया। आज के बाइस्कोप में इतना ही, कल बात करेंगे एक और ओल्डी गोल्डी की..। सिलसिला जारी है।

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