डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे
- फोटो : अमर उजाला, मुंबई
सुनने में ‘डॉली किट्टी और वो चमकते सितारे’ की कहानी रोचक लगती है। लेकिन, किसी शॉर्ट फिल्म के लिए तो ये सही मसाला है पर निर्देशक को तो दो घंटे की फिल्म बनानी है। तो फिर झेलिए। ग्रेटर नोएडा का बिल्डर स्कैम यहां है। छोटे से बच्चे के लैंगिक पसंद का अतार्किक मुद्दा यहां है। और, है एंटी रोमियो दस्ता। साथ में होम डिलीवरी करने वालों का धर्म भी चिप्पी की तरह कहानी पर चिपका है। अलंकृता को जो कहानी सीधे सीधे डॉली और किट्टी की कहानी बनाकर कहनी चाहिए थी, उसे उन्होंने जमाने का जनाजा बना डाला है। कोंकणा और भूमि कहने को भले बहुत बोल्ड और हिम्मती कलाकार हों, लेकिन कोंकणा की अपनी उम्र की बंदिशें हैं, भूमि का जो करियर प्लान है, वह कहानी की मांग के बावजूद उन्हें देह दिखाने की अनुमति देता नहीं है। दोनों से अपने अपने किरदार आधे अधूरे अनमने ढंग से निभते दिखते हैं। अमोल पाराशर की कास्टिंग ही गलत है, हां, विक्रांत मैसी ने पूरी कोशिश की है अपने रोल में ढलने की और इसके लिए की गई उनकी मेहनत परदे पर दिखती भी है।