कोई दो हफ्ते बाद 27 सितंबर को हिंदी सिनेमा के सबसे प्रतिष्ठित प्रोडक्शन हाउस यशराज फिल्म्स के संस्थापक यश चोपड़ा की जयंती है। ये साल इस कंपनी के 50 साल पूरे होने का साल है। उस दिन यश चोपड़ा के बेटे आदित्य चोपड़ा कुछ नए एलान करेंगे, कंपनी के साल भर देश विदेश में चलने वाले जश्न की जानकारी देंगे और बताएंगे उन तमाम नई फिल्मों के बारे में जिनमें दीपिका पादुकोण, अनुष्का शर्मा, कैटरीना कैफ, वाणी कपूर, मानुषी छिल्लर, शरवरी और शालिनी पांडे के किरदारों की बानगी पूरी दुनिया जानना चाहती है। 1973 में रिलीज हुई पहली फिल्म ‘दाग’ से लेकर पिछले साल रिलीज हुई फिल्म ‘वॉर’ तक यशराज फिल्म्स कुल 76 फिल्में बना चुकी है और इसकी पांच नई फिल्में फ्लोर पर हैं। इन 81 फिल्मों में अगर किसी महिला किरदार के नाम पर बनी फिल्मों की बात करें तो ऐसी फिल्में सिर्फ दो हैं, ‘नूरी’ और ‘चांदनी’। जिन फिल्मों में कहानी के दोनों लीड किरदारों के नाम आए वे फिल्में रहीं, ‘वीर जारा’ और ‘नील एंड निक्की’। महिला विषय प्रधान दो फिल्में ‘मर्दानी’ और ‘मर्दानी 2’ भी यशराज फिल्म्स के बैनर तले बन चुकी हैं।
लेकिन, जिस फिल्म की बात मैं आज के बाइस्कोप में करने वाला हूं ये वो फिल्म है जिसने यशराज फिल्म्स को डूबने से बचाया। उधार के पैसे लेकर बनी यशराज फिल्म्स की शायद ये इकलौती फिल्म है। फिल्म में निर्माता के तौर पर यश चोपड़ा और सहायक निर्माता के तौर पर टी सुब्बारामी रेड्डी का नाम है। अमिताभ बच्चन, शत्रुघ्न सिन्हा, शशि कपूर, राखी, परवीन बाबी, नीतू सिंह और संजीव कुमार स्टारर फिल्म ‘काला पत्थर’ के बाद यशराज फिल्म्स की छह बैक टू बैक फिल्में ‘नाखुदा (1981)’, ‘सिलसिला (1981)’, ‘सवाल (1982)’, ‘मशाल (1984)’, ‘फासले (1985)’ और ‘विजय (1988)’ वैसा करिश्मा करने से चूक गई जैसी कि इनसे उम्मीद की गई थी। इनमें से ‘सिलसिला’, ‘फासले’ और ‘विजय’ ने बतौर फिल्म निर्देशक यश चोपड़ा की साख को काफी चोट पहुंचाई। लेकिन, साल 1989 में 14 सितंबर 1989 को जब ‘चांदनी’ रिलीज हुई तो इसने आगे पीछे के सारे हिसाब बराबर कर दिए। विनोद खन्ना, ऋषि कपूर और श्रीदेवी स्टारर फिल्म ‘चांदनी’ ही हमारे आज के बाइस्कोप की फिल्म है।
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