फूल
- फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
जलवा जुबली कुमार का
वह जमाना ऐसा था जब उनकी आधा आधा दर्जन फिल्में एक साथ तमाम शहरों के सिनेमाघरों में लगी होतीं और सब कम से कम 25 हफ्ते (सिल्वर जुबली) इन सिनेमाघरों मे चलती रहतीं। ‘धूल का फूल’ से शुरू हुआ सिल्वर जुबली फिल्मों का ये सिलसिला ‘दिल एक मंदिर’, ‘मेरे महबूब’, ‘संगम’, ‘आई मिलन की बेला’, ‘आरजू’, ‘सूरज’, ‘झुक गया आसमान’, ‘तलाश’ और ‘गंवार’ जैसी फिल्मों तक चलता रहा। लेकिन, शायद ही आपको पता हो कि जो सितारा जनता के बीच जुबली कुमार के नाम से मशहूर हुआ वह कभी पुरस्कारों की सेटिंग में नहीं पड़ा और न ही उसने कभी किसी पुरस्कार देने वाली पत्रिका के संपादक की खुशामद ही इस काम के लिए की। राजेंद्र कुमार कहते थे, “अंग्रेजी बोलने वालों से मिली तारीफ से कुछ नहीं होता। तारीफ उससे मिलनी जरूरी है जो दिन में चंद रुपये कमाकर भी शाम को टिकट लेकर मेरी फिल्म देखता है।” राजेंद्र कुमार ने कभी अंग्रेजी फिल्म समीक्षकों की तारीफ को ही अपनी काबिलियत का पैमाना भी नहीं माना।