फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Betaal Review: शाहरुख खान के प्रोडक्शन हाउस से ज्यादा नेटफ्लिक्स के लिए खतरे की घंटी बना 'बेताल'

Sun, 24 May 2020 11:34 PM IST
Mishra Mishra पंकज शुक्ल, मुंबई
विज्ञापन
1 of 6
बेताल - फोटो : Social Media
वेब सीरीज रिव्यू: बेताल
कलाकार: विनीत कुमार, सुचित्रा पिल्लै, आहना कुमरा और जीतेंद्र जोशी आदि।
निर्देशक: पैट्रिक ग्राहम, निखिल महाजन
निर्माता: रेड चिलीज एंटरटेनमेंट, ब्लमहाउस प्रोडक्शंस, एस के ग्लोबल एंटरटेनमेंट
ओटीटी: नेटफ्लिक्स
रेटिंग: *1/2


ज्यादा दिन नहीं हुए जब रेड चिलीज एंटरटेनमेंट के दफ्तर से बुलावा आया उन दिनों रिलीज होने जा रही फिल्म ‘हर किसी के हिस्से कामयाब’ के निर्माता मनीष मूंदड़ा और कंपनी के सीईओ गौरव वर्मा का इंटरव्यू करने का। साढ़े तीन बजे के तय समय से पांच मिनट पहले मैं पहुंच गया। उसके बाद गेट से लेकर इंटरव्यू के लिए तय मंजिल तक पहुंचने में जो रायता फैलता दिखा, उससे अंदाजा हो गया कि रेड चिलीज अब वो रेड चिलीज नहीं रहा, जिसमें पहले सब कुछ चुस्त चौकस हुआ करता था। परखी लगाके गेहूं परखने की सीख शहर में भी काम करती है। किसी दफ्तर के गेट से लेकर सीईओ तक पहुंचने में आपके सामने जो कुछ होता है, वही कंपनी का भविष्य होता है।
विज्ञापन

2 of 6
बेताल - फोटो : Social Media
ये संदर्भ यहां इसलिए क्योंकि प्रसंग एक दर्शक के समय का है। ठीक है कि रेड चिलीज ने विंडो सीट फिल्म्स के नक्शे कदम चलते हुए पूरी सीरीज बनाने के बाद आधी इसके सीजन 2 के लिए बचा ली है। लेकिन, व्याख्या यही है कि जैसा हाल सीरीज शी का हुआ, उससे कहीं खराब सीरीज ये बनी है, बेताल। पैट्रिक ग्राहम को किसी लंदन जाती फ्लाइट पर इसी कोरोना काल में जाते देखा जाए तो बड़ी बात नहीं होगी। इस बंदे को पता ही नहीं कि बनाना क्या है? गूल में किसी तरह लोगों ने इनका वीभत्स रस झेल लिया लेकिन बेताल में तो उन्हें किस रस पर टिके रहना है, वह खुद ही कन्फ्यूज रहे।
विज्ञापन

3 of 6
betaal - फोटो : amar ujala
छत्तीसगढ़ मैंने बहुत ही तबीयत से घूमा है। बिलासपुर से लेकर अबूझमाड और आगे बस्तर की लोहे की खदानों तक। इस सीरीज के बनाने वाले शायद रायपुर तक भी न गए हों। बाहुबली की म्लेच्छ सेना जैसी कोई बोली खोज लेना भर इस सीरीज को बनाने वालों का पूरा प्रसाद है। कहानी एक सुरंग की है जो किसी हाईवे के रास्ते में पड़ रही है। इत्ती चौड़ी भी नहीं कि उसके भीतर से हाईवे गुजर जाए और जब इसके अंदर से रास्ता निकलना ही नहीं है तो फिर खोलने की जरूरत क्या है? इलाके के आदिवासी सुरंग ताके बैठे हैं। सुरंग के भीतर सन 1857 की फौज की जिंदा लाशें (जॉम्बीज) हैं।

4 of 6
बेताल - फोटो : Social Media
ऐसे जॉम्बीज इस सीरीज के बनाने वालों ने खोज निकाले हैं कि असली जॉम्बी फिल्में बनाने वाले शरमा जाएं। ट्रेन टू बुसान, वर्ल्ड वॉर जेड, 28 डेज या नाइट ऑफ द लिविंग डेड अगर आपने देख ली हैं, तो आपको खुद पर कोफ्त होने लगेगी कि ये सीरीज देखनी शुरू ही क्यों की? विनीत कुमार सिंह ने ये सीरीज और इससे पहले बार्ड ऑफ ब्लड सिर्फ शाहरुख खान के प्रोडक्शन हाउस के नाम पर साइन कर ली या वाकई उनको ये दोनों विषय बहुत अच्छे लगे, अगली मुलाकात में मैं उनसे जरूर पूछने वाला हूं।
विज्ञापन

5 of 6
बेताल - फोटो : Social Media
विनीत बहुत ही सधे हुए और समर्पित अभिनेता हैं। ये वेबसीरीज बनाने वालों की दिक्कत है कि वे उनके लायक किरदार नहीं गढ़ रहे। आहना कुमारा कहीं से अपने किरदार में ढल नहीं पातीं। वह सही कहती हैं कि ये किरदार तो कोई भी पुरुष कलाकार कर सकता था, फिर एक महिला किरदार यहां बनाने की जरूरत क्या थी? सुचित्रा पिल्लै के लिए यहां करने को कुछ है नहीं सिवाय बालों के सफेद काले होने के। जीतेंद्र जोशी का किरदार भी ढंग से लिखा जाता तो मामला बन सकता था।
विज्ञापन
विज्ञापन

6 of 6
बेताल - फोटो : Social Media
सीरीज का तकनीकी पक्ष भी बहुत ज्यादा कमजोर है। शूटिंग लगता है चलताऊ कैमरों पर बिना सही लाइटिंग के कर ली गई है। कॉस्ट्यूम में कोई रिसर्च नहीं है। मेकअप भी बहुत सस्ता है। यूं लगता है कि नेटफ्लिक्स कंपनी को एक के बाद एक गैंग्स ऑफ वासेपुर के रामाधीर सिंह खूब मिल रहे हैं। आधा साल बीतने को आया, एक ढंग का हिंदी सिनेमा या सीरीज ये लोग अब तक नहीं रिलीज कर पाए हैं। सब, सब तरफ से बंद है। अगला नंबर फिर अनुराग कश्यप की फिल्म चोक्ड का है। देखते हैं, वहां क्या खुला है, क्या बंद है।



बोल्ड अंदाज में दिशा पाटनी ने किया डांस, देखकर टाइगर श्रॉफ ने यूं दिया रिएक्शन
 
और पढ़ें...
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें