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Aashram review: जरूरत से ज्यादा खींची गई कहानी ने निकाल दी बाबाजी की हवा, देखिए मिले कितने स्टार

Fri, 28 Aug 2020 07:55 PM IST
प्रतीक्षा राणावत पंकज शुक्ल, मुंबई
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आश्रम रिव्यू - फोटो : अमर उजाला
Web Series Review: आश्रम
कलाकार: बॉबी देओल, चंदन रॉय सान्याल, अदिति पोहनकर, तुषार पांडे, विक्रम कोचर, राजीव सिद्धार्थ, अनुप्रिया गोयनका और दर्शन कुमार
निर्देशक: प्रकाश झा
ओटीटी: एमएक्स प्लेयर
रेटिंग: **


जी5 के लिए बेहतरीन फिल्म ‘परीक्षा’ बनाने वाले प्रकाश झा फिर से उसी दलदल में उतर आए हैं, जिसमें फंसकर बतौर निर्देशक वह बड़े परदे पर अपना आकर्षण खो बैठे हैं। उनकी कहानियों ने जब भी स्टार के आकर्षण के सहारे आगे बढ़ने की कोशिश की है, वह कामयाब नहीं हो पाए हैं, ‘आश्रम’ फिर एक बार ये बात साबित करती है। मुफ्त में दिखने वाली वेब सीरीज के नाम पर एमएक्स प्लेयर और अल्ट बालाजी पर सॉफ्ट पोर्न परोसा जाता है, यही इन दोनों ओटीटी की इमेज है। ऐसे ओटीटी पर बॉबी देओल ने अपनी सीरीज आने दी, ये उनकी मजबूरी हो सकती है। लेकिन, प्रकाश झा की पैसे को लेकर ऐसी कोई मजबूरी रही होगी, समझना मुश्किल है।
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आश्रम - फोटो : ट्विटर
‘आश्रम’ के साथ यहां दिक्कत इसके एपीसोड की लंबाई के अलावा हर क्षेपक का अनावश्यक विस्तार भी है। ये कहानी एक स्वयंभू भगवान की है जिसे उसके भक्त बाबाजी के नाम से पहचानते हैं। वह अपना अतीत सबसे छिपाता है। दूसरों का भविष्य चमकाने का वादा करता है। बस अपना वर्तमान संभाल नहीं पाता। तमाम धूम धड़ाके के साथ प्रकाश झा अपना बाबा दर्शकों के सामने लेकर आते हैं और फिर एकदम से आठ साल पीछे चले जाते हैं। एक दलित की प्रतिभा पर एक ऊंची जाति भारी पड़ती है। जो हार गई वह पम्मी है। इम्तियाज अली की वेब सीरीज ‘शी’ में आपने इन्हें देखा है। उनकी मौजूदगी यह बताने के लिए काफी है कि आगे सीरीज में वह क्या करने वाली हैं, क्या दिखाने वाली हैं।
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आश्रम - फोटो : ट्विटर
बाबाजी निराला काशीपुर वाला चमत्कारी है। चेहरे पर एक ओज सा बनाए रखता है। उसकी लीलाएं जितनी भक्तों के सामने हैं, उससे कहीं ज्यादा मारक, घातक और त्रासक परदे के पीछे हैं। वह मुस्कुराता रहता है। उसका खास चेला भोपे सबका काम लगाता रहता है। सीरीज का असली आकर्षण चंदन रॉय सान्याल की अदाकारी ही है। वह जब भी बॉबी देओल के साथ फ्रेम में दिखते हैं, इक्कीस साबित होते हैं। सीरीज देखते समय दिक्कत ये है कि ऐसे तमाम बाबाओं के खेल दर्शक पहले ही न्यूज चैनल पर होने वाले खुलासों में देख चुके हैं। नाम भले न्यूज चैनल हो लेकिन उनके क्राइम शोज अच्छे अच्छे नॉन फिक्शन शोज को मात देते हैं।

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आश्रम - फोटो : ट्विटर
प्रकाश झा के सामने असली चुनौती दर्शकों को इन शोज को याद न आने देने की है। सीरीज में नौ एपीसोड हैं, हर एपीसोड एक घंटे का है। सारे एपीसोड बिंज वॉच करना अपने आप में दूसरी बड़ी चुनौती है। शुरुआत में वर्तमान दिखाकर जब कहानी फ्लैशबैक में जाती है तो एक एक चीज को समझाने की कोशिश इसके लेखक हबीब फैसल और कुलदीप रुहिल करते हैं। दोनों कथा कथन का वह असली सूत्र भूल जाते हैं कि अगर कोई बात बतानी पड़े तो फिर पटकथा की चुस्ती जाती रहती है। कुछ बातें तो वह बार-बार दोहराते हैं। सब कुछ दर्शकों को बोलकर बताया जा रहा है। किरदारों के संवाद संजय मासूम ने लिखे हैं और काफी चुटीले और असरकारक लिखे हैं।
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आश्रम - फोटो : ट्विटर
‘आश्रम’ में जातिगत भेदभाव, जातिगत राजनीति, शक्तियों का खेल और उत्पीड़न सब वैसा ही है, देश के ज्यादातर राज्यों वाला। खुद को गरीबों का मसीहा मानने वाले और उसे खूब प्रचारित करने वालों का उद्देश्य क्या है, अब तक न समझ आया हो तो ये सीरीज देखकर फिर से समझा जा सकता है। बस पम्मी और उसके भाई का हृदय परिवर्तन किस वजह से हुआ ये बताने में सीरीज चूक जाती है। सीरीज की कहानी जैसे जैसे खुलती है, इसके किरदार फैलने लगते हैं।
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आश्रम - फोटो : Mx Player
कंकाल मिलने की तफ्तीश कर रहे आईओ उजागर के रोल में दर्शन कुमार का अभिनय देखकर लगता है कि वह किरदार में जाने की कोशिश तो कर रहे हैं, लेकिन एक असली पुलिस अफसर के चेहरे पर रहने वाली उत्तेजना उनके किरदार में नजर नहीं आती। राजीव कोचर को भी पुलिस की कार्यप्रणाली की वर्कशॉप देनी जरूरी दिखती है। पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर का किरदार कर रहीं अनुप्रिया गोयनका को ये भी नहीं पता कि सिर पर हरी कैप और नाक मुंह पर हरा मास्क लगा लेने से ही कोई डॉक्टर नहीं दिखने लगता, उसे शर्ट की सारी बटनें भी बंद रखनी होती हैं। राजीव सिद्धार्थ जरूर किश्तों में प्रभावित करते रहते हैं। छोटे छोटे किरदारों में जिन लोगों ने असर छोड़ा वह हैं सचिन श्रॉफ और त्रिधा चौधरी।
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आश्रम - फोटो : Mx Player
‘आश्रम’ हड़बड़ी में बनी एक वेब सीरीज है जिसका संपादन करके इसका हर एपीसोड कम से कम 15 मिनट कम किया जा सकता है। इससे कहानी भी चुस्त होगी और दर्शकों का समय भी बचेगा। शुक्रवार को ही रिलीज हो रही ‘सड़क 2’ में भी एक बाबा की कहानी है। हिंदी सिनेमा को वैसे भी बाबाओं से बड़ा प्यार रहा है। बस, हर बाबा दूसरे के कान काटने के चक्कर में अपना बाबत्व भूल जाता है। मनोज कुमार की फिल्म ‘संन्यासी’ से लेकर नेटफ्लिक्स की सीरीज ‘वाइल्ड वाइल्ड कंट्री’ तक भक्ति के इन पाखंडी घाटों पर दर्शक तमाम बार भ्रमित हो चुके हैं लेकिन अब जमाना मोबाइल का है और कमजोर कंटेंट से ध्यान हटते यहां ज्यादा वक्त नहीं लगता। अगर इरादा इसके सीजन 2 का है तो एमएक्स प्लेयर की क्रिएटिव टीम को लंगोट थोड़ा कसना होगा और खुद अखाड़े में उतरना होगा। अमर उजाला के रिव्यू में 'आश्रम' को मिलते हैं 2 स्टार।

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