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Aarya Review Hotstar: लारा जैसी परफेक्ट वापसी नहीं कर पाईं सुष्मिता सेन, अगले सीजन का रहेगा इंतजार

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आर्या रिव्यू - फोटो : रोहित झा, अमर उजाला
Web Series Review : आर्या (Aarya)
कलाकार: सुष्मिता सेन, विकास कुमार, सिकंदर खेर, अंकुर भाटिया, नमित दास, मनीष चौधरी, जयंत कृपलानी और चंद्रचूड़ सिंह आदि।
लेखक: संदीप श्रीवास्तव, अनु सिंह चौधरी
निर्देशक: राम माधवानी, संदीप मोदी, विनोद रावत
ओटीटी: डिजनी प्लस हॉटस्टार
रेटिंग: **1/2


कोरोना काल में मनोरंजन की अति हो गई है। सब ओटीटी वालों को लगता है पब्लिक खाली बैठी है। वो ऊपर से बाल्टी में भर भरकर वेब सीरीज, डिजिटल फिल्में, लाइव टेलीकास्ट, पॉडकास्ट सब डालते जाएंगे, और पब्लिक नहाती रहेगी। भैया, ऐसा नहीं है। मुंबई में अंधेरी से बाहर निकलो और देखो कि जनता कहां बिजी है। ठीक है, टाइम मिलता है तो वह मुफ्त का एमएक्स प्लेयर या फिर जी5 का लालबाजार देख लेती है, लेकिन सुष्मिता सेन का कमबैक देखने पब्लिक क्यों आएगी, यही सबसे बड़ा सवाल है?

इस फ्राइडे की बड़ी खबर यही रही कि मिस यूनिवर्स सुष्मिता सेन परदे पर लौट आईं। उनके पहले लारा दत्ता भी रिंकू राजगुरु के साथ सेंचुरी मार चुकी हैं। इस बार क्रीज पर सुष्मिता सेन हैं। सिर्फ तुम में दिलबर दिलबर गाने पर या फिर बीवी नंबर वन में इश्क सोना है में सलमान के साथ अपने हुस्न के जौहर दिखा चुकीं सुष्मिता सेन का डिजिटल डेब्यू कराने वाली सीरीज आर्या एक टाइमपास सीरीज है, जिसमें न तो नीरज पांडे की स्पेशल ऑप्स जैसी फिनिश है और न ही लारा दत्ता की हंड्रेड जैसी मस्ती।
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आर्या - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
भारतीय वेब सीरीज में सबसे दिलचस्प होता है ये देखना कि सीरीज में क्रिएटेड बाई में नाम किसका जाता है, सीरीज का रिव्यू लिखने में इससे ये आसानी होती है कि पूरे सेटअप का असली अंकगणित और रेखागणित दोनों समझ में आता है। विदेश में लेखक ही एक वेब सीरीज का क्रिएटर होता है। यहां एक बनी बनाई विदेशी सीरीज का क्रिएटर भी एक डायरेक्टर हो सकता है। सीरीज के राइटर्स संदीप श्रीवास्तव और अनु सिंह चौधरी ने पहले से तैयार मसाले में हिंदुस्तानी करी पत्ता और लौंग, इलायची वगैरह मारकर आर्या सीरीज लिख डाली है। जिस विदेशी सीरीज पेनोजा पर आर्या बनी है उसके 2010 से लेकर 2017 तक अब तक पांच सीजन रिलीज हो चुके हैं। अंग्रेजी में ये ब्लैक विडो के नाम से रिलीज हुई। मार्वेल की ब्लैक विडो कोरोना के चलते रिलीज ही नहीं हो पा रही है और हमारी अपनी ब्लैक विडो आर्या सरीन आपके सामने है।
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आर्या - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
कहानी दवाई के धंधे में इस्तेमाल होने वाली अफीम की है। सेंटर में एक बेहद खूबसूरत लेकिन उम्रदराज घरेलू महिला है जिसे अपने परिवार पर आए संकट के बाद धंधा खुद संभालना होता है। वह बोलती भी है कि धंधे में आदमी बचे नहीं। महिला सशक्तीकरण को भुनाने के लिए इससे कमजोर संवाद शायद ही आपने हाल फिलहाल किसी सीरीज में सुना हो। आर्या के पति की मौत से कहानी का पाला खींचा जाता है और फिर एक एक करके तय होता जाता है कि कौन सा किरदार पाले के किस तरफ है। नीरजा जैसी फिल्म बना चुके राम माधवानी को शोहरत चुइंग गम के उस विज्ञापन से मिली जिसमें राजा साहब के डिनर टेबल पर पहुंचने से पहले एक कामगीर दौड़ लगा रहा है और किसी तरह जाकर झूमर में लटकने में सफल रहता है। इसकी बत्तीसी की रोशनी में राजा को भोजन जो करना होता है। लेकिन, अब हर बंदा बत्तीसी से आगे बढ़ चुका है।

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आर्या - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
विज्ञापन की दुनिया से आए किस्सेबाजों के साथ दिक्कत ये होती है कि उनका हर रिफरेंस गूगल होता है। अपना उनके पास कम ही कुछ होता है। कहानी उधार की है। सितारे नकद के हैं। हिसाब का शुभ लाभ बनाना है बस। तो कॉरपोरेट के प्रॉफिट लॉस अकाउंट की तरह यहां भी ढेर सितारे हैं। किसी का नाम आपको याद रहता है, कोई चेहरा जाना पहचाना लगता है। कभी लगता है कि गॉडफादर और ब्रेकिंग बैड की कहानी भी पेनोजा में बहकर मिल गई है। कभी लगता है कि बैकग्राउंड में चलने वाले फिल्मी गाने न बजते तो शायद असल ज्यादा मारक होता। लंबे लंबे एपीसोड हैं, बिना मतलब की लंबाई लिए हुए।

सुष्मिता सेन का रहन सहन चूंकि शुरू से थोड़ा नवाबी, थोड़ा अंग्रेजी रहा है तो वह हिंदी के पाठकों को ज्यादा तवज्जो नहीं देती हैं। उनको अंग्रेजी में काढ़े गए कसीदे खूब भाते हैं। बातें भी वह इन कसीदाकारों से ही ज्यादा करती हैं। बोटॉक्स से चेहरे का आभामंडल दमकाने वाली दुनिया की वह वारिस हैं। हर वक्त एकदम टिंच। लगता ही नहीं कि इनका परिवार मुसीबत में हैं। किल बिल जैसे लुक तो वह देती हैं लेकिन अपनी पोशाक पर वह रत्ती भर दाग लगने देने के सख्त खिलाफ हैं। चंद्रचूड़ सिंह यहां बार्टर डील के चलते है या किसी और वजह से वह ही जाने। उनकी एक बहुत ही अच्छी छवि हिंदी सिनेमा के दर्शकों के जेहन में कैद है, उसे वह न बिगाड़ें वही उनके लिए और उनके चाहने वालों के लिए बेहतर हैं।
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आर्या - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
विकास कुमार की अदाकारी यहां झन्नाटेदार है। सिकंदर खेर का किरदार शायद लेखकों के बीच ट्यूनिंग बिगड़ने के चलते लड़खड़ा गया है। ये कमजोरी शो रनर की भी है। नमित दास, जयंत कृपलानी अपना असर छोड़ जाते हैं। सोहैला कपूर, मनीष चौधरी और एलेक्स ओ नील भी प्रभावित करने में कामयाब रहते हैं। दिक्कत सीरीज की एडिटिंग में है। कहानी लंबी खिंचते ही सपाट होने लगती है, गनीमत है कि अगले एपीसोड जाने की वजह हर एपीसोड खत्म होते होते जरूर छोड़ जाता है और यही इस सीरीज की असल जीत है।

जिस आलीशान माहौल में ये सीरीज सीट हुई है, उसे थोड़ा बेहतर तरीके से परदे पर दिखाया जा सकता था, इस मामले में ये सीरीज स्पेशल ऑप्स की सिनेमैटोग्राफी से कमतर है। सीरीज की अदाकारी जैसी ही इसकी तकनीकी टीम भी फिटमफाट होती तो सुष्मिता की मेहनत लारा दत्ता के बराबर नंबर पा सकती थी, लेकिन वेब सीरीज आर्या को मैं देता हूं ढाई स्टार। शायद सीजन 2 में ये दिक्कतें कम हों और रिव्यू के स्टार बढ़ाने का भी मन करे।

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