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Wonder Woman 1984 Review: सुपरहीरो की ये फिल्म देखने के लिए खुद ‘सुपरहीरो’ बनना कतई जरूरी नहीं

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वंडर वूमन 1984 - फोटो : अमर उजाला
Movie Review: वंडर वूमन 1984
कलाकार: गैल गैडोट, क्रिस पाइन, क्रिस्टेन वीग, पेड्रो पास्कल, रॉबिन राइट और कोनी नीलसन
लेखक: पैटी जेन्किंस, जिओयफ जॉन्स और डेविड कैलाहम
निर्देशक: पैटी जेन्किंस
रेटिंग: **


जैसा समय चल रहा है और जैसी खबरें कोरोना को लेकर रोज आती रहती हैं, वैसे में थिएटर जाकर सिनेमा देखना जान हथेली पर रखकर जाने से कम नहीं है। लेकिन, खुशी होती है देखकर कि सिनेमा का जुनून लोगों में इस डर के बाद भी सिर चढ़कर बोल रहा है। लोग मास्क, दस्ताने और सैनिटाइजर्स के साथ फिल्म देखने पहुंच रहे हैं। हां, फिल्में जो थिएटर तक पहुंचनी शुरू हुई है, उनके लिए जान हथेली पर रखने जैसा काम करना जरूरी है क्या? कम से कम वार्नर ब्रदर्स की फिल्म ‘वंडर वूमन 1984’ के लिए नहीं लगता। फिल्म अंग्रेजी के अलावा हिंदी व अन्य भारतीय भाषाओं में रिलीज हुई है। मेरा इस फिल्म को थिएटर में देखने का शुरू से मन रहा है लेकिन काश, ये फिल्म पहली ‘वंडर वूमन’ जैसी ही होती!
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वंडर वूमन 1984 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
मार्वेल सिनेमैटिक यूनीवर्स जैसा ही वार्नर ब्रदर्स के सुपरहीरोज का भी अपना यूनीवर्स है। इस यूनीवर्स में वंडर वूमन पहली बार फिल्म 'बैटमैन वर्सेज सुपरमैन: डॉन ऑफ जस्टिस‘ में दिखी फिर उनकी सोलो फिल्म आई और इसके बाद 'जस्टिस लीग‘ में भी ये किरदार दिखता है। तब से तीन साल हो गए इस किरदार के प्रशंसकों को इंतजार करते हुए। ध्यान यहां ये रखना चाहिए कि ये किसी किरदार का रीबूट नहीं है। ये विश्वयुद्ध के बाद एक किरदार का सीधे 70 साल बाद की दुनिया से सामना है। 1984 की यादें ज्यादा पुरानी नहीं हैं, लेकिन फिल्म ‘वंडर वूमन 1984’ के लेखकों ने इस सामान्य बातों का भी ध्यान नहीं रखा।
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वंडर वूमन 1984 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म की रिलीज से पहले इसके निर्माताओं ने सोशल मीडिया पर इसका ओपनिंग सीक्वेंस रिलीज कर दिया। छोटी सी डायना एक बड़े से स्टेडियम में अपने कौशल के इम्तिहान के लिए तैयार होती दिखती है तो मन प्रसन्न होता है। उसकी चेष्टाओं, उसकी वेदनाओं से जुड़ने को जी चाहता है। लेकिन, बड़े परदे पर ये फिल्म ऐसा कुछ नहीं दिखाती कि पास की खाली सीट ही दर्शक भूल पाए। भूल पाए कि वह एक वैश्विक संकट के बीच अपनी मेहनत की कमाई खुद को ही खतरे में डालकर खर्च करने आया है। गैल गैडोट ने इजरायली फौज में काम किया है। मिस इजरायल भी वह रह चुकी हैं। लेकिन, ये सब अतीत की बातें हैं। अब वह 35 की हो चुकी हैं। उनका करिश्मा बचाए रखना उनकी खुद की और स्टूडियो दोनों की जिम्मेदारी है।

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वंडर वूमन 1984 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
फिल्म ‘वंडर वूमन 1984’ का सबसे बड़ा माइनस प्वाइंट है इसमें एक सुपरहीरो के उद्देश्य का सुपरहीरो जैसा न होना। जो कुछ वंडर वूमन को यहां क्लाइमेक्स में करना है, वो न जाने कितनी फिल्मों में और ना जाने कितने सुपरहीरो कर चुके हैं। कहां तो दुनिया को एक विनाशकारी गैस से बचाने वाली सुपरहीरो और कहां पत्थरों से ताकत पाने वाले बीसवीं सदी के एक खलनायक का विनाश। सुपरहीरो पर फिल्म बनाने की ये तो वजह नहीं होती! यहां दिक्कत इस किरदार की लोकप्रियता में समझ आती है। पहली सोलो फिल्म सुपरहिट हुई तो स्टूडियो पर सीक्वेल बनाने का दबाव आया। पर अच्छी कहानियां मुक्त मन से लिखी जाती हैं, दबाव में नहीं। फिल्म ‘वंडर वूमन 1984’ में बच्चों को चकाचौंध करने वाला सारा मसाला है लेकिन किशोरों और युवाओं को बांधकर रखने का करिश्मा फिल्म में नहीं है।
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वंडर वूमन 1984 - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
पिछली फिल्म में विमान हादसे में मारे गए वंडर वूमन के प्रेमी को कहानी में वापस लाना बढ़िया पैतरा है। लेकिन, इसका वैश्विक उद्देश्य क्या होगा? एक मानव विज्ञानी की आल्टर इमेज के साथ फिल्म की कहानी में उतरी वंडर वूमन के सामने के खलनायकों के किरदारों को गढ़ने में भी सावधानी नहीं बरती गई है। वहां थानोस पत्थरों में फंसा रहा, यहां मैक्स लॉर्ड वहीं अटका है। एमसीयू की कैप्टन मार्वेल के मुकाबले बॉक्स ऑफिस पर लाई गई वंडर वूमन की ये सीक्वेल अपनी पहली फिल्म के मुकाबले काफी कमजोर है। याद है पहली फिल्म का वो सीन, जब खंतियों से निकलकर वंडर वूमन नो मैन्स लैंड में आती है। उसके चेहरे पर दिखने वाला वो आभामंडल ही वंडरवूमन के किरदार का असली मंतव्य है, ऐसा कोई क्षण फिल्म ‘वंडर वूमन 1984’ में आखिर तक नहीं आता।

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