फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

J D Majethia Interview: बच्चे कितने भी बड़े हो जाएं, मां-बाप के लिए बच्चे हैं, जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं होती

सार

कम लोगों को ही पता होगा कि निर्माता, निर्देशक, लेखक, अभिनेता जमना दास मजीठिया उर्फ जेडी मजीठिया का टेलीविजन जगत में सिक्का चलता है। बीते दो दशक में वह तीन दर्जन से ज्यादा धारावाहिक बना चुके हैं।
विज्ञापन
1 of 9
जे डी मजीठिया - फोटो : अमर उजाला
जे डी मजीठिया ने मुंबई की कॉलेज लाइफ में खूब घमासान किए हैं। नरसी मोनजी कॉलेज छात्र संघ के महासचिव रहे। नाटकों में कॉलेज के समय से ही बतौर लेखक, अभिनेता और निर्देशक सक्रिय रहे। वहीं, उन्हें अपने पक्के साथी आतिश कपाड़िया मिले। और, कम लोगों को ही पता होगा कि निर्माता, निर्देशक, लेखक, अभिनेता जमना दास मजीठिया उर्फ जेडी मजीठिया का टेलीविजन जगत में सिक्का चलता है। बीते दो दशक में वह तीन दर्जन से ज्यादा धारावाहिक बना चुके हैं। जेडी से उनके दफ्तर में ये खास बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
विज्ञापन

2 of 9
वागले की दुनिया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
बहुत दिन बाद आप लेखन की दुनिया में लौटे और ऐसा लौटे कि आपके धारावाहिक ‘वागले की दुनिया’ ने हजार एपिसोड का नया रिकॉर्ड बना दिया?
इस धारावाहिक की कहानी बहुत दिलचस्प है। हम सोनी चैनल गए थे उनको कुछ कहानियां सुनाने। बहुत शानदार कहानियां थी और बहुत जानदार कॉन्सेप्ट। मैं घर लौटा तो रात में चैनल के हेड नीरज व्यास का फोन आया कि ‘वागले की दुनिया’ के बारे में क्या ख्याल है? मैं तो उछल गया। लेकिन, मन की उमंगें काबू में कर मैंने उनसे दो दिन का समय मांगा।
विज्ञापन

3 of 9
जे डी मजीठिया अपने दोस्तों के साथ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिर..?
फिर मैंने अपने साथी आतिश कपाड़िया को फोन किया। दो तीन विचार उनके पास थे, एक दो विचार मैंने जुटाए। हमने इस पर काम किया और इस धारावाहिक को आगे बनाने के अधिकार हासिल किए। सुमित राघवन से भी इस बीच बात की और सब कुछ जमाकर हम चैनल पहुंचे। हमारा काम उन्हें बहुत पसंद आया और इस तरह से ये धारावाहिक 8 फरवरी 2021 से शुरू हो गया।

4 of 9
खिचड़ी 2 और जे डी मजीठिया- फातिमा सना शेख - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
टेलीविजन में लेखक का काम ऐसे समय में कितना महत्वपूर्ण रह गया है जब हर हफ्ते टीआरपी को देखकर चैनल ही कहानी बदल देते हों?
टेलीविजन लेखक का माध्यम था और लेखक का ही माध्यम रहेगा। लेकिन, इसके लिए समय मिलना बहुत जरूरी है। धारावाहिक की मांग के अनुसार योजना बनाना जरूरी है। निर्माता और चैनल की क्रिएटिव टीम के बीच तालमेल बहुत जरूरी है। हमारे पास आज की तारीख में 25 एपिसोड का बैकअप है और पटकथा अगले तीन महीने की तैयार है, चैनल से मंजूरी के साथ।
विज्ञापन

5 of 9
जे डी मजीठिया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
लेकिन, लेखक भी तो अब होशियार हो चुके हैं, कितनी ईमानदारी आपको दिखती है इन दिनों नए धारावाहिकों के लेखन में?
मेरा ये मानना है कि लेखन में अगर दम होगा तो धारावाहिक अपना रास्ता ढूंढ ही लेगा, इसका उसके बजट से कोई लेना नहीं होता। लेकिन, दिक्कत ये है कि सब कुछ टीआरपी पर आधारित होने लगा है। लेखक सोचता है कि मेरा पास जो अच्छा विचार है उसे मैं धारावाहिक की अच्छी टीआरपी आने पर खर्च करूंगा, उसके पहले वह रेफरेंस से लेकर विचार डालता रहता है। ये सोच टेलीविजन के लिए घातक है।
विज्ञापन

6 of 9
जे डी मजीठिया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
हजार एपिसोड से ऊपर की हो चुकी ‘वागले की दुनिया’ नई सोच के नए जमाने से तालमेल बिठाने में कितनी कामयाब रही और कैसे?
मध्यमवर्गीय परिवार में अभिभावकों की जिम्मेदारी कभी खत्म नहीं होती, ये बात समझनी बहुत जरूरी है। बच्चे बड़े हो जाते हैं तो उनकी जिम्मेदारी खत्म नहीं होती बल्कि और बढ़ जाती है। मध्यमवर्गीय परिवार के अभिभावक सोचते हैं कि अपने बच्चों को जो वह पढाई के वक्त नहीं दे पाए क्या अब करियर में उनकी मदद करके दे सकते हैं? इसके लिए वें जोखिम भी लेते हैं। और, घर के बच्चे भी होशियार हो चले हैं। वे अभिभावकों को बताते हैं, अब खरगोश सोता नहीं है। अब खरगोश भागता है।
विज्ञापन

7 of 9
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और जे डी मजीठिया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
किसी भी धारावाहिक के लिए उसका दर्शन कितना मायने रखता है?
पंकज जी, आप तो मुझे इतने साल से देख रहे हैं, मेरे हर धारावाहिक की एक फिलॉसफी, एक दर्शन हर बार रहा है। वही तो एक चीज है जो हम समाज को दे सकते हैं। जैसे ‘वागले की दुनिया’ का दर्शन है ‘होप’ यानी उम्मीद। उम्मीद इस बात की कि मेहनत करने से, सकारात्मक रहने से जिंदगी बेहतर होती जाएगी।

8 of 9
जे डी मजीठिया अपनी बेटियों के साथ - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
सुना है कभी ‘वागले की दुनिया’ देखने आपके पिता पड़ोस के घर में जाते थे। और, अब आप खुद इस शो के निर्माता...
(सवाल पूरा होने से पहले ही जेडी की आंखों में आंसू आ जाते हैं..) ये सवाल पूछकर आपने मेरे दिल के तार हिला दिए। पिताजी को एक ही शौक था, टेलीविजन देखने का। मैंने ट्यूशन पढ़ाकर जो पैसे जुटाए थे, उनसे पहला टेलीविजन खरीदा था उनके लिए, वह ब्लैक एंड व्हाइट था। उस पर वह मैच वगैरह देख लिया करते थे। लेकिन, दूरदर्शन वाली ‘वागले की दुनिया’ की शोहरत ऐसी हुई कि वह उसे रंगीन टीवी पर देखने पड़ोस के घर जाने लगे थे। अब इसे आगे बढ़ाने का ईश्वर ने मुझे मौका दिया। मैं नतमस्तक हूं। पिताजी की आपने याद दिलाई तो आंखें भर आईं।
विज्ञापन

9 of 9
वागले की दुनिया - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, आतिश कपाड़िया से आपकी दोस्ती कैसे हुई?
मैं नरसी मोनजी कॉलेज का महासचिव रह चुका हूं। खूब नाटक लिखता था, निर्देशित करता था, अभिनय भी करता था। वहीं लाइब्रेरी में बैठे बैठे एक दिन कुछ लिख रहा था तो आतिश आए और बोले कि इसे मैं थोड़ा बेहतर करने की कोशिश करूं? और, क्या कमाल लिखा उन्होंने उस दिन। बस, उसी दिन से हमारी जोड़ी बन गई जो आज तक कायम है। वो राइटर बन गया और मैं एक्टर-प्रोड्यूसर। अभी ‘वागले की दुनिया’ के शुरू के 50 एपीसोड भी आतिश ने ही लिखे। फिर वह किसी और काम में मसरूफ हुए तो मैंने अरसे बाद लिखने का जिम्मा संभाला। कहां तो मैंने आतिश को लेखन का मौका दिया था, और कहां अब आतिश ने फिर से मुझे लेखन की तरफ उकसाया और यकीन नहीं होता कि मैं 950 से ऊपर एपिसोड के लेखन का हिस्सा बन चुका हूं।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें