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Anubhav Sinha Exclusive: मेरी अधिकतर फिल्मों की कहानियां अखबारों से आई हैं, हमें घूमफिरकर किताबों पर ही आना है

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अनुभव सिन्हा इंटरव्यू - फोटो : अमर उजाला
कोई फिल्म निर्देशक बिल्कुल विपरीत ध्रुवी फिल्मों का निर्माण करे तो उसके सिनेमा को एकाएक तीन पीढ़ियों की नुमाइंदगी हासिल होती है। जैसे, यश चोपड़ा ने ‘दीवार’ बनाई। ‘दिल तो पागल है’ बनाई और बनाई ‘वीर जारा’। ये फिल्म मेकिंग के दो यश चोपड़ा है। वैसे ही हिंदी सिनेमा के दो अनुभव सिन्हा भी हैं। एक ‘तुम बिन’, ‘रा-वन’ और सोनू निगम के म्यूजिक वीडियो निर्देशित करने वाले। दूसरे अनुभव हैं, ‘मुल्क’, ‘आर्टिकल 15’ और ‘थप्पड़’ निर्देशित करने वाले। इन्हीं गर्मियों में अपनी अगली फिल्म शुरू करने जा रहे निर्माता-निर्देशक अनुभव सिन्हा ये एक्सक्लूसिव बातचीत की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपका परिचय निर्माता-निर्देशक के रूप में दिया जाए तो आपको शिकायत होती है कि लेखक के रूप में आपका परिचय क्यों नहीं दिया जाता। आप बताएंगे कि लिखना आपने कब से शुरू किया? 
मेरे लेखक बनने का पूरा श्रेय अभिनेता और लेखक सौरभ शुक्ला को जाता है। मेरी पहली टीवी सीरीज ‘शिकस्त’ मैं और सौरभ मिलकर लिख रहे थे। तभी बीच में तिग्मांशु धूलिया ने उन्हें अपनी सीरीज में एक किरदार दे दिया। अहम किरदार था तो सौरभ उसे करने चले गए। मैंने उससे पहले किसी अखबार या पत्रिका तक के लिए कहानी नहीं लिखी थी। एक दो बड़े लेखकों का सहायक जरूर रहा लेकिन ये समस्या सामने आई तो मैंने सोचा कि हम तो बड़े ही ऐसे हुए हैं कि घरवालों ने तैरना सिखाने की बजाय सीधे तालाब में उठाकर फेंक दिया कि जाओ, सीखो। बस वैसा ही कुछ मन में इरादा लिए लिखना शुरू कर दिया। तब से लगातार लिख रहा हूं। 1993 से गिनें तो 32 साल तो हो ही गए।
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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, ‘रा वन’ के बाद के अनुभव सिन्हा को खोजने वाली फिल्म ‘मुल्क’ भी आपने ही लिखी? इसका विचार कहां से आया?
ये फिल्म मैंने कुछ खास सोचकर या किसी खास लम्हे से प्रेरित होकर लिखी हो, ऐसा मैं अब तक पता लगा नहीं पाया हूं। बहुत बार इस पूरे घटनाक्रम को मैंने रिवाइंड करके प्ले भी किया। लेकिन, हां ये पता है कि ‘रा वन’ के बाद जो तिरस्कार, जो अपमान मेरा हुआ, उसे सहन करना आसान नहीं था। मैं इस शहर में अकेला ही हूं, अब जाकर एक दो दोस्त बने हैं, जिनको फोन करके बात कर सकता हूं लेकिन तब वैसा भी नहीं था। मैं सोचता रहता था कि मेरा ये तिरस्कार सही नहीं है, मैं इससे बेहतर कर सकता हूं। और, उसी बीच में दिमाग में ये कहानी आई और इस कहानी ने ही मुझसे ये फिल्म बनवा दी।

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
कोई किताब पढ़ी आपने या कोई घटना आई आपके सामने?
एक घटना थी, शायद किसी अखबार में पढ़ी थी मैंने कि एक बाप ने अपने बेटे के शव को लेने से मना कर दिया। वहीं से इसका ट्रिगर पॉइंट मान सकते हैं। पिछले एक दशक की मेरी फिल्में देखेंगे तो मेरी ज्यादातर फिल्मों की कहानियां अखबारों से ही आई हैं। और, ‘मुल्क’ जब रिलीज हुई तो लोग इसके लेखक-निर्देशक की बात करने लगे जोकि मैं था। वहां मैंने अपने को पाया और मुझे लगा कि मेरा सिनेमा मेरे भीतर से आने वाली आवाज में है। उसके बाद जो भी फिल्में मैं सोचता या लिखता हूं, वह वही हैं जो मेरे अंदर से आती हैं, उसमें बाजार का कोई भी कारण नहीं होता।
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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अनुभव सिन्हा के सिनेमा को लोग अलग से वैसे ही पहचानते हैं, जैसे भंसाली के सिनेमा को। आप मुतमइन हैं अपनी इस पहचान से?
ये मैं मानता हूं कि सिनेमा से बनने वाली पहचान निर्देशक की सबसे बड़ी पहचान होती है। लेकिन, यही पहचान मेरी आखिरी पहचान है, इसे लेकर मैं अभी मुतमइन नहीं हूं। मुझे पता नहीं है। मैं रोज अपने को बदलता देख रहा हूं। बढ़ता देख रहा हूं। बहुत सारा सिनेमा इन दिनों मैं देख रहा हूं। तमाम किताबें पढ़ रहा हूं और इस सबसे चलते हुआ ये है कि मैं रोज बदल रहा हूं। मैं 1890 में जो कुछ शूट हुआ, वहां से लेकर हाल ही में ऑस्कर तक जो पहुंचा है, वह सब देख रहा हूं। मुझे ज्यादा से ज्यादा जानने की उत्सुकता रहती है।
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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मसलन, अमेरिका से भेजे जा रहे भारतीयों को हथकड़ी क्यों लगी है, ये भी!
इस पर तो अलग से एक लंबी बातचीत हो सकती है। लेकिन, एक नई बीमारी लगी है मुझे और वह ये कि मुझे हर बात की जड़ में जाना होता है। ऐसा क्यों हुआ? क्यों गए ये लोग इस तरीके से वहां? चोरी छुपे गए ही क्यों? तो मेरे सोचने की प्रक्रिया वहां से शुरू होती है। मैं इस घटना को सिर्फ इतने में नहीं देखता कि अमृतसर में एक जहाज उतरा जिसमें सौ, डेढ़ सौ, दो सौ लोग थे।
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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जब ‘रा वन’ को लेकर आपके नाम की घोषणा शाहरुख ने की थी, आप साउथ अफ्रीका में ‘कैश’ शूट कर रहे थे। इंटरनेट का शुरुआती दौर था, और ये सूचना मैंने आपको याहू मैसेंजर पर दी थी? और, तब से सूचना का ये विस्फोट! क्या असर हुआ है सिनेमा पर इस इफरात जानकारी का?
हां, मुझे याद है। सिनेमा का तो मुझे पता नहीं कि इस सूचना विस्फोट को इसे कितना फायदा हुआ होगा लेकिन चूंकि मैं विदेश में आजकल बहुत रहता हूं तो वहां के फिल्मकारों के बारे में इतना बता सकता हूं कि वे लोग मोबाइल से दूर हो रहे हैं। उनका संवाद सीमित हो चला है। ये मेरे साथ भी हो गया है। 30 सेकंड की रील देखकर अगर आप इतिहास, सेहत या किसी भी विषय की जानकारी हासिल करना चाह रहे तो ये इतना सहज और सरल है नहीं। चुनना हमें है कि आपको जानना क्या है? मेरा मानना है कि घूम फिर कर बात किताबों पर ही वापस आनी है।

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
अगर मैं सोनू निगम के म्यूजिक वीडियोज से गिनती शुरू करूं और ‘आईसी 814’ तक आपके विजुअल इफेक्ट्स में प्रयोग की प्रगति देखूं तो ऐसा काम हिंदी सिनेमा में कम ही हुआ है...
मेरा मानना है कि अपने काम के लिए इस तरह से बात नहीं करनी चाहिए। लेकिन, बात ये सच है। ‘रा वन’ से मैंने सीखा बहुत है। ऐसा नहीं कि इसके पहले विजुअल इफेक्ट्स नहीं हुए लेकिन वैसे नहीं हुए। मुझे कभी इस बात में शर्म नहीं महसूस हुई कि कोई काम अगर मुझे नहीं पता है तो मैं उसके विशेषज्ञों से उस काम में मदद लूं। मैंने म्यूजिक वीडियोज में जो शुरुआत की थी, वह मेरी रुचि थी। विजुअल इफेक्ट्स के बारे में पढ़ा भी था मैंने, पर ‘रा वन’ के लिए मैंने तमाम विदेशी तकनीशियनों की मदद ली। मेरा मानना है कि नेतृत्व का विकास अपने से बेहतर लोगों को साथ जोड़ने में ही है।

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
भारतीय सिनेमा विजुअल इफेक्ट्स में अभी कहां तक पहुंचा है?
मेरा मानना है कि हिंदुस्तान का विजुअल इफेक्ट्स का सफर अभी शुरू भी नहीं हुआ है। अभी हम लोग सिर्फ सतह को खुरच रहे हैं। मैं इसी दशक की बात कर रहा हूं। साल 2025 से 2035 के बीच में भारत में विजुअल इफेक्ट्स की फिल्मों का एक नया आयाम खड़ा होगा और सब देखेंगे कि ये फिल्में जो बिजनेस करेगी, वहां तक कोई सोच भी नहीं सकता।

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IC814 - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
जैसा कि आपने अपनी वेब सीरीज ‘आईसी 814’ में किया। इसी के चलते नेटफ्लिक्स की  उन गिनती की सीरीज में शुमार हुई जिनकी चर्चा दुनिया भर में है..
मैंने कभी नहीं सोचा था कि मैं इस विषय पर कोई सीरीज बनाऊंग। ये घटना भी तब की है जब मैं मुंबई में अपने शुरुआती कदम जमा रहा था। ‘आईसी 814’ से पहले भी नेटफ्लिक्स की इंडिया हेड मोनिका शेरगिल मुझे एक प्रस्ताव दे चुकी थीं, लेकिन तब उन्हें मैंने फोन पर ही मना कर दिया था। इस बार का प्रस्ताव जहाज के भीतर की घटना पर सीरीज बनाने का था, लेकिन मैंने इसमें जहाज के बाहर हो रही गतिविधियों को भी जोड़ा।

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, सिनेमा में विजुअल इफेक्ट्स का आपका अनुभव इस सीरीज में खुलकर सामने आया?
हां, इसमें दो राय ही नहीं है। मैंने ‘रा वन’ में इतने ज्यादा विजुअल इफेक्ट्स किए थे कि ‘आईसी 814’ में ये नजर ही नहीं आते या आपको लगता ही नहीं कि इसमें विजुअल इफेक्ट्स हैं भी। शाहरुख खान ने भी यही बात कही और उनकी दूसरी बात ये ज्यादा बड़ी थी कि देश के सबसे बड़े विजुअल इफेक्ट्स स्टूडियो रेड चिलीज में काम न करके भी हमने ‘आईसी 814’ में इसे हासिल किया। 

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आपने बताया कि आप तीन बड़ी और भव्य फिल्मों की कहानियों पर काम कर रहे हैं। आपकी फिल्मों का संगीत भी आपकी पहचान रहा है। कोई म्यूजिकल तो नहीं बना रहे?
नहीं, म्यूजिकल जैसा तो कुछ नहीं लेकिन हां मैं संगीत बनाना चाहता हूं। मैं संगीत बीते कुछ साल से सीख भी रहा हूं। बीते सात-आठ साल में बनी मेरी फिल्मों से संगीत गायब हो गया है और इसे लेकर मैं खुद से ही बहुत नाराज हूं क्योंकि यहीं तो मेरी पहचान हुआ करती थी। अब मैं अपनी फिल्मों में संगीत की जगह पटकथा गढ़ने के दौरान ही बनाने की कोशिश कर रहा हूं। 

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
और, जीवन में कितना संगीत लौटा है आपके? मेरा मतलब है कि एक वयस्क बेटे के पिता होने ने आपको कितना बदला है? आप अब भी उतने ही ‘एग्रेसिव’ हैं?
बदला तो बहुत ज्यादा हूं। हालांकि, ‘एग्रेसिव’ होना मेरी शख्सियत का एक हिस्सा अब भी है, लेकिन उसका भी मैं सार्थक प्रयोग करता हूं। मतलब कि अगर मैंने कुछ सोच लिया कि ये करना है तो मैं उसे पूरा करके ही रहता हूं। लेकिन, मेरे व्यक्तिगत संबंधों में मुझे नहीं लगता कि अब मैं ‘एग्रेसिव’ हूं। लोगों को मुझमें कितना बदलाव दिखता है, ये लोग ही बताएंगे।

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
मेरे सवाल का दूसरा हिस्सा आपके बेटे को लेकर था, उसे एक अलग शख्सियत के रूप में आपने कब से स्वीकार करना शुरू किया?
मेरा बेटा श्लोक 23 साल का है। लंबाई में मुझसे से भी ऊंचा होने की तैयारी में हैं। बच्चा बड़ा होता है तो हर बाप चाहता है कि वह उसके जैसा हो। फिर वह एक अलग शख्सियत में विकसित होना शुरू होता है। सात-आठ साल पहले मैंने ये मान लिया था कि ये मुझसे अलग इंसान है। उसकी दुनिया और समाज को लेकर बहुत अलग सोच है और जैसा मैं सोचता हूं जरूरी नहीं कि वह भी वैसा ही सोचे और इस बात का मुझे बहुत गर्व भी है। 

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
आप अपने पिता और अपने बेटे के साथ एक छत के नीचे रहते हैं, जीवन का ये कितना बड़ा सुख है?
इससे बड़ा सुख और क्या ही हो सकता  है! मैं रोज सृष्टि को, प्रकृति को इस बात के लिए धन्यवाद देता हूं कि मेरे पिताजी मेरे साथ हैं। मैं अपने बेटे को भी कहता हूं, मैं इतना स्वस्थ रहने की कोशिश करूंगा कि तुम्हारे साथ लंबे समय तक रह सकूं और जब भी तुम्हें मेरी जरूरत पड़े। 

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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
एक आखिरी सवाल, आपको टेलीविजन सीरीज बनाए 32 साल हो गए। पहली फिल्म ‘तुम बिन’ की रिलीज को भी अगले साल 25 साल हो जाएंगे, इतने साल सिनेमा से जो कुछ आपको मिला है, उसे समाज को किस सूरत में लौटाना चाहते हैं?
मैं पूरी दुनिया में फैले अपने शुभचिंतकों से मिलना चाहता हूं। प्रशंसक इसलिए नहीं कहूंगा क्योंकि फैन शब्द मुझे पसंद नहीं है। मैं अपना काम पसंद करने वालों से मिलना चाहता हूं। फिर चाहे वो मुंबई में हों, मेरठ में हों, मुरादाबाद में हो या फिर मेरे अपने शहर बनारस में हों। मैं अपने शुभचिंतकों के साथ ऐसा वक्त बिताना चाहता हूं जो चाहे कितना भी कम हो लेकिन उनके लिए यादगार बन जाए।
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अनुभव सिन्हा - फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
इसकी कोई प्रेरणा आपको कहीं से मिली?
शाहरुख खान से। मैं उस दिन को कभी नहीं भूल सकता जब ‘रा वन’ पर काम शुरू होने से पहले मैं उनके साथ लॉस एंजिलिस में था। ‘माई नेम इज खान’ की शूटिंग चल रही थी। वहां सैकड़ों बच्चे जुटे हुए थे और ‘शाहरुख शाहरुख’ का शोर मचा रहे थे। पैकअप हुआ तो शाहरुख ने कहा कि आप लोग चलो, मैं थोड़ी देर में आता हूं। शाहरुख को वहां से आने में घंटा भर लगा। मैंने कहा कि कमाल का धैर्य है आपके भीतर, तो उनका जो जवाब था, वह मुझे हमेशा के लिए याद रह गया। उन्होंने कहा कि इनमें से कोई भी बच्चा शायद ही दोबारा मुझसे इस जीवन में मिले तो जितनी देर भी मैं लोगों से मिलता हूं, चाहता हूं कि ऐसा क्या कर दूं कि ये लम्हा उनके लिए यादगार बन जाए।

ये पूरी बातचीत आप नीचे दिए लिंक पर क्लिक करके सुन भी सकते हैं
https://www.amarujala.com/podcast/entertainment/shuklapaksh/anubhav-sinha-interview-with-pankaj-shukla-amar-ujala-2025-02-21
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