हर्षवर्धन राणे की जिंदगी भी कम फिल्मी नही हैं। 10 साल के थे तो मां छोड़ गई। 16 साल के थे तो खुद ही घर से भाग निकले। तरह तरह के काम किए। साउथ सिनेमा से बोहनी की और अब हिंदी सिनेमा में अपनी डेब्यू फिल्म ‘सनम तेरी कसम’ की सीक्वल करने जा रहे हैं। हर्षवर्धन राणे से खास मुलाकात की ‘अमर उजाला’ के सलाहकार संपादक पंकज शुक्ल ने।
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हर्षवर्धन राणे
- फोटो : अमर उजाला ब्यूरो, मुंबई
फिल्म ‘सनम तेरी कसम’ ने दोबारा रिलीज होने पर इस साल कई नई रिलीज फिल्मों से ज्यादा कमाई की, पहली बार ये फिल्म क्यों नहीं चली होगी भला?
पहली बार भी फिल्म अच्छे से रिलीज हुई थी और मुझे इसकी शिकायत भी नहीं। इस बार फिल्म इसकी सीक्वल के एलान से पहले रिलीज हुई। मेरा जीवन में यही मानना रहा है कि मन का हो तो अच्छा है, न हो तो और भी अच्छा क्योंकि फिर उसमें भगवान की मर्जी होती है। और, शाहरुख (खान) सर का तो डॉयलॉग ही है अगर एंडिंग हैपी नहीं हो तो वो पिक्चर अभी बाकी है!
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आपकी दो चर्चित फिल्में ‘तैश’ और ‘हसीन दिलरुबा’ ओटीटी पर रिलीज हुईं, इन्हें बड़े परदे तक न पहुंच पाने का कभी कष्ट नहीं हुआ आपको?
अब वह समय (कोरोना संक्रमण काल) ऐसा था कि लोग मर रहे थे। मैं क्या ही सोचता कि मेरी फिल्म बड़े परदे पर नहीं रिलीज हो रही है। मुझे तो उस समय लोगों का कष्ट ही दिख रहा था। मैंने तो उस समय जो हो सका वह दूसरों के लिए किया। एक बच्ची को ऑक्सीजन की व्यवस्था नहीं हो पा रही थी तो मैंने अपनी बाइक बेच दी।
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बाइक से याद आया कि आप पहली बार जॉन अब्राहम से तब मिले जब डिलीवरी बॉय के तौर पर आप उनका हेलमेट पहुंचाने गए, पहला मौका भी उन्होंने ही दिया था आपको..
हां, हिंदी सिनेमा में मेरा डेब्यू उनकी प्रोडक्शन कंपनी की फिल्म ’17 को शादी है’ से ही होना था। वह फिल्म यूटीवी बना रही थी लेकिन किसी कारणवश वह कंपनी आगे चली नहीं और उस समय उनके पास जो 25-30 फिल्में थीं, उन्होंने वे सब रोक दीं। मुझे तब भी लगा थि कि चलो इसमें भी कुछ अच्छा ही होगा।
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इन दिनों हिंदी सिने बाजार में साउथ सिनेमा का बहुत हल्ला है। साउथ के फिल्मकार भी ऐसे कलाकारों की तलाश में रहते हैं जो उनके सिनेमा का हिंदी दर्शकों से रिश्ता जोड़ सकें। आप तो इसके लिए बिल्कुल फिट हैं..
हां, मैंने हिंदी सिनेमा में आने से पहले साउथ में काफी काम किया। मैं शुक्रगुजार हूं आपका, कि आपने इन तथ्यों पर गौर किया। मैं ईश्वर से प्रार्थना करूंगा कि आपका किया ये जिक्र साउथ सिनेमा के निर्माताओं तक जरूर पहुंचे।
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और, किसी फिल्म को दर्शकों तक पहुंचाने में उसके निर्माता की कितनी बड़ी भूमिका होती है? अभी आपकी एक फिल्म ‘द मिरांडा ब्रदर्स’ ओटीटी पर रिलीज हो गई और किसी को पता भी नहीं चला।
सर, ये मेरे लेवल से ऊपर की बात है। मैं बतौर कर्मचारी किसी फिल्म में काम करता हूं। कोई फिल्म कैसे बनेगी ये निर्देशक तय करता है, मैं उनकी बात मानता हूं। कोई फिल्म कैसे सिनेमाघरों तक पहुंचेगी, ये निर्माता को तय करना होता है। जियो सिनेमा के पास हमारी एक और फिल्म ‘कुन फाया कुन’ भी है। उनके पास ऐसी कुछ 120 फिल्में पड़ी हुई हैं। अब वह लोग अपना स्लेट कब रिलीज करेंगे, ये उनका फैसला है।
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एक अच्छी बात जो आपके बारे में पता चली, वह ये कि आप स्नातक की पढ़ाई पूरी करने को लेकर कृतसंकल्प हैं और प्रथम वर्ष के इम्तिहान में आपने शायद महाराष्ट्र टॉप किया है?
जी हां, मैं इंदिरा गांधी मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) से मनोविज्ञान में स्नातक कर रहा हूं। पहले साल के इम्तिहान में मेरे 81.5 फीसदी नंबर आए जो महाराष्ट्र में सबसे ज्यादा हैं। मेरी दिनचर्या में अपने शरीर और अपने हुनर पर काम करने के अलावा पढ़ाई भी शामिल है। दिन भर मैं इनके नोट्स बनाता रहता हूं।
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आपके पिता से आपका संवाद काफी कम रहा और अब वह हमारे बीच में नहीं हैं। कितनी कमी महसूस होती है उनकी सफलता के इस मुकाम पर?
जब मैं 10 साल का था तो मेरी मां मुझे छोड़ गई। मैंने घर इसलिए छोड़ा क्योंकि मुझे यहां आना था। और, मैं जब किसी बात को समझा नहीं पाता हूं तो चुप हो जाता हूं। ये कमी है मेरी शख्सियत में। मैं डैडी से इसीलिए दूर हुआ। बाद में जब काम करने लगा तो मेरी बातचीत शुरू हो गई थी डैडी (विवेक राणे) के साथ। लेकिन, जब हैदराबाद में जब मैं अपनी पहली फिल्म कर रहा था तो साल 2009 में उनका देहांत हो गया। बहुत कमी खलती है उनकी अब। काश, हम दोनों अब बैठकर ढेर सारी बातें कर पाते।
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और, कभी ये महसूस हुआ कि आपको शुरू में इतने मौके इसलिए कम मिले कि आप किसी फिल्मी परिवार से नहीं हैं?
नहीं सर, ये सब खुद को बहलाने के बहाने हैं। मुझे नहीं लगता कि बिना काबिलियत के कोई भी कलाकार यहां शीर्ष पर पहुंच सकता है। शाहरुख खान, अक्षय कुमार, राजकुमार राव, आयुष्मान खुराना, जॉन अब्राहम, कार्तिक आर्यन, ये सब हिंदी सिनेमा के आज के चोटी के सितारे हैं और सब के सब आउटसाइडर हैं। तो अगर कोई ये कहता है कि उसे स्टार किड्स की वजह से काम नही मिलता तो ये बस मेहनत से बचने का बहाना है।
मनोविज्ञान की अब तक की पढ़ाई में ऐसा कुछ सीखा आपने अब तक जो आपके लिए आंखें खोलने वाला रहा हो और जिसे आप दुनिया के साथ बांटना चाहते हों?
हां, एक बहुत अनोखी बात मुझे पता चली है और वह है पैरेंटल ट्रॉमा यानी कि माता-पिता की उम्मीदों से बच्चों को लगने वाले मानसिक आघात। अभी इस बात पर कोई चर्चा नहीं कर रहा है लेकिन आने वाले दिनों में इस पर भी खूब बात होने वाली है। ये भी ‘नो मीन्स नो’की तरह चर्चा में आने वाला है। अपनी आकांक्षाओं को अपने बच्चों के जरिये पूरा करने की माता-पिता की कोशिशें बंद होनी चाहिए। ये बच्चों के मानसिक विकास पर बहुत बुरा असर डाल रही हैं। माता-पिता अपनी समझ से गलत नहीं कर रहे, लेकिन वह समझ ही नहीं पा रहे कि बच्चों पर इसका क्या असर हो रहा है।