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Exclusive: कैसे जन्मी ‘गदर’ की कहानी? क्यों सेट पर रो पड़े बुजुर्ग बाबा? निर्देशक अनिल शर्मा ने सुनाए किस्से

सार

25 Years of Gadar Ek Prem Katha: अनिल शर्मा निर्देशित और सनी देओल अभिनीत फिल्म ‘गदर’ को रिलीज हुए आज 25 साल पूरे हो चुके हैं। इस मौके पर अनिल शर्मा ने अमर उजाला से खास बातचीत की और ‘गदर’ से जुड़ी यादों का पिटारा खोला। बताया कैसे सनी देओल और अमीषा पटेल को कास्ट किया गया था? साथ ही कई और अनसुने किस्से भी साझा किए। पढ़ें..

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फिल्म 'गदर' के निर्देशक अनिल शर्मा से खास बातचीत - फोटो : अमर उजाला
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15 जून... साल था 2001... सिनेमाघरों के बाहर लंबी कतारें थीं। अंदर सीटियों और तालियों का शोर गूंज रहा था। पर्दे पर तारा सिंह बनकर खड़े थे सनी देओल। ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद था, जिंदाबाद है और जिंदाबाद रहेगा…’ यह डायलॉग सुनते ही थिएटर में दर्शकों में जोश भर जाता था। और फिर जब सनी देओल ने हैंडपंप उखाड़ा.. वो सीन देखने के लिए तो हर कोई सिनेमाघरों की तरफ टूट पड़।

'गदर: एक प्रेम कथा’ के कई दृश्य और डायलॉग्स आज भी दर्शकों के जेहन में ताजा हैं। गुजरते वक्त के साथ 'गदर' ने क्लासिक फिल्म का दर्जा भी हासिल किया। आज इसकी सिल्वर जुबली पर निर्देशक अनिल शर्मा ने अमर उजाला डिजिटल के साथ उस सुनहरे सफर की यादें ताजा की हैं। पढ़िए, वो अनसुने किस्से अनिल शर्मा की जुबानी...

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फिल्म 'गदर' का एक दृश्य - फोटो : सोशल मीडिया
ट्रेन वाला सीन याद करके दिल जोर से धड़कता है 
‘आज भी अगर कोई एक पल है जिसे मैं शायद जिंदगी भर नहीं भूल सकता, तो वो ‘गदर’ का ट्रेन वाला क्लाइमेक्स सीन है। उस दौर में आज जैसी टेक्नोलॉजी नहीं थी इसलिए कई बड़े सीन्स असली परिस्थितियों में ही शूट करने पड़ते थे। चलती हुई ट्रेन थी, ऊपर हेलिकॉप्टर कैमरा था। सनी को एक डिब्बे से दूसरे डिब्बे पर कूदना था। उनके कंधे पर मेरा छोटा बेटा उत्कर्ष था, जो फिल्म में जीते का किरदार निभा रहा था।
मैंने एक डायरेक्टर के तौर पर वो शॉट मंजूर तो कर दिया था, लेकिन जैसे ही ट्रेन ने रफ्तार पकड़ी, अचानक मेरे अंदर का पिता जाग गया। लेकिन मुझे सनी पर पूरा भरोसा था। मुझे पता था कि वो उत्कर्ष को संभाल लेंगे। लेकिन फिर भी डर ऐसा था कि मैंने सचमुच अपनी आंखें बंद कर ली थीं।
मुझे याद है वो दस-बीस सेकंड मेरी जिंदगी के सबसे लंबे और सबसे ज्यादा बेचैनी वाले पल थे। उस वक्त मैं बस यही सोच रहा था कि मैंने ये शॉट करने की इजाजत दी ही क्यों? शायद वही पल था जब मुझे अहसास हुआ कि कुछ फिल्में सिर्फ बनाई नहीं जातीं, उन्हें जिया जाता है और ‘गदर’ मेरे लिए हमेशा ऐसी ही फिल्म रहेगी।’
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फिल्म 'गदर' सनी दोओल और अमीषा पटेल - फोटो : सोशल मीडिया

बंटवारे वाला सीन देखकर रो पडे बाबा 
'इसके अलावा अमृतसर रेलवे स्टेशन वाला सीन याद है। हम वो हिस्सा शूट कर रहे थे जहां कटी हुई लाशों से भरी ट्रेन आती है और चारों तरफ बंटवारे का दर्द दिखता है। सेट पर बहुत सारे लोकल जूनियर आर्टिस्ट थे। शॉट खत्म हुआ लेकिन मैंने देखा कि एक बुजुर्ग सरदार जी लगातार रोए जा रहे थे। मैं उनके पास गया और कहा कि बाबा शॉट खत्म हो गया है।
उन्होंने मेरी तरफ देखा और कहा, ‘मैं भी ऐसे ही दस साल की उम्र में किसी ट्रेन से आया था।’ वो सुनकर मैं कुछ पल के लिए बिल्कुल सन्न रह गया। उनकी आंखों में सचमुच वो दर्द दिख रहा था जो उन्होंने वर्षों पहले जिया था।
उस दिन पहली बार महसूस हुआ कि हम सिर्फ एक फिल्म नहीं बना रहे थे। हम लोगों की यादों को दोबारा जी रहे थे। शायद यही वजह है कि ‘गदर’ फिल्म लोगों के दिलों से इतनी गहराई से जुड़ गई।'

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फिल्म ' 'गदर' में सनी देओल - फोटो : सोशल मीडिया

लोगों ने कहा था नहीं चलेगी पर ‘गदर’ ने इतिहास बनाया
'आज ये बात याद करके हंसी आती है कि जब ‘गदर’ का ट्रायल हुआ था तो लोगों ने कहा था कि ये फिल्म नहीं चलेगी। कुछ लोगों ने तो यहां तक कहा कि ये पंजाबी फिल्म लगती है, इसे हिंदी में डब कर दो। कोई खरीदने को तैयार नहीं था। उसी वक्त ‘लगान’ के साथ क्लैश भी हुआ था लेकिन उस दौर में सोच आज जैसी नहीं थी। हमें बस लगता था कि दोनों अच्छी फिल्में हैं और दोनों चलेंगी और हुआ भी बिल्कुल वही।'

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फिल्म 'गदर' में सनी दोओल - फोटो : सोशल मीडिया

तारा सिंह के लिए सिर्फ सनी देओल ही पसंद थे
'सच कहूं तो तारा सिंह के लिए मेरे दिमाग में कभी कोई दूसरा नाम आया ही नहीं। मुझे हमेशा लगता था कि पुराने दौर में जिस तरह धर्मेंद्र जी उस तरह के किरदार में फिट बैठ सकते थे। उसी तरह उस समय सनी देओल के अलावा कोई दूसरा चेहरा हो ही नहीं सकता था। उसमें ताकत थी, गुस्सा था, मासूमियत थी और सबसे जरूरी वो जिगर था जो तारा सिंह के किरदार की पहचान था।'

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'गदर' की शूटिंग के समय अपने बेटे और सनी देओल को सीन समझाते हुए अनिल शर्मा - फोटो : सोशल मीडिया

जब लोग फेंकने लगे असली पत्थर
'बहुत लोग समझते हैं कि गदर सिर्फ इमोशंस और एक्शन से भरी फिल्म थी। लेकिन शूटिंग के दौरान ऐसे कई पल आए जिन्हें याद करके आज भी हंसी आ जाती है। एक सीन था, जहां हजारों लोग एक-दूसरे पर पत्थर फेंक रहे थे। हमने उसके लिए हजारों नकली पत्थर बनवाए थे जिससे कोई चोटिल न हो।
लेकिन शूटिंग लंबी चली और अचानक सारे नकली पत्थर खत्म हो गए। उसके बाद लोगों ने असली पत्थर उठाकर फेंकना शुरू कर दिया। सेट पर अफरा-तफरी मच गई। उस वक्त तो सब घबरा गए थे, लेकिन बाद में जब घटना को याद किया तो हम सब बहुत हंसे थे।'

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'गदर' फिल्म में अमीषा पटेल और सनी देओल  - फोटो : सोशल मीडिया

बंटवारे के दर्द ने दिया था ‘गदर’ को जन्म
'सच में यकीन ही नहीं होता कि गदर को 25 साल पूरे होने जा रहे हैं। जब इस फिल्म के बारे में पहली बार सोचना शुरू किया था, तब बस इतना महसूस होता था कि कुछ ऐसा बनाना चाहिए जो हमारी मिट्टी से निकला हो, हमारी सच्चाई से जुड़ा हो।
जब-जब मैं बंटवारे की कहानियां पढ़ता था, सुनता था तो अंदर तक हिल जाता था। मुझे हमेशा लगता था कि इतनी बड़ी त्रासदी, जिसमें लाखों लोग उजड़ गए, मारे गए, उसे हमने फिल्मों में कभी उस गहराई से दिखाया ही नहीं, जैसा दिखाया जाना चाहिए था।
लोग कहते थे कि ये पुराना जख्म है, इसे मत छेड़ो। लेकिन मुझे हमेशा लगता था कि यही तो हमारी सबसे बड़ी अनकही कहानी है। तभी मन में एक ख्याल आया कि अगर बंटवारे और नफरत के उस माहौल में प्रेम की एक कहानी जन्म ले तो वो कैसी होगी? बस वहीं से ‘गदर’ का पहला बीज बोया गया।
फिर शक्तिमान जी (फिल्म के लेखक) के साथ बैठना शुरू हुआ। कहानियां बनती रहीं, टूटती रहीं, फिर दोबारा बनती रहीं। करीब छह महीने के अंदर फिल्म की स्क्रिप्ट तैयार हो गई थी। बाद में सुधार होते रहे लेकिन उसकी आत्मा तो हमें बहुत पहले ही मिल गई थी।'

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फिल्म 'गदर:एक प्रेम कथा' में सनी देओल और अमीषा पटेल - फोटो : सोशल मीडिया

बजट की मजबूरी थी इसलिए अमीषा पटेल मिल गईं
'सकीना का किरदार हमारे लिए बहुत अहम था क्योंकि पूरी कहानी की आत्मा उसी पर टिकी थी। हमें एक ऐसा चेहरा चाहिए था जिसमें मासूमियत हो, नजाकत हो और स्क्रीन पर आते ही पुराना दौर महसूस होने लगे। हमने करीब 400 से ज्यादा लड़कियों के ऑडिशन लिए थे। पाकिस्तान वाले हिस्से के लिए हमें अमरीश पुरी जैसे बड़े कलाकार चाहिए थे, इसलिए बजट का भी अपना एक हिसाब था। तभी हमने तय किया कि सकीना के लिए एक नया चेहरा खोजा जाए।
फिर अमीषा आईं। मुझे आज भी याद है पहली मुलाकात के बाद ही लगा था कि यही हमारी सकीना है। उनके चेहरे पर एक अलग ही मासूमियत थी, एक सच्चाई थी जो उस किरदार के लिए बेहद जरूरी थी।
आज सोचता हूं तो लगता है कि उस किरदार में अमीषा ने जो मासूमियत दिखाई, उसने फिल्म के इमोशंस को और भी खूबसूरत बना दिया। कई बार कास्टिंग सिर्फ कलाकार चुनना नहीं होती, कई बार आपको अपना किरदार सामने खड़ा हुआ दिख जाता है। अमीषा को देखकर मुझे बिल्कुल वैसा ही महसूस हुआ था।'

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'गदर' फिल्म का पोस्टर - फोटो : सोशल मीडिया

फिल्म का हर सीन लिखते वक्त मुझे तालियां सुनाई देती थीं
'मजेदार बात यह थी कि जब हम फिल्म लिख रहे थे, तभी अंदाजा हो जाता था कि कौन सा सीन सीधे लोगों के दिल तक जाएगा।  कौन सा सीन थिएटर में गूंजने वाला है, इसका अहसास पहले ही हो जाता था। चाहे ‘हिंदुस्तान जिंदाबाद’ वाला पल हो, चाहे ‘बाप-बाप होता है, बेटा-बेटा होता है’ जैसा डायलॉग हो या कोई और बड़ा इमोशनल मोमेंट, जब वो सीन कागज पर उतरते थे, मेरे दिल के अंदर पहले ही तालियां बजने लगती थीं।
ऐसा बहुत कम फिल्मों में होता है जब आपको लिखते वक्त ही महसूस होने लगे कि ये सिर्फ कहानी नहीं है। यह तो लोगों के दिलों में जगह बनाने जा रही है। इस फिल्म के साथ मुझे वही अहसास हर दिन होता था।’


‘गदर’ को दर्शकों ने दिया बहुत प्यार 
'मेरे लिए सबसे खूबसूरत पल वो था जब पहली बार थिएटर में जनता के बीच बैठकर फिल्म देखी। लोग सीटियां बजा रहे थे। तालियां लगातार बज रही थीं। हर बड़े सीन पर थिएटर गूंज रहा था। जो प्यार उस दिन मिला, उसे देखकर मैं अंदर से भावुक हो गया था। उस दिन पहली बार लगा कि हमने सिर्फ एक फिल्म नहीं बनाई। हमने लोगों के दिलों में हमेशा के लिए अपनी जगह बना ली है।
आज 25 साल बाद भी लोग उसी प्यार से ‘गदर’ को याद करते हैं। तब महसूस होता है कि वो मेहनत, वो जुनून, वो संघर्ष, वो विश्वास सब कुछ आखिरकार रंग ले आया। यही किसी फिल्ममेकर के लिए सबसे बड़ी खुशी होती है।'

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