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कबीर सिंह की ‘बंदी’ से लेकर समलैंगिक सोनम तक, महिलाओं के इर्द-गिर्द घूमी 2019 के ये शानदार फिल्में

Tue, 31 Dec 2019 05:02 PM IST
anand anand बीबीसी हिंदी
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Year Ender 2019 these bollywood film are based on women - फोटो : amar ujala
बीहड़ में गोलियों की बौछार के बीच फिल्म सोनचिड़िया का ये डायलॉग दिल के आर-पार हो जाता है - "औरत की जात अलग होत है"। बलात्कार का शिकार हुई दलित बच्ची को बचाने की कोशिश में चंबल के डाकुओं की बीच भाग रही कथित ऊंची जाति की इंदुमती (भूमि पेडनेकर) से ये बात महिला डकैत फूलिया तब बोलती हैं जब इंदुमति डाकुओं के दो ऐसे गुटों के बीच फँस जाती है जो अलग-अलग जात के हैं। बंदूकों से लैस पर बेबस फूलिया जैसे बता रही हो कि ऊंची-नीची जातियों में बंटे समाज में भी औरत सबसे निचली पायदान पर है। साल 2019 में कई ऐसी हिंदी फिल्में आई हैं जो औरत के नजरिए को दिखाने की कोशिश करती दिखीं। वहीं कई फिल्मों ने असहज करने वाले सवाल छोड़े।
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kabir singh - फोटो : social media
कबीर सिंह
साल 2019 में आई फिल्म कबीर सिंह एक 'डिसरप्टर' फिल्म मानी जा सकती है। फिल्म के लिए खूब तालियाँ पड़ीं लेकिन ये आरोप भी लगे कि ये औरतों को नीचा दिखाने वाली फिल्म थी। मसलन फिल्म में एक सीन है जहाँ प्यार में चोट खाया हीरो कबीर सिंह (शाहिद कपूर) एक लड़की को चाक़ू की नोक पर कपड़े उतारने को कहता है। लड़की की ना का उसके लिए कोई मतलब नहीं। उसकी प्रेमिका का दुपट्टा जरा से सरकता है तो वो उसे ढँकने के आदेश देता है। प्रेमिका को ये कहने में उसे कोई झिझक नहीं होती कि "कॉलेज में लोग तुम्हें सिर्फ़ इसलिए जानते हैं क्योंकि तुम कबीर सिंह की बंदी हो।"

कबीर सिंह बिना उसकी मर्जी पूछे हीरोइन को अपने साथ ले जाता है, छूता है, चूमता है, मारता है। उससे भी ज्यादा परेशान करने वाली बात ये कि वो लड़की उफ्फ तक नहीं करती। फिल्म में जैसे उस लड़की को कोई आवाज या अधिकार ही नहीं दिए गए। सारे जज्बात, प्यार, गुस्सा, आक्रोश फिल्म के हीरो के हिस्से हैं। उसकी 'बंदी' एक बंद, बेजबान गुड़िया की तरह है। फिल्म गली बॉय की हीरोइन सफीना (आलिया) से बिल्कुल उलट।
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gully boy - फोटो : social media
गली बॉय की आलिया
गली बॉय की सफीना (आलिया) अपनी बात साफ-साफ रखती है, हक नहीं मिलने पर चिल्लाती है, कई बार बेकाबू भी हो जाती है। पर सफीना जानती है कि उसे क्या चाहिए और क्या नहीं। एक सीन में आलिया ईर्ष्यावश रणवीर की महिला दोस्त (कल्कि) के सर पर बोतल मारती है। एक पल के लिए ही सही, उसमें रत्ती भर कबीर सिंह वाला पागलपन दिखाई देता है लेकिन वो उसके लिए शर्मिंदा भी होती है। जोया अख्तर की इस फिल्म में कहानी भले ही रणवीर सिंह के इर्द गिर्द घूमती है, पर फिल्म की निर्देशक जोया अख्तर ने आलिया को अपनी अलग पहचान दी है। ऐसे सीन कितनी फिल्मों में देखने को मिलते हैं जहाँ फिल्म की हीरोइन हीरो को ये भरोसा दिलाती है कि तुम अपना सपना पूरा करो, मैं हूं ना पैसे कमाने के लिए।

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article 15 - फोटो : social media
आर्टिकल 15
जेंडर की बात करें तो इस साल उन्नाव और हैदराबाद में बलात्कार के दिल दहलाने वाले मामले आए। उसकी झलक फिल्म आर्टिकल 15 में दिखाई दी। 'रेप समझती हो बच्चे?' फिल्म आर्टिकल 15 में एक युवा पुलिस अधिकारी (आयुष्मान खुराना) 15-16 साल की एक बच्ची को ये समझाने की कोशिश कर रहा है कि उसके भाई ने 'निचली जात' की एक लड़की का रेप किया है और अब वो खुदकुशी कर चुका है। फिल्म आर्टिकल 15 भले ही हीरो आयुष्मान खुराना की नज़र से दिखाई गई है लेकिन इसे जेंडर सेंसटिव फिल्म कहा जा सकता है।
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ek ladki ko dekha toh aisa laga - फोटो : social media
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा
साल की सबसे हैरान करने वाली फिल्मों में से एक थी शैली चोपड़ा धर की 'इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा'। समलैंगकिता पर कई फिल्में बन चुकी हैं लेकिन भारत में दो लड़कियों की प्रेम कहानी को मेनस्ट्रीम सिनेमा में दिखाने की हिम्मत कम ही फिल्मकार कर पाए हैं। फिल्म की कमाई बहुत न भी हुई हो लेकिन सोनम कपूर ने एक लेस्बियन लड़की को रोल कर नैरेटिव को तोड़ने की कोशिश जरूर की है। फिल्म की लेखिका हैं ग़ज़ल धालीवाल जिन्होंने एक लड़के से असल जिंदगी में लड़की बनने का सफ़र तय किया है।
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सांड की आंख - फोटो : सोशल मीडिया
दादियों पर बनी फिल्म
2019 में ऐसी कुछ ही फिल्में रहीं जहाँ सारा नैरेटिव मर्दों के इर्द गिर्द नहीं औरतों के आसपास घूमता है। 70-80 अस्सी साल की दो निशानेबाज दादियों की असल कहानी पर निर्देशक तुषार हीरानंदानी की फिल्म 'सांड की आंख' ऐसी ही एक फिल्म रही। हालांकि दादी के रोल में उम्रदराज अभिनेत्रियों की जगह दो युवा हीरोइनों (तापसी और भूमि) को लेने के फैसले ने फिर से इस बहस को छेड़ दिया कि भारत में उम्दा लेकिन उम्रदराज अभिनेत्रियों के लिए मौके कम ही होते हैं।

एक्टर भी, डायरेक्टर भी
महिला किरदारों पर बनी एक अहम फिल्म रही कंगना रनौत की मणिकर्णिका - द क्वीन ऑफ झाँसी। इसे निर्देशक राधा कृष्ण और कंगना ने मिल कर डाइरेक्ट किया जिसे लेकर काफी विवाद भी हुआ। पुरुषों के मुकाबले हिंदी सिनेमा में ऐसी बहुत कम अभिनेत्रियाँ हैं जिन्होंने एक्टिंग और निर्देशन दोनों किया हो। मसलन शोभना समर्थ जिन्होंने अपनी दोनों बेटियों नूतन औल तनूजा को लॉन्च किया। नंदिता दास, अपर्णा सेना, कोंकणा सेन जैसे कुछ और नाम हैं इस लिस्ट में।
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Section 375 - फोटो : social media
कितनी फिल्में महिलाओं ने बनाईं?
महिला निर्देशकों की बात चली है तो 2019 में कुछ फिल्में बनीं जो महिलाओं ने बनाईं - जोया अख्तर (गली बॉय ), द स्काई इज़ पिंक (सोनाली बोस), इक लड़की को देखा तो ऐसा लगा (शैली चोपड़ा धर), खानदानी शफाखाना (शिल्पी दासगुप्ता), मोतीचूर चकनाचूर (देबमित्रा)। हालांकि जेंडर को लेकर जो संवेदनशीलता चाहिए उसमें अब भी हिंदी फिल्मों को लंबा सफर तय करना है । वरना हाउसफुल-4 जैसी अक्षय कुमार की बड़ी कॉमर्शियल फिल्म में इस तरह के डायलॉग नहीं होते- जिसने जेंडर का टेंडर नहीं भरा (समलैंगकिता पर कटाक्ष)। या पति पत्नि और वो के ट्रेलर में ये डायलॉग नहीं होता- बीवी से सेक्स मांग ले तो हम भिखारी, बीवी को सेक्स मना कर दें तो हम अत्याचारी और किसी तरह जुगाड़ लगा के उससे सेक्स हासिल कर लें तो बलात्कारी भी हम। कितनी आसानी से डायलॉग मैरिटल रेप का मज़ाक उड़ाकर निकल जाता है। वही रेप जिससे जुड़े कई पहलुओं पर बात करने की कोशिश फिल्म सेक्शन 375 ने की है। वैसे लोगों के विरोध के बाद इस डायलॉग को हटाना पड़ा था जो शायद कुछ साल पहले मुमकिन ना होता। साल 2020 की शुरुआत एसिड अटैक झेल चुकी एक लड़की पर बनी फिल्म छपाक से हो रही है जो कुछ उम्मीद बंधाती है।
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