चांदनी
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80 के दौर की उनकी ज्यादातर फिल्में सामांजस्य नहीं बना पाई। एक बातचीत में यश चोपड़ा ने बताया था कि 80 के दौर में उन्हें अपनी ही एक फिल्म का पोस्टर देखकर लगा था कि उनकी फिल्मों में केवल पोस्टर पर से सितारों के चेहरे बदल रहे हैं, कहानी वही रहती है, जिसके बाद उन्होंने 'चांदनी' बनाई। 'चांदनी' में उन्होंने ऐसा ताना-बाना बुना की हर तरफ बस चांदनी ही बिखर गई। वहीं, यह भी कहना गलत नहीं होगा कि यश चोपड़ा खूबसूरती के पुजारी थे। रुपहले पर्दे पर हुस्न को कैसे चार चांद लगाए जाते हैं, इसमें वह माहिर थे।
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