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नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार, जियो, ज़ी फाइव, ऑल्ट बालाजी खुद की सेंसरशिप क्यों चाहती हैं

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भारत में इंटरनेट के जरिए ऑनलाइन सीरियल दिखाने वाले कुछ प्लेटफॉर्म ने ये तय किया है कि वो अपने कन्टेन्ट पर खुद ही पहरा लगाएंगी। इसके लिए मोबाइल और ऑनलाइन सेवाओं के क्षेत्र में काम करने वाली संस्था इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन ऑफ इंडिया (आईएएमएआई) के साथ मिल कर कंपनियों ने एक मसौदा तैयार किया है।जो कंपनियां इस मसौदे को अपनाने वाली हैं उनमें नेटफ्लिक्स, हॉटस्टार, जियो, ज़ी फाइव, ऑल्ट बालाजी और कुछ और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म शामिल हैं।

भारत में फिल्म, प्रिंट और टीवी कन्टेन्ट को सर्टिफिकेट देने वाली संस्थाएं हैं लेकिन ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म के कन्टेन्ट पर सेंसरशिप को लेकर किसी भी तरह का कानून अभी तक नहीं है। बीबीसी के पास मौजूद इस मसौदे "कोड ऑफ बेस्ट प्रैक्टिसेस फॉर ऑनलाइन क्यूरेटेड कन्टेन्ट प्रोवाइडर्स" के अनुसार इसका उद्देश्य "उपभोक्ताओं के हितों के साथ-साथ कंपनियों की रचनात्मक स्वतंत्रता की रक्षा" करना है। हालांकि जानकारों का कहना है कि खुद को सेन्सर करने की कोशिश खुद की शिकायतें खुद सुनने जैसा है और कंपनियां भविष्य में खुद को किसी तरह के कानूनी पचड़ों में फंसने से बचाने की कोशिश कर रही हैं।

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किस तरह के कन्टेन्ट पर लग सकती है रोक? मसौदे के अनुसार हस्ताक्षर करने वाले सभी प्लेटफॉर्म इसका पालन करने के लिए बाध्य होंगे और मूल रूप से पांच तरह के कन्टेन्ट दिखाने से बचेंगे. ये कन्टेन्ट हैं -

राष्ट्रीय चिन्ह और तिरंगे को गलत तरीके से दिखाया जाना
असल या बनावट किसी भी रूप में बच्चों को सेक्शुअल एक्टिविटी में दिखाया जाना या फिर बच्चे के जननांग को गलत तरीके से दिखाया जाना.
किसी जाति, वर्ग या समुदाय की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने जैसा कुछ दिखाना
भारत और देश की संस्थाओं के विरुद्ध आतंकवाद को बढ़ावा देने और इससे जुड़ी हिंसा को गलत तरीके से दिखाया जाना
ऑनलाइन सेवा के जरिए कानूनी तौर पर या कोर्ट द्वारा किसी चीज को दिखाने पर लगी पाबंदी का पालन करना

आईएएमएआई के अनुसार नेटवर्क18 के ग्रुप जनरल काउंसेल क्षिप्रा जटाना के अनुसार "भारत के बेहतर भविष्य के निर्माण के लिए कंपनी इसका हिस्सा बन कर खुश है।" सोनी पिक्चर्स नेटवर्क के जनरल काउंसेल अशोक नंबिस्सन के अनुसार "खुद का कन्टेन्ट खुद सेंसर करने से कन्टेन्ट बनाने वाली कंपनियां अपने उपभोक्ताओं के प्रति अधिक जवाबदेह बनेंगी।"  ,netflix ,netflix india ,nawazuddin siddiqui ,नेटफ्लिक्स ,हॉटस्टार ,enternet ,ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म ,saif ali khan ,secret game series

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मौजूदा मसौदे के अनुसार अगर किसी उपभोक्ता को कन्टेन्ट से संबंधित शिकायत करती है तो इसके लिए वो कंपनी के पास जा सकता है। इन शिकायतों के निपटारे के लिए कंपनियां खुद ही किसी व्यक्ति को नामित करेंगी या फिर इसके लिए अलग विभाग बनाएंगी। ये विभाग ऐसे मामलों का एक नियत समय में निपटारा करेगा।

मसौदे के आखिरी वाक्य में कहा गया है कि सूचना और प्रसारण मंत्रालय, इलेक्ट्रॉनिक और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय और भारत सरकार इस संबंध में मिलने वाली शिकायतों को कंपनी के उक्त विभाग को भेज सकती हैं जो कोड में बताए गए नियमों के अनुसार इसका निपटारा करेगा।

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क्या ये कानून से बचने का तरीका है? 'इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन' का कहना है कि ये सेल्फ रेगुलेटरी कोड ना तो उपभोक्ता के हित में है ना ही कंपनियों के हित में है। फाउंडेशन का कहना है कि इसके लिए आज कुछ कंपनियां एक साथ आई हैं लेकिन उन्होंने इस कोड के जरिए सरकार से कहा है कि कन्टेन्ट संबंधी शिकायतें कंपनी को ही भेजी जाएं। इंटरनेट फ्रीडम फाउंडेशन के कार्यकारी निदेशक अपार गुप्ता कहते हैं, "इसके जरिए ये ऑनलाइन स्ट्रीमिंग कंपनियां सरकार से इस कोड पर सहमति ले लेंगे और इसके बाद इस पर कभी कानून बनेगा ही नहीं। क्योंकि सरकार ये कह सकेगी कि कंपनियों के पास कन्टेन्ट सेन्सर करने के लिए कोड पहले ही मौजूद है।"

वो कहते हैं, "और तो और कुछ कंपनियों के बनाए नियम धीरे-धीरे नई आने वाली कंपनियों और फिर इस पूरे सेक्टर पर भी लागू होने लगेंगे। इसका मतलब ये कि जिन कंपनियों की इसको बनाने में कोई भागीदारी नहीं है, वो भी इसे माने के लिए बाध्य होंगी।" वो पूछते हैं, "आप सोचिए कि अगर प्रिंट मीडिया ये कहे कि सारी शिकायतें प्रेस काउंसिल को भेजने की बजाय प्रिंट कंपनियों को ही भेज दी जाएं, तो क्या होगा?"

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इसमें एक गंभीर मुद्दा ये भी है कि किस तरह के कन्टेन्ट को सेन्सर किया जाएगा, इसे लेकर साफ तौर पर ये नहीं बताया गया है कि बाद में ये सीमा बढ़ाई या घटाई जा सकती है या नहीं। इस संबंध में फाउंडेशन ने आईएएमएआई को एक पत्र लिखा है। अपार गुप्ता कहते हैं कि "सोचने वाली बात ये है कि नेटफ्लिक्स अमरीकी कंपनी है लेकिन खुद अमरीका में उन्होंने कोई ऐसा कोई कोड नहीं बनाया है।"

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ऑनलाइन सीरियल में सेन्सरशिप का मुद्दा आया कहां से?

भारत में हाल में ऑनलाइन स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म पर सीरियल देखने वाले लोगों की संख्या बढ़ी है। साल 2018 में नेटफ्लिक्स में वेबसिरीज 'सेक्रेड गेम्स' आई थी. इसमें पूर्व प्रधानमंत्री और कांग्रेस नेता राजीव गांधी के लिए अपमानजनक शब्द के इस्तेमाल को लेकर काफी विवाद हुआ था। इस संबंध में अभिनेता नवाज़ुद्दीन सिद्दीकी और सिरीज़ के निर्माता के खिलाफ शिकायत भी दर्ज कराई गई थी। नेटफ्लिक्स के खिलाफ ये मामला कोर्ट तक पहुंचा जहां नेटफ्लिक्स ने सिरीयल से इस डायलॉग को हटाने से इनकार कर दिया था।

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