फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Usha Mangeshkar EXCLUSIVE: दीदी बोलीं ऐसा क्या है ‘जय संतोषी मां’ में, मुझे भी दिखाओ, और फिर घर ही बन गया...

विज्ञापन
1 of 10
लता मंगेशकर, उषा मंगेशकर, आशा भोसले और उनकी बहन - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
पार्श्वगायिका उषा मंगेशकर के बारे में कम लोग ही ये जानते हैं कि गायन उनका पहला प्रेम कभी रहा ही नहीं, वह तो चित्रकार बनना चाहती थीं। ‘दीदी’ लता मंगेशकर के कहने पर वह गायन क्षेत्र में आईं और उनके गाए भक्ति गीत ‘मैं तो आरती उतारूं रे संतोषी माता की’ ने हिंदी सिनेमा के गीतों में कालजयी दर्जा हासिल कर लिया। बिना किसी प्रचार प्रसार के रिलीज हुई फिल्म ‘जय संतोषी मां’ इतनी लोकप्रिय हुई कि लता मंगेशकर ने इसे देखने की इच्छा जाहिर की, और उनके लिए घर पर ही इस फिल्म को दिखाने की व्यवस्था की गई। अपने जन्मदिन पर ‘अमर उजाला’ से बातें करते हुए उषा मंगेशकर ने गायन में अपनी शुरुआत, संगीत के मशीनीकरण और फिल्मी गानों से लुप्त होती संगीत आत्मा पर खुलकर अपनी राय रखी है।
विज्ञापन

2 of 10
अपने परिवार के साथ उषा मंगेशकर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

'जय संतोषी मां' के गीत 'मैं तो आरती उतारूं रे' आज भी काफी लोकप्रिय है, इस फिल्म को देखने के बाद लोगों ने शुक्रवार का व्रत रखना शुरु कर दिया था, आपके जीवन में इस फिल्म के बाद कोई बदलाव आया क्या?
ऐसा कोई रहन सहन में या फिर मेरी गायकी में तो बदलाव नहीं आया। कमाल की बात यह थी कि पहले कोई संतोषी मां का व्रत नहीं करता था और ना मैंने भी कभी इस बारे में सुना। फिल्म के रिलीज के बाद संतोषी मां में लोगों को अटूट विश्वास हो गया। सब नए लोगों ने मिलकर फिल्म बनाई और सबकी किस्मत पलट गई। फिल्म को ऐसी कामयाबी मिली कि किसी फिल्म को इतना कामयाब होते नहीं देखा।मैं कोई ‘दीदी’ (लता मंगेशकर) य़ा फिर आशा (भोसले) जितनी बडी गायिका नहीं हूं लेकिन अपनी जगह पर ठीक हूं। 
Throwback Thursday: जब शाहरुख खान ने खुद बताई अक्षय के साथ फिल्म न करने की वजह, बेहद दिलचस्प है किस्सा

विज्ञापन

3 of 10
उषा मंगेशकर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

इसी दिन 'शोले' भी रिलीज हुई थी,एक तरफ दीदी के गाए गीत तो दूसरी तरफ 'जय संतोषी मां' में आप के गीत। इन दोनों फिल्मों को लेकर दीदी से किस तरह की बातें होती थीं ?
दीदी ने मुझसे कहा कि ऐसा क्या है इस फिल्म में जिसकी इतनी चर्चा हो रही है, दिखाओ मुझे फिल्म। हमने घर पर ही फिल्म दिखाने की व्यवस्था कि क्योंकि थिएटर में उन्हें ले नहीं जा सकते थे। थिएटर में वह जातीं तो लोग उनको ही घूम घूमकर देखते। 'जय संतोषी मां' के मेकर ने फिल्म का प्रीमियर भी नही रखा था। फिल्म ऐसे ही रिलीज कर दी और फिल्म चल गई। इस तरह के चमत्कार सिर्फ एक ही बार होते हैं। 

4 of 10
जय संतोषी मां - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

और ऐसे कौन से गीत हैं जो आप के दिल के बहुत करीब है और जिन्हें आप बार बार सुनती हैं?
मैं अपने कोई भी गाने नहीं सुनती हूं क्योंकि गाने सुनने के बाद मुझे लगता है कि इसे और बेहतर गा सकती थी। ऐसा बहुत सारे लोगों को लगता है। दीदी को भी ऐसा ही लगता था। जब मैं स्टेज शो में परफॉर्म करने जाती हूं तो अपने गाने लिख लेती हूं। 
Usha Mangeshkar: गायिका नहीं तो पेंटर होतीं उषा मंगेशकर, ‘जय संतोषी मां’ के गाने से मिली नई पहचान

विज्ञापन

5 of 10
अपने परिवार के साथ उषा मंगेशकर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

'अपलम चपलम' जैसे कई गीत आपने लता दीदी के साथ गाए हैं। जब आप लता दीदी के साथ गाती थीं तो गाने को लेकर उनका किस तरह से सुझाव होता रहता था?
'अपलम चपलम' दीदी के साथ मेरा पहला गाना था। यह गाना फिल्म 'आजाद' का है जिसमें दिलीप कुमार, मीना कुमारी और प्राण जैसे बड़े सितारे थे। उस फिल्म के म्यूजिक डायरेक्टर सी रामचंद्र थे। उन्होंने जब मुझे गाने का ऑफर दिया तो मैं गाने के लिए बिल्कुल भी तैयार नही थी। उस समय मैं नहीं गाती थी सिर्फ पेंटिंग करती थी। दीदी के साथ गाना था तो मुझे कोई चिंता ही नहीं थी अगर मैं नहीं गाती तो दीदी गा लेती। गाने को लेकर दीदी का यह सुझाव होता था कि जैसा गाती हो उसी तरह से गाओ। गाने की जो लाइंस मेरी समझ में नहीं आती थी उसे दीदी गा देती थीं। मैं घर में सबसे छोटी थी तो सब मुझे बहुत लाड प्यार करते थे। कभी कभी मैं बोलती थी सिर्फ एक ही लाइन गाऊंगी तो दीदी कहती थीं, ‘ठीक है एक ही लाइन गा दे, बाकी मैं गा दूंगी। दीदी का ऐसा प्यार था कि अपनी बहन को तकलीफ में नहीं देख सकती थीं।’

विज्ञापन

6 of 10
अपने परिवार के साथ उषा मंगेशकर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

आज के और पुराने दौर के संगीत में क्या फर्क नजर आता है आप को? 
मुझे जो फर्क नजर आता है, वह यह है कि आज का म्यूजिक बहुत लाउड हो गया है और गायक की आवाज दब जाती है। अभी ज्यादातर डांस पर आधारित  गाने बन रहे हैं। उनमें शोर ज्यादा होता है। 10-20 डांसर के साथ हीरो हीरोइन डांस कर रहे हैं। ऐसा गाना देखने में अच्छा लगता है लेकिन सुनने में नहीं। हमारे जमाने में ऐसे कैबरे डांस वाले गाने होते थे। लेकिन वे भी सुनने में अच्छे लगते थे और गाने के बोल लोगों के दिमाग में रह जाते थे। ऐसा नहीं कि आज अच्छे गीत लिखने वाले नहीं है लेकिन कोई अच्छे गीत की तरफ ध्यान नहीं देता है। आज भी बहुत सारे अच्छे म्यूजिक डायरेक्टर और सिंगर्स हैं उनसे अच्छा काम निकलवाने वाला चाहिए। जैसे मैंने राज एन सिप्पी की फिल्म 'इंकार' का गीत  'मुंगड़ा' गाया है, उसके बोल किसी को समझ में नहीं आते हैं लेकिन सुनने के बाद लोगों को अच्छा लगता है। कुछ गाने रिदम पर भी चलते हैं, 'मुंगड़ा' वैसा ही गाना था। 
Veena Kapur: 'मृत' टीवी एक्ट्रेस वीणा कपूर ने पुलिस स्टेशन पहुंच सबको चौंकाया, बोलीं- बेटे ने मुझे नहीं मारा

विज्ञापन

7 of 10
उषा मंगेशकर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

पुराने दौर के गायक अमर हो गए हैं जबकि गायकों की नई फौज पानी का बुलबुला बनकर रह गई, ऐसा क्यों?
पहले एक गाना आता था तो काफी लंबे समय तक चलता था। जैसे 'संतोषी मां' का गीत आया लंबे समय तक चला और लोगों के दिलों में बैठ गया। अब तो फिल्म में गाने देखने के बाद गायब हो जाते हैं। अभी न तो रिकॉर्ड है और न ही कैसेट और सीडी। अब लोग पेन ड्राइव में गाने रखते हैं या फिर मोबाइल में सुनने है। पहले जो दौर था घर में गाना बजता था तो घर के सभी लोग साथ में गाना सुनते थे। टेक्नालॉजी बढ़ती जा रहीं और कला कम होती जा रही है। आज की नई तकनीक आ जाने से गाने में आत्मा खत्म हो गई है।

8 of 10
उषा मंगेशकर, हेलेन - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई

आज के संगीत में आप को क्या कमी दिखती है? 
आज गाने में आत्मा खत्म हो गई है। मैंने भी ऐसे गाने गाए हैं जो आजकल के जमाने के हिसाब से हैं। आज दिल्ली में बैठा म्यूजिक डायरेक्टर हारमोनियम पर ट्यून बनाकर भेज देता है। स्टूडियो में रिकार्डिस्ट गाने के  मुखड़े को कट कट में रिकॉर्ड करते हैं और बोलते हैं आप चार बार मुखड़ा गा दीजिए उसमें से जो अच्छा लगेगा रख लेंगे। उसके बाद फिर अंतरा गाने के लिए कहते हैं। लेकिन गाने का मूड चला जाता है। बोलते हैं अंतरा तीन बार गा दीजिए उसमें से जो अच्छा लगेगा रख लेंगे। अंतरा गाने के बाद जब फिर मुखड़ा गाने की बात आती है तो कहते हैं कि पहले का गाया मुखड़ा आगे पेस्ट कर देंगे। जब मैं कहती हूं कि मुखड़ा अलग अलग गाने वाली हूं। बोलते हैं, उसकी जरूरत नहीं लोगों को याद नहीं रहता है। अब इस तरह से बने गाने में आत्मा कहां से आएगी? नया गाना कल गाया और आज याद नहीं रहता है। याद करने के लिए गाना तीन चार बार सुनना पड़ता है। आज टुकड़ों में रिकॉर्डिंग होती है इसलिए गाने याद नहीं रहते और न ही गानों में एहसास आते हैं। 
Box Office Report: अब दृश्यम 2 से दो-दो हाथ करेगी अवतार 2, जानें मुकाबले में किस तरह टिक पाएंगी बाकी फिल्में

9 of 10
उषा मंगेशकर, लता मंगेशकर - फोटो : अमर उजाला आर्काइव, मुंबई
यूट्यूब जैसा प्लेटफार्म गायकों को कितना फायदा पहुंचा सकता है?
आज तो यूट्यूब के सिवाय दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है। आज स्टेज पर गाओ या फिर यूट्यूब पर। अब कोई रिकार्ड बनाता नहीं है। सीडी और कैसेट तो बंद हो ही गए हैं। नए नए म्यूजिक डायरेक्टर और सिंगर आ रहे हैं और कुछ अलग करने की कोशिश कर रहे हैं। जो भी नई तकनीक आई है लोग अपने हिसाब से उसमें काम कर रहे हैं, लेकिन हम पुराने लोग इसमें फिट नहीं बैठते।
विज्ञापन

10 of 10
उषा मंगेशकर - फोटो : सोशल मीडिया

मंगेशकर परिवार से भविष्य में क्या उम्मीद रखें? 
दीदी जैसा तो कोई 100 वर्षों नहीं बन सकता। वह तो भगवान की देन थीं। हम लोग दीदी को सरस्वती का अवतार ही मानते हैं। दीदी ने जो गाया है उसे आप गुनगुना सकते हैं लेकिन उनके जैसा गा नहीं सकते। बहुत सारे सिंगर्स ने दीदी जैसा गाने की कोशिश की लेकिन उनमें वो आत्मा नजर नहीं आई। आशा दीदी जैसा गाती हैं उनके जैसा भी कोई नहीं है। उन्होंने गायकी में अपनी जो अलग पहचान बनाई है उनका वह अलग ही अंदाज है। वैसा भी कोई नहीं बन सकता। मैने भी तमाम भाषाओं में बहुत सारे गाने गाए हैं। मेरे गाने दीदी और आशा जितने ऊंचे तो नहीं लेकिन मैंने जितने गाने गाए हैं उनसे पूरी तरह से संतुष्ट हूं।
Shefali Jariwala: हाथ पर टैटू, गले में टाई..कुछ यूं ‘कांटा लगा गर्ल’ बन फेमस हुईं शेफाली, मिली थी महज इतनी फीस

विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें