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Social Issue Based Movies: सामाजिक मुद्दों पर चोट करती वो फिल्में, जो गुदगुदाने के साथ आपका नजरिया बदल देंगी

Fri, 11 Mar 2022 11:46 PM IST
निधि पाल एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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सामाजिक मुद्दों पर बनी फिल्में - फोटो : सोशल मीडिया
एक समय था जब बॉलीवुड में फिल्में सिर्फ पैसे कमाने के उद्देश्य से बनाई जाती थीं। उस समय के मेकर्स बस तलाश में रहते थे कि कैसे भी करके फिल्म बॉक्स ऑफिस पर हिट हो जाए और तगड़ी कमाई कर के दे। हालांकि पिछले काफी समय से इन चीजों में बदलाव आया है। अब फिल्में सामाजिक मुद्दों को देखते हुए बनाई जाने लगी हैं। लेकिन ये जरुरी नहीं है कि लोगों में जागरुकता फैलाने के लिए और सामाजिक मुद्दों पर रोशनी डालने के लिए गंभीर फिल्म बनाई जाए। आजकल ऐसी फिल्में भी बन रही हैं जो दर्शकों को सामाजिकता का संदेश तो देती ही हैं और उनका मनोरंजन भी करती हैं। तो आइये जानते हैं वो फिल्में कौन सी हैं...
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कागज - फोटो : सोशल मीडिया
कागज

यह पंकज त्रिपाठी की लीड फिल्म है। इस फिल्म में उस मुद्दे के बारे में बात की गई है, जिसे हम सब जानते तो हैं लेकिन कोई ध्यान नहीं देता। यह एक आम आदमी की कहानी है, जिसे सरकार ने कागजों में मृत घोषित कर दिया है। इस फिल्म में वह आदमी 14 साल संघर्ष करने के बाद खुद को साबित करने में सफल हो जाता है। 
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हेलमेट - फोटो : अमर उजाला, मुंबई
हेलमेट

हेलमेट एक ऐसे मुद्दे पर बनी फिल्म है, जिसके बारे में भारत में सामाजिक तौर पर बात करना भी पाप माना जाता है। दरअसल हेलमेट सुरक्षित इंटरकोर्स (सेक्स) के लिए लोगों को कंडोम खरीदने के लिए जागरुक करने वाली फिल्म है। फिल्म का निर्देशन सतराम रमानी ने किया है। 

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मिमी - फोटो : File Photo
मिमी

मिमी एक ऐसे संवेदनशील मुद्दे पर बनी फिल्म है जिसके बारे में एक समय में सोचना भी गुनाह होता था। ये फिल्म सेरोगेसी पर बनी है। इस फिल्म में सामाजिक मुद्दे के बारे में दर्शकों को हल्के-फुल्के मनोरंजन के रुप में बताया गया है। इस फिल्म में सेरोगेसी, रंग भेद, जाति और गर्भपात तक के मुद्दे को उठाया गया है।
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शुभ मंगल ज्यादा सावधान - फोटो : सोशल मीडिया
शुभ मंगल ज्यादा सावधान

आज भले ही कानून ने समलैंगिकता को अपराध की लिस्ट से बाहर कर दिया हो, लेकिन समलैंगिक लोगों को आज भी अपने परिवारों में किस तरीके से अपमान और तिरस्कार सहना पड़ता है, ये इस फिल्म में दिखाया गया है। आनंद एल रॉय की ये फिल्म कहीं न कहीं इस बात को साबित करने में सफल होती है कि सिर्फ काननू से बात नहीं बनेगी, बल्कि इस मुद्दे के लिए सामाजिक तौर पर भी लड़ना होगा।
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हिंदी मीडियम
हिंदी मीडियम

भारत में बड़े तबके पर आज अंग्रेजी को बढ़ावा देने के लिए भीड़ की तरीके से लोग आगे बढ़ रहे हैं। धीरे-धीरे ऐसी स्थिति आ रही है कि जिस देश की भाषा हिंदी है  वहां टूटी फूटी हिंदी बोलना शान और गलत अंग्रेजी बोलने वाले को गंवार समझा जाता है। इस फिल्म में इस बात को बहुत बारीकी से दिखाया गया है कि अंग्रेजी माध्यम और बड़े स्कूलों बच्चों के दाखिले के लिए अभिभावक किसी  भी हद तक चले जाते हैं। मानों इन स्कूलों में एडमिशन होते ही वह बहुत बुद्धिमान और बड़े आदमी बन जाएंगे।
   
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