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90 के दशक की ये यादें हो जाएंगी ताजा: जब साथ देखते थे 'शक्तिमान' और करते थे 'कट्टी'

Mon, 12 Apr 2021 09:05 AM IST
दीपाली श्रीवास्तव एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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90 दशक के बच्चों की यादें - फोटो : सोशल मीडिया
हम सभी कही ना कही चाहते हैं कि 90 का दशक वापस आ जाये। कितना सही वक्त था ना वो? जब कोई गैजेट्स, मोबाइल फोन, ऑनलाइन क्लासेस नहीं होती थी। पढ़ाई सिर्फ स्कूल में होती थी और हमें किसी ऑनलाइन क्लास को लेकर कोई चिंता नहीं होती थी। आज के समय में सोशल मीडिया का भी क्रेज लोगों के सिर पर चढ़ा हुआ है, उस वक्त सोशल मीडिया क्या होता है किसी को मालूम भी नहीं था। हम बच्चे स्कूल जाते थे और एक लंबी लाइन लगती थी प्रेयर और फिर क्लास टीचर के आने पर हम सब एक साथ चिल्लाते थे 'गुड मॉर्निंग मैम'। 90 के दशक में जो लोग भी थे उन्हें आज भी वही साधारण सा समय ज्यादा आसान लगता होगा। तो आज हम आपकी 90 दशक की कुछ पुरानी यादें ताजा करने जा रहे हैं। अगर आप 90 के दशक वाले बच्चे होंगे तो आप उससे खुद को जुड़ा हुआ जरूर पाएंगे।
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कट्टी - फोटो : सोशल मीडिया
कट्टी

आज अगर बच्चों में लड़ाई होती है तो वो बस बात करना बंद कर देते हैं। लेकिन उस वक्त जब हम लोग लड़ाई करते थे, तो उसका एक तरीका होता था। हम अपनी छोटी उंगली उठाते थे और कहते थे 'अट्टी-बट्टी सात जनम की कट्टी'। याद आया, कुछ ऐसा ही होता था ना।
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रामायण... - फोटो : सोशल मीडिया
रामायण...

वो वक्त याद है जब रामायण के टाइम के लिए घर में सब काम खत्म कर लिये जाते थे और सब एक साथ बैठ जाते थे दूरदर्शन पर आने वाले रामायण को देखने। पूरा परिवार एक साथ दो ही धारावाहिकों को साथ में देखना था एक था रामायण और दूसरा महाभारत। लेकिन ये टाइम पिछले साल लॉकडाउन के दौरान वापिस लौट कर आया था। जब सभी ने एक साथ रामायण देखी थी।

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कलरफुल पॉपिन्स - फोटो : सोशल मीडिया
कलरफुल पॉपिन्स

नहीं मुझे रेड वाली चाहिए, नहीं मुझे वो वाली चाहिए। अरे पॉपिन्स पर होने वाली लड़ाई याद है। जो सेम कलर की पॉपिन्स लेने पर हुआ करती थी। जब हमें हमारी पसंद की पॉपिन्स मिल जाया करती थी तो जैसे सारे जहां की खुशियां हमारे पास होती थी। अब हम पॉपिन्स को लोग भूलकर किंडर जॉय पर आ गए।
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झूला - फोटो : सोशल मीडिया
झूला झूलना

90 के दशक में मेलों का भी काफी चलन था। जिसमें बड़े वाले, नाव वाले और ड्रैगन वाले झूले आते थे। जो झूलने भी होते थे। सभी लोग जिद किया करते थे हमें बड़ा वाला झूला ही झूलना है। 
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आजा कान में एक बात बताऊं - फोटो : सोशल मीडिया
आजा कान में एक बात बताऊं

वो याद है जब सभी बच्चे क्लास में बैठे होते थे लेकिन दो दोस्त एक दूसरे के कानों में ही बातें बताते थे ताकि कोई और ना सुन ले और अगर इस दौरान टीचर देख लेती थी। तो हम क्या कहते थे, मैंने नहीं इसने कहा। एक-दूसरे को दोषी हम आसानी से ठहरा देते थे कहने को दोस्त होते थे।
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शक्तिमान - फोटो : सोशल मीडिया
शक्तिमान

शक्ति..शक्ति..शक्तिमान...। दूरदर्शन पर रात 8 बजे सभी को टीवी के आगे बैठना होता था क्योंकि मशहूर और पसंदीदा शक्तिमान आता था। वही शक्तिमान जो अच्छी बातें सिखाता था और गोल-गोल घूमकर इधर-उधर पहुंच जाता था। 

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कीड़ों वाला मजाक - फोटो : सोशल मीडिया
कीड़ों वाला मजाक

अरे मैम, छिपकली! याद तो आ ही गया होगा। जब बच्चे रबर के छिपकली, सांप और पता नहीं क्या क्या लेकर क्लास टीचर को डराने के लिए उन पर फेंक देते थे। इसमें से सबसे ज्यादा आजमाने वाला तरीका था छिपकली वाला। वो कितनी असली लगती थी ना?

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स्कूल प्रेयर के लिए खड़े होना - फोटो : सोशल मीडिया
स्कूल प्रेयर के लिए खड़े होना

सभी बच्चों के लिए स्कूल प्रेयर के लिए खड़े रहना किसी काला पानी की सजा से कम नहीं था। जब हम स्कूल आते थे और हमें प्रेयर के लिए लाइन में खड़े रहना होता था। इस लाइन पर हमारे पीटी टीचर नजर रखते थे कि कही से लाइन टेढ़ी ना हो या फिर कोई बच्चा शरारत ना कर रहा हो। कुछ लोग तो प्रेयर से बचने के लिए पेट दर्द का बहाना बनाकर क्लास में ही बैठे रहते थे।
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क्रॉस-जीरो खेलोगे - फोटो : सोशल मीडिया
क्रॉस-जीरो खेलोगे

ये गेम याद है, जिसमें दो सीधी दो बेड़ी लाइन खींचते थे और फिर क्रॉस और अंडा बनाते थे। जिसने पहले क्रॉस या अंडा बना लिया वो जीत गया। जब क्लास में टीचर नहीं आती थी, तो यही करते थे ना।
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