फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

'अंधाधुन' सफलता मिलने पर तब्बू को नहीं आ रहा यकीन, इंटरव्यू में खोले निजी जिंदगी के राज

Sat, 10 Aug 2019 02:04 PM IST
shrilata biswas मुंबई डेस्क, अमर उजाला
विज्ञापन
1 of 7
tabu - फोटो : social media
फिल्म माचिस और चांदनी बार के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री के दो राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार और दर्जनों दूसरे पुरस्कार जीत चुकीं तबस्सुम फातिमा हाशमी यानी दर्शकों की चहेती तब्बू को हिंदी सिनेमा का कैटलिस्ट यानी उत्प्रेरक माना जाता है। भारत सरकार से पद्मश्री से सम्मानित हो चुकीं तब्बू ने अपनी पिछली फिल्म अंधाधुन के लिए गुरुवार की शाम मेलबर्न फिल्म फेस्टिवल में भी सर्वश्रेष्ठ अभिनेत्री का खिताब जीता। शुक्रवार को निर्माता संजय राउतरे की फिल्म अंधाधुन ने सर्वश्रेष्ठ फिल्म सहित तीन राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार भी जीते। फिल्म अंधाधुन में सिमी का किरदार करने वाली तब्बू से अमर उजाला की एक खास बातचीत।
विज्ञापन

2 of 7
tabu - फोटो : social media
जिन लोगों ने भी आपकी पहली फिल्म हम नौजवान से लेकर पिछली फिल्म दे दे प्यार दे तक सारी फिल्में थिएटर में देखी हैं, वह इस बात पर हैरान रहते हैं कि तब्बू आखिर खुद को समय के साथ इतना कैसे बदल लेती है? कैसे चुनती हैं आप अपनी कहानियां?
किसी भी फिल्म की कहानी चुनते समय सबसे पहला जो असर आप पर होता है, वही किसी फिल्म को हां या ना करने के काम आता है। कहानी सुनते समय ही समझ में आ जाता है कि जो किरदार मुझे दिया जा रहा है उसकी ताकत क्या है। एक कलाकार के नाते मैं इसमें क्या जोड़ सकती हूं और ये किरदार मेरे करियर में क्या जोड़ पाएगा। किसी भी कहानी में किरदार ही सबसे अहम होता है। 
विज्ञापन

3 of 7
tabu - फोटो : instagram
फिल्म अंधाधुन ने भारत के अलावा चीन में भी कमाल का कारोबार किया, अब ऑस्ट्रेलिया में भी आप इसके लिए सम्मानित हुईं, कैसे चुना आपने सिमी का ये किरदार?
मैं हमेशा से श्रीराम राघवन के साथ काम करना चाहती थी। ये फिल्म और इसके सारे किरदार एक अच्छा संयोग बना। मैंने कभी सोचा नहीं था कि ये फिल्म इतनी कामयाब होगी। लोग कहते हैं कि यह हिंदी सिनेमा का टर्निंग प्वाइंट है, ये भी मैंने कभी नहीं सोचा था। अंधाधुन के निर्देशक श्रीराम का कहानी कहने का ढंग अलग है। ये बहुत ही ऑर्गेनिक फिल्म है। कहीं से नकली नहीं दिखती। कोई जबरदस्ती का घुमाव या साजिश नहीं है। थ्रिल या डराने के लिए कोई चीज जानबूझकर अलग से नहीं डाली गई। फिल्म का हर दृश्य अपने आप कहानी को आगे बढ़ाता जा रहा है। ध्यान से देखेंगे तो फिल्म के किरदारों को ये भी नहीं पता होता कि अगले पल क्या होने वाला है। फिल्म में पूरे समय सिमी खुद को हालात के हिसाब से बदलती रहती है। मेरे हिसाब से दर्शकों को यही बात पसंद आई।

4 of 7
tabu - फोटो : social media
हम नौजवान के बाद कादल देशम की बात करें, माचिस का जिक्र करें या मकबूल, चीनी कम से होते हुए अंधाधुन और दे दे प्यार दे तक आएं तो आपके किरदारों ने हिंदी सिनेमा में हीरोइन का चेहरा बदलने में बड़ी भूमिका निभाई है, क्या कहेंगी इस बारे में?
आपने जो कहा वह मेरी मेहनत के बदले मुझे मिला बहुत बड़ा सम्मान है। मैंने कभी ये सब सोच के नहीं किया। मुझे किरदार अच्छे मिलते रहे। निर्देशक अच्छे मिलते रहे और सबसे अहम बात कि मुझे कहानियां अच्छी मिलती गईं। कुछ न कुछ अच्छा होता ही गया। सिनेमा में मेरी अदाकारी का ये रास्ता इन्हीं सबसे बना। दर्शकों के सिनेमा देखने के नजरिए में अगर मेरे इस सफर का कुछ असर पड़ा है तो मैं इसके लिए इन्ही सबको धन्यवाद देती हूं। दर्शकों ने मेरे किरदारों को अपने आसपास का महसूस किया, यह बड़ी बात है।
विज्ञापन

5 of 7
tabu - फोटो : social media
तो इस तरह के किरदारों में कितना विकास आपका हुआ और कितना हिंदी सिनेमा में एक अभिनेत्री के किरदारों का?
मैं जब भी कोई फिल्म करती हूं तो यह ख्याल मुझे रहता है कि हर फिल्म के साथ मेरा एक कलाकार के तौर पर विकास होना चाहिए। विकास न भी हो तो कम से कम कोई ऐसा किरदार तो न ही करूं जो मुझे चार कदम पीछे ले जाए। किसी भी फिल्म को करते समय मैं एक किरदार की जिंदगी जी रही होती हूं। एक अभिनेता के रूप में यह किरदार आपके जीवन का हिस्सा बन जाता है। तो जब अपना काम मैं अच्छे से करती हूं और वह लोगों को पसंद आता है तो खुद को भी बहुत संतुष्टि मिलती है। किसी किरदार को जीने की प्रक्रिया ही मेरे लिए सबसे अहम है।
विज्ञापन

6 of 7
tabu - फोटो : social media
क्या वजह है कि तब्बू खुद को चर्चा में बनाए रखने के लिए वह सब नहीं करतीं जिसके लिए आजकल की अभिनेत्रियां लालायित रहती हैं? 
1986 में जब मैंने अपना पहला नेशनल अवार्ड जीता था तब भी और उसके बाद भी कई साल तक हम कलाकारों का दर्शकों से संबंध सिर्फ अपनी फिल्मों और जो मीडिया लिखती थी, उसी से होता था। तब अपनी ब्रांडिंग करने का या खुद से कुछ करने का हम सोचते भी नहीं थे। हमारी फिल्में ही हमारी मौजूदगी होती थीं। न फेसबुक था, न ट्विटर था लेकिन आज भी मैं काम को सबसे ज्यादा अहमियत देती हूं। अगर काम अच्छा होगा तो ये सब किए बिना भी लोग आपके काम के बारे में बातें जरूर करेंगे।
विज्ञापन
विज्ञापन

7 of 7
Tabu - फोटो : social media
एक आखिरी सवाल, फिल्म दे दे प्यार दे में आपके किरदार मंजू को लेकर। अपने पति को किसी दूसरी प्रेमिका के साथ जाने देने की हिम्मत दिखाने वाले इस किरदार के जरिए आप क्या कहना चाहती रहीं?
मंजू के इस किरदार की तमाम खासियतें हैं। ऐसा पहले भी हुआ होगा किसी फिल्म में, लेकिन आज के दौर की किसी फिल्म में मैंने किसी पूर्व पत्नी की ऐसी सोच नहीं देखी। मैं खुद भी इसमें यकीन करती हूं और ये बात मेरे जरिए दर्शकों तक पहुंच रही हैं, ये सोचना ही मेरे लिए दिलचस्प था। मुझे लव रंजन की यही बात अच्छी लगी। चीजों को पकड़ कर रखने से आप उनके गुलाम बन जाते हैं। खुद को आजाद रखना और अपने किसी बंधन से दूसरों को आजाद करना, यही मंजू की ताकत है। फिल्म में मंजू का एक संवाद है बच्चों के लिए, ‘जब आप अपने मां बाप की संपत्ति के वारिस होते हैं तो उनके टूटे रिश्तों की विरासत संभालना भी उनका ही दायित्व होता है।’ यही बात मंजू के किरदार की सबसे अहम बात है।
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें