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वेब सीरीज के बोल्ड सीन पर बोलीं स्वरा भास्कर, 'आजादी बेहद जरूरी है'

Sat, 15 Dec 2018 09:44 AM IST
शिप्रा सक्सेना एंटरटेनमेंट डेस्क, अमर उजाला
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Swara Bhaskar - फोटो : File Photo
मनोरंजन का संसार तेजी से बदल रहा है और फिल्मों में जमे सितारे वेब सीरीज पर अधिक ध्यान दे रहे हैं। वेब की बढ़ती लोकप्रियता का नतीजा है कि अभिनेत्री स्वरा भास्कर ने 'वीरे दी वेडिंग' के बाद कोई फिल्म साइन करने के बजाय तीन वेब सीरीज साइन कर लीं। एंटरटेनमेंट की बदलती दुनिया में वेब के बढ़ते दबदबे को लेकर स्वरा भास्कर की रवि बुले से विशेष बातचीत....
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वीरे दी वेडिंग - फोटो : File Photo
सफल होने के बाद एक्टर ज्यादा से ज्यादा फिल्में साइन करते हैं। आप एक के बाद एक वेब सीरीज कर रही हैं। क्या वजह है?
मेरा फिल्मी सफर देखें तो 2016 में 'निल बटे सन्नाटा' आई, 2017 में 'अनारकली ऑफ आरा' और 2018 में 'वीरे दी वेडिंग'। ग्राफ लगातार ऊपर है। नए-नए किरदार मिले। मैं नहीं चाहती कि वीरे के बाद ऐसी फिल्म करूं जो उन्नीस-बीस हो। मैं चाहती हूं क्वालिटी बनी रहे। मैंने पाया कि फिल्मों से ज्यादा वेब में दिलचस्प ऑफर थे। एक्सपेरिमेंट से मुझे डर नहीं लगता। वेब में इसकी खूब गुंजाइश है। खुला माध्यम है। सेंसर बॉक्स ऑफिस टीआरपी की दिक्कत नहीं है।
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swara bhaskar - फोटो : File Photo
कैसे एक्सपेरिमेंट कर रही हैं वेब में?
तीन सीरीज कर रही हूं। 'इट्स नॉट दैट सिंपल सीजन-2' कल ही रिलीज हुई। यह मॉडर्न दुनिया की महिला की कहानी है जो रिश्तों और कामकाज के बीच अपना अस्तित्व ढूंढ रही है। रसभरी है स्टूडेंट-टीचर की कहानी। फिर 'फ्लैश' मानव तस्करी पर है। सारे किरदार अलग-अलग हैं जो कम से कम मैंने नहीं किए। मेरी वेब में प्रयोग करना चाहती हूं और फिल्मों को एक्सक्लूसिव रखना चाहती हूं। फिल्म में तभी किसी रोल को हां कहूं जब उसके बारे में निश्चिंत हो जाऊं।

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Swara Bhaskar - फोटो : File Photo
इन कड़ी कसौटियों में लेखकों-निर्देशकों के लिए आपके वास्ते रोल निकालना कड़ी चुनौती बन जाएगा?
मैं समझती हूं। लेकिन कभी कभी हां-ना इस पर निर्भर नहीं होती कि स्क्रिप्ट कैसी है। यह अहम हो जाता है कि जीवन के सफर में आप किस मोड़ पर हैं। जो रोल मैं कर चुकी हूं अनुभव कर चुकी हूं वो बार-बार क्यों करूं।
रोल का चयन निजी होने पर भी एक्टर दर्शक से कनेक्ट होना चाहता है। वेब में इसकी कितनी गुंजाइश है?
सबसे पहले तो वेब प्लेटफॉर्म दे रहा है। मैं फिल्म नहीं कर रही तो डर नहीं है कि भुला दी जाऊंगी। दर्शक मेरा काम यहां देख सकते हैं। वेब दर्शकों से अंतरंग ढंग से जोड़ता है। वेब पर्सनल एक्सपीरियंस है जिसमें दर्शक एकांत में आपसे जुड़ता है। वेब की पहुंच उस दर्शक तक है जिस तक मेरी फिल्म नहीं पहुंची या जिसने मेरी फिल्म पहले नहीं देखी।
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Swara Bhaskar - फोटो : File Photo
वेब पर सेंसर नहीं होने से कुछ ऐसी सीरीज बनी हैं जिनमें दिखाई हिंसा या सेक्स दृश्य कई लोगों को अनावश्यक लगे। अनियंत्रित होने पर वेब पर सेंसरशिप का खतरा है?
फिल्म टीवी पर सेंसरशिप के दौर में वेब की आजादी जरूरी है। कुछ गाइडलाइंस तो आ चुकी हैं। देश में 130 करोड़ लोग हैं तो सोचने वाली बात है कि कितनी अलग-अलग राय भावनाएं और आदर्श मूल्य होंगे। लोकतांत्रिक समाज की खूबसूरती यही है कि तमाम राय के बीच सब अपनी-अपनी अभिव्यक्ति कर सकते हैं। हालांकि हमारे समाज में इसकी स्पेस कम हो रही है। यह कला के लिए अच्छा नहीं है। कलाकार भी डर के मारे खुद को सेंसर करना शुरू कर देते हैं।
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Swara Bhaskar - फोटो : file photo
लेकिन यही वह दौर है जिसमें अभिव्यक्ति की स्पेस कम होने की बातों के बीच सिनेमा में नए-नए विषय आ रहे हैं!
कला और समाज के बीच में अंतरद्वंद्व चलते रहना चाहिए। यही दिखाता है कि समाज जीवंत है। बाहर से पड़ रहे दबाव के विरुद्ध अंदर से भी प्रतिरोध है। हम ऐसा समाज नहीं बन सकते जहां कुछ भी नया करने में दिक्कत हो। इसीलिए आज के दौर में वेब की जगह बहुत महत्वपूर्ण है। समाज भी वेब को आजादी दे रहा है।
आप स्क्त्रिस्प्ट लिख रही थीं। क्या हुआ?
दो पर काम कर रही थी। एक पूरी हो चुकी है। मैं चाह रही हूं कि अगले साल इसकी शूटिंग शुरू हो जाए लेकिन मैं इसे डायरेक्ट नहीं करूंगी। मैं प्योर एक्टर हूं और राइटिंग हो जाए वही बड़ी बात है।
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swara bhaskar anand l rai shah rukh khan - फोटो : File Photo
एक्टर तब लिखते हैं  जब उन्हें लगता है कि मन जैसे रोल नहीं मिल रहे। क्या आपके लिखने का कारण भी यही था?
जी, मैंने जो भी लिखा उसमें खुद को एक्टिंग करते देखना चाहती हूं। लेकिन जब आप लिखना शुरू करते हैं तो किरदार खुद की एक जिंदगी गढ़ लेते हैं। मुझे लगता है कि स्क्रिप्ट भले ही मैंने अपने लिए लिखी परंतु लड़के का रोल ज्यादा निखर कर आया। खैर बतौर लेखक-एक्टर हमारी पहली जिम्मेदारी कहानी के प्रति होनी चाहिए।
इधर बॉलीवुड में मीटू मूवमेंट हुआ। परंतु घुटने पर भी चल नहीं चल पाया और खत्म हो गया। क्या सोचती हैं?
खत्म तो नहीं हुआ। पहली बार इंडस्ट्री ने स्वीकार किया कि हमारी जो कर्मभूमि है यहां यौन उत्पीड़न होता है। केवल उन लोगों ने इसे नहीं स्वीकारा जो दोषी हैं। तमाम बड़े लोगों ने माना कि हमें यहां परिस्थितियां बदलने के लिए काम करना चाहिए। वैसे यह समझने की जरूरत है कि यह दिक्कत सिर्फ फिल्म इंडस्ट्री की नहीं है। कार्यस्थलों पर यौन उत्पीड़न पूरी दुनिया की समस्या है।
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Swara Bhaskar
परंतु इधर अमेरिका देश में यह भी समस्या उभरी कि महिलाओं के साथ पुरुष काम करने को तैयार नहीं। उन्हें डर है कि कौन महिला कब आरोप लगा दे। इसका क्या हल होगा?
यह बचकाना टाइप का रिस्पांस है। मैं शुरू से कह रही हूं कि हमें अज्ञात या पहचान छुपा कर लगाए आरोपों को तवज्जो नहीं देनी चाहिए। अमेरिकी मीडिया ने निजी स्तर पर छानबीन करके सुबूत मिलने पर मीटू की बातें प्रकाशित कीं। पत्रकारों ने जिम्मेदारी ली। हमारे यहां भी इतनी मेहनत करनी चाहिए।
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